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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

RCEP और भारत

  • 20 Sep 2019
  • 8 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में क्षेत्रीय व्यापार आर्थिक साझेदारी, इसके वैश्विक महत्त्व तथा भारतीय संदर्भ में इसके महत्त्व पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में 16 सदस्य देशों वाले क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP) समूह के व्यापार मंत्रियों ने वचनबद्धता जताई कि वे नवंबर में आयोजित होने वाले आसियान शिखर सम्मेलन से पहले प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement- FTA) पर असहमति के अपने सभी मुद्दों को सुलझा लेंगे।

भारत सरकार अभी तक इस व्यापार मंच में शामिल होने के प्रति सतर्कता बरत रही है। लेकिन, चूँकि RCEP के सदस्यों की ओर से दबाव बढ़ता जा रहा है, भारत सरकार को व्यापार समझौते पर अपनी रणनीति के संबंध में सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

क्या है क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी?

  • RCEP 10 आसियान देशों और उनके FTA भागीदारों- भारत, चीन, जापान, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बीच प्रस्तावित एक मुक्त व्यापार समझौता है।
  • इसका उद्देश्य व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिये इसके सदस्य देशों के बीच व्यापार नियमों को उदार एवं सरल बनाना है।
  • इसकी औपचारिक शुरुआत नवंबर 2012 में कंबोडिया में आसियान शिखर सम्मेलन में की गई थी।
  • RCEP को ट्रांस-पैसिफिक भागीदारी के एक विकल्प के रूप में भी देखा जाता है।
  • इस समझौते के संपन्न होने पर यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 25 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के 30 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करेगा।

RCEP का महत्त्व

  • RCEP की अवधारणा जब क्रियाशील होगी तो लगभग 5 अरब लोगों की आबादी के लिहाज़ से यह सबसे बड़ा व्यापार ब्लॉक बन जाएगा।
  • इसमें विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमानतः 40% और वैश्विक व्यापार का 30% प्रभुत्व होगा।
  • महत्त्वाकांक्षी RCEP का एक अनूठा महत्त्व यह है कि इसमें एशिया की (चीन, भारत और जापान) तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं।
  • RCEP समझौते में वस्तुओं का व्यापार, सेवाओं का व्यापार, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहयोग, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पर्द्धा, विवाद निपटान और अन्य मुद्दे शामिल होंगे।

भारत क्यों नहीं है तैयार?

  • इस व्यापार संधि में शामिल होने की भारत की अनिच्छा इस अनुभव से प्रेरित है कि देश को कोरिया, मलेशिया और जापान जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों का कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ है।
  • समझौतों का कार्यान्वयन शुरू होने के बाद इन देशों से भारत के आयात में तो वृद्धि हुई लेकिन भारत से निर्यात में उस गति से वृद्धि नहीं हुई, जिससे देश के व्यापार घाटे का विस्तार हुआ।
  • भारत पहले से ही 16 RCEP देशों के साथ व्यापार घाटे की स्थिति में है। अपने बाज़ार को और अधिक मुक्त बनाने से स्थिति और बिगड़ सकती है।
  • इंडिया इंक (India Inc) के एक बड़े तबके को आशंका है कि RCEP का अंग बनने से उपभोक्ता वस्तुओं और औद्योगिक क्षेत्रों, दोनों में अधिक प्रतिस्पर्द्धी मूल्य वाले चीनी उत्पादों की आमद बढ़ेगी।
  • प्रशुल्क उन्मूलन और कटौती को लेकर RCEP के ज़्यादातर सदस्य 92 प्रतिशत वस्तुओं पर शून्य प्रशुल्क लगाने की बात कर रहे हैं, जबकि भारत इसके लिये तैयार नहीं है।
  • भारतीय उद्योग और कृषि क्षेत्र ज़्यादातर उत्पादों पर प्रशुल्क में इतनी भारी कमी के लिये तैयार नहीं हैं, क्योंकि कई क्षेत्रों में वे अब भी विकासशील स्थिति में हैं और प्रशुल्क मुक्त प्रतियोगिता उनके हित में नहीं है।
  • यह समझौता भारत के डिजिटल उद्योग के संरक्षण को भी प्रभावित करेगा। इन देशों से भारत में सस्ते सामानों के आयात से घरेलू उद्योगों पर असर पड़ेगा।
  • इस प्रकार व्यापारिक वस्तुओं के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लिये टैरिफ की समाप्ति को घरेलू उद्योग से प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। एक मंद होती अर्थव्यवस्था ऐसी आशंकाओं को और बल प्रदान करेगी।

क्या भारत को इसमें शामिल होना चाहिये?

मुक्त व्यापार समझौते के निराशाजनक प्रदर्शन के लिये उच्च अनुपालन लागत, प्रशासनिक विलंब आदि को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। लेकिन आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि चूँकि भारत का निर्यात पिछले पाँच वर्षों से गतिहीन बना है, इस तरह की व्यापार संधियों से कन्नी काटना विवेकपूर्ण दृष्टिकोण नहीं है। यह समझने की आवश्यकता है कि इन व्यापार समूहों में शामिल होने से जो दीर्घकालिक लाभ होंगे, वे अल्पकालिक लागतों से बहुत अधिक होंगे। यह सुनिश्चित करने के लिये:

  • भारत को संवेदनशील क्षेत्रों के लिये रियायतों और सुरक्षा उपायों पर वार्ता करनी चाहिये।
  • इसके अतिरिक्त प्रस्तावित टैरिफ कटौतियों को पाँच से दस वर्ष की अवधि के लिये चरणबद्ध किया जा सकता है जो उद्योग को अनुकूल बनने का समय प्रदान करेगा।
  • औद्योगिक क्षेत्र के दबाव में व्यापार संधि की राह पर आगे नहीं बढ़ना भारत के लिये अत्यंत नुकसानदेह हो सकता है।

वैश्विक व्यापार की जो प्रकृति है, उसमें इन मुक्त व्यापार समझौतों में शामिल होना न केवल वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (Global Value Chains) के साथ देश के एकीकरण को धीरे-धीरे सुगम बनाएगा, बल्कि निवेश के लिये अधिकाधिक अवसर भी उपलब्ध होंगे।

निष्कर्ष:

इस व्यापार व्यवस्था में भविष्य की बड़ी संभावनाएँ विद्यमान हैं क्योंकि इसमें चीन और भारत जैसी तेज़ी से बढ़ रही दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ हैं। RCEP समझौते का उद्देश्य आसियान सदस्य देशों और आसियान के एफटीए पार्टनर्स के बीच एक आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्तापूर्ण और परस्पर लाभकारी आर्थिक साझेदारी समझौता करना है। भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़ने के इस अवसर का लाभ उठाना चाहिये, जबकि इसके साथ ही विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धा को प्रभावित करने वाले गंभीर मुद्दों को भी संबोधित करना चाहिये।

प्रश्न: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में RCEP के महत्त्व को देखते हुए भारतीय संदर्भ में RCEP की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिये।

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