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निवारक निरोध

  • 12 Apr 2023
  • 5 min read

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने निवारक निरोध कानून को ‘राज्य को मनमानी शक्ति प्रदान करने’ वाला एक ‘औपनिवेशिक विरासत’ के रूप में वर्णित किया है।

  • न्यायालय ने कहा है कि ये कानून अत्यंत शक्तिशाली हैं, जो राज्य को स्वतंत्र व मनमाने तरीके से निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।

निवारक निरोध कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के निहितार्थ  

  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भारत की नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है। निवारक निरोध कानूनों के माध्यम से राज्य को दिये गए मनमाने अधिकार पर न्यायालय की चेतावनी सरकारी शक्ति पर नियंत्रण और संतुलन सुनिश्चित करने के महत्त्व पर जोर देती है।
  • अत्यधिक सावधानी और सर्वाधिक विवरण (Excruciating Detail) के साथ मामलों का विश्लेषण करने पर निर्णय की अवधारणा सरकार के लिये व्यक्तियों के खिलाफ निवारक निरोध शक्तियों का प्रयोग करते हुए कानून की हर प्रक्रिया का पालन करने हेतु एक उच्च मानक निर्धारित करता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने की आवश्यकता को संतुलित करते हुए व्यक्तिगत तथा नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के महत्त्व को रेखांकित करता है।
  • निर्णय न्यायिक निरीक्षण और समीक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डालता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विरोध को दबाने या व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करने के लिये निवारक निरोध कानूनों का दुरुपयोग नहीं किया जाता है।
  • नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा पर न्यायालय का जोर मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और भारत में विधि के शासन को सुनिश्चित करने में एक महत्त्वपूर्ण विकास है।

निवारक निरोध:

  • परिचय:  
    • निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे और न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के निरुद्ध करना। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को पिछले अपराध के लिये दंडित करना नहीं है बल्कि उसे निकट भविष्य में अपराध करने से रोकना है।
    • किसी व्यक्ति की हिरासत तीन महीने से अधिक नहीं हो सकती है जब तक कि एक सलाहकार बोर्ड विस्तारित हिरासत के लिये पर्याप्त कारण की रिपोर्ट नहीं करता है।  
  • सुरक्षा: 
    • अनुच्छेद 22 गिरफ्तार या हिरासत में लिये गए व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करता है।
    • अनुच्छेद 22 के दो भाग हैं- पहला भाग सामान्य कानून के मामलों से संबंधित है और दूसरा भाग निवारक निरोध कानून के मामलों से संबंधित है।
  • दो प्रकार के हिरासत: 
    • जब किसी व्यक्ति को केवल इस संदेह के आधार पर पुलिस हिरासत में रखा जाता है तब इस प्रकार की हिरासत को निवारक निरोध की श्रेणी में रखा जाता है।
      • पुलिस के पास यह अधिकार है कि वह किसी को भी दंडनीय अपराध करने का संदेह होने पर हिरासत में ले सकती है और कुछ मामलों में वारंट अथवा दंडाधिकारी (मजिस्ट्रेट) के बोर्ड के परामर्श के बिना भी गिरफ्तार कर सकती है।
    • दंडात्मक निरोध अर्थ है- किसी अपराध के लिये सजा के रूप में निरोध। इसका उपयोग ऐसी स्थिति में किया जाता है, जब वास्तव में कोई अपराध किया गया हो, या अपराध करने का प्रयास किया गया हो।

स्रोत: द हिंदू

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