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हरियाणा ग्राम शामलात भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961

  • 02 Jan 2026
  • 18 min read

स्रोत: TH

हरियाणा विधान सभा ने हरियाणा ग्राम शामलात भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961 में संशोधन किया है ताकि अनधिकृत कब्ज़ेदार ग्राम पंचायतों से 'शामलात देह' भूमि की कुछ श्रेणियों को खरीद सकें और इसे निजी स्वामित्व में परिवर्तित कर सकें, जिससे ग्राम साझा भूमि शासन सामाजिक सुरक्षा से भुगतान के माध्यम से स्वामित्व की ओर स्थानांतरित हो गया है।

हरियाणा ग्राम शामलात भूमि (विनियमन) अधिनियम, 1961

  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य लंबे समय से लंबित मुकदमेबाज़ी को कम करना, राजस्व न्यायालयों के बैकलॉग को समाप्त करना, ग्रामीण भूमि विवादों को सुलझाना और ग्राम पंचायतों के लिये राजस्व उत्पन्न करना है।
  • प्रभाव: यह लंबे समय से चले आ रहे अनौपचारिक कब्ज़े को औपचारिक स्वामित्व में परिवर्तित करता है, जिससे भूमि रिकॉर्ड, योजना और सेवा वितरण में सुधार होता है।
    • यह संशोधन ग्राम साझा भूमि (शामलात भूमि) को एक अधिकार-आधारित सुरक्षात्मक ढाँचे से बाज़ार-आधारित स्वामित्व मॉडल की ओर स्थानांतरित करता है, सामाजिक न्याय पर प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिकता देता है।
  • चुनौतियाँ: भूमिहीन और दलित परिवारों को ग्राम साझा भूमि तक पहुँच कम होने का खतरा है, जिससे चराई, ईंधन और निर्वाह के लिये एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा जाल कमज़ोर होता है।
    • यह लंबे समय से चले आ रहे अवैध कब्जे को वैध बना सकता है, जिससे असमान भूमि नियंत्रण को सही करने के बजाय वास्तविक कब्ज़े को कानूनी स्वामित्व में बदल दिया जाता है।
    • धन, कागज़ी कार्रवाई की क्षमता और राजनीतिक नेटवर्क वाले लोगों को स्वामित्व प्राप्त होने की अधिक संभावना है, जिससे साझा भूमि पर अभिजात्य वर्ग के कब्ज़े को स्थिरता मिलती है।
    • धन, कागजी कार्रवाई की समझ और राजनीतिक पहुँच वाले लोग अक्सर साझा भूमि पर स्वामित्व हासिल करने और उसे बनाए रखने में सफल होते हैं, जिससे अभिजात्य वर्ग (elites) के लिये इन संसाधनों पर कब्ज़ा करना आसान हो जाता है

शामलात देह (Shamilat Deh) 

  • यह पूरे ग्राम समुदाय की साझा भूमि को संदर्भित करता है, जिसका ऐतिहासिक रूप से उपयोग चराई, जल निकायों, रास्तों तथा अन्य सामूहिक प्रयोजनों के लिये किया जाता रहा है।
  • मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में ग्राम की साझा भूमि को क्रमशः चरनोई (चराई) भूमि तथा पंचमी भूमि कहा जाता है, जिन्हें दलित परिवारों को आवंटित किया गया है, ताकि उनकी साझा संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित की जा सके।

और पढ़ें: भूमि सुधार हेतु राज्यों को केंद्र द्वारा सहायता

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