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भारतीय बाज़ारों पर अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की नीति का प्रभाव

  • 19 Jun 2023
  • 7 min read

हाल ही में अमेरिकी फेडरल रिज़र्व नीति की बैठक ने नीति दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखते हुए भारत की ब्याज दरों और बाज़ारों पर अटकलों को तेज़ कर दिया है, साथ ही वर्ष 2023 के अंत तक दो दरों में बढ़ोतरी के 6% तक पहुँचने का संकेत दिया है।

  • इसने मुद्रास्फीति से निपटने के लिये इस साल दो और दरों में बढ़ोतरी की संभावना का संकेत दिया, जबकि फेडरल ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्णय लिया।

भारतीय बाज़ार पर फेडरल नीति का प्रभाव: 

  •  फेडरल नीति की घोषणा के बाद 29 जून, 2023 को भारतीय बाज़ारों में 0.49% की गिरावट आई।
  • फेडरल नीति विभिन्न चैनलों/कारकों के माध्यम से भारतीय बाज़ारों को प्रभावित करती है जैसे:
    • विनिमय दर चैनल: फेडरल की दर में वृद्धि भारतीय रुपए सहित अन्य मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर को मज़बूत करती है। 
      • कमज़ोर रुपया उन भारतीय उधारकर्त्ताओं के लिये ऋण सेवा लागत भी बढ़ाता है जिन्होंने विदेशी मुद्रा में ऋण लिया है।
    • पूंजी प्रवाह चैनल: फेडरल की दर में बढ़ोतरी अमेरिका और भारत के बीच ब्याज दर के अंतर को भी कम करती है जो उच्च रिटर्न की इच्छा रखने वाले विदेशी निवेशकों के लिये भारत को कम आकर्षक बनाता है।
      • इससे भारत के इक्विटी और ऋण बाज़ारों से पूंजी का बहिर्वाह हो सकता है, जिससे परिसंपत्ति की कीमतें कम हो सकती हैं और अस्थिरता बढ़ सकती है।
      • पूंजी का बहिर्वाह भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को कम कर सकता है और घरेलू बाज़ारों में तरलता की कमी की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
    • मुद्रास्फीति चैनल: फेडरल रिज़र्व की दर में बढ़ोतरी भी दो तरह से भारत की मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकती है।
      • सबसे पहले कमज़ोर रुपया भारत हेतु आयातित मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ जाती है।
      • दूसरा मज़बूत अमेरिकी मांग के कारण उच्च वैश्विक कमोडिटी की कीमतें भी भारत की घरेलू मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती हैं, क्योंकि यह कृषि, विनिर्माण और सेवाओं जैसे विभिन्न क्षेत्रों हेतु इनपुट लागत को प्रभावित करती है।
    • आर्थिक वृद्धि चैनल: फेडरल रिज़र्व की दरों में बढ़ोतरी का भारत की आर्थिक वृद्धि पर दो तरह से प्रभाव पड़ सकता है।
      • सबसे पहले अमेरिकी सख्त मौद्रिक नीति महामारी से वैश्विक आर्थिक सुधार को धीमा कर सकती है, जो भारत की निर्यात संभावनाओं एवं बाहरी मांग को नुकसान पहुँचा सकती है।
      • दूसरा पूंजी के बहिर्वाह और मुद्रास्फीति के दबाव के कारण उच्च घरेलू ब्याज दरें भारत की घरेलू मांग तथा निवेश गतिविधि को धीमा कर सकती हैं।

भारतीय बाज़ारों के लिये कुछ संभावित परिदृश्य:

  • सर्वोत्तम स्थिति परिदृश्य: फेड की दर, स्पष्ट और विश्वसनीय संचार के साथ क्रमिक एवं  मध्यम वृद्धि है।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक एक उदार रुख के साथ भारत में तरलता और ऋण की स्थिति का समर्थन करता है।
    • भारत का आर्थिक सुधार मज़बूत और लचीला है जिसके अंतर्गत एक मज़बूत घरेलू एवं बाहरी मांग का समर्थन प्राप्त होता  है। भारत की मुद्रास्फीति नियंत्रित एवं प्रबंधनीय है और साथ ही इसके राजकोषीय और चालू खाता घाटा नियंत्रण में हैं।
    • वैश्विक जोखिम क्षमता अधिक है, साथ ही विदेशी निवेशकों की स्थिति भारत की विकास क्षमता और सुधारों पर सकारात्मक बनी हुई है।

नोट: उदार रुख का अर्थ है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिये मुद्रा आपूर्ति को विस्तारित करने के साथ उदार नीति अवधि में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करने को भी तैयार है।

  • सबसे खराब स्थिति परिदृश्य: फेड की दर वृद्धि अचानक और आक्रामक होती है, साथ ही अप्रत्याशित मुद्रास्फीति के झटकों से प्रेरित होती है।
    • RBI को रुपए की सुरक्षा और मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिये अपनी नीति को सख्त करने हेतु मजबूर होना पड़ा है। भारत के आर्थिक सुधार कमज़ोर और असमान हैं जो महामारी से संबंधित अनिश्चितताओं एवं संरचनात्मक बाधाओं के कारण बाधित हुए हैं।
    • भारत की मुद्रास्फीति लगातार उच्च बनी हुई है, साथ ही इसका राजकोषीय और चालू खाता घाटा भी अस्थिर रहा है।
    • भू-राजनीतिक तनाव, नीतिगत अनिश्चितता और शासन संबंधी मुद्दों के कारण वैश्विक जोखिम कम है और विदेशी निवेशक भारत के बाज़ारों से पलायन कर रहे हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. भारतीय सरकारी बॉण्ड प्रतिफल निम्नलिखित में से किससे/किनसे प्रभावित होता/होते है/हैं? (2021)

  1. यूनाइटेड स्टेट फेडरल रिज़र्व की कार्यवाही
  2. भारतीय रिज़र्व बैंक की कार्यवाही
  3. मुद्रास्फीति और अल्पावधि ब्याज दर

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022) 

  1. अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की सख्त मुद्रा नीति पूंजी पलायन की ओर ले जा सकती है।
  2. पूंजी पलायन वर्तमान विदेशी वाणिज्यिक ऋणग्रहण (External Commercial Borrowings- ECBs) वाली फर्मों की ब्याज लागत को बढ़ा सकती है।
  3. घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन ECBs से संबद्ध मुद्रा जोखिम को घटाता है। 

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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