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भारतीय राजनीति

भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा की भूमिका

  • 25 Jul 2022
  • 14 min read

यह एडिटोरियल 23/07/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Why the Rajya Sabha Matters” लेख पर आधारित है। इसमें भारतीय लोकतंत्र में राज्यसभा की भूमिका के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

राज्यसभा—जो संवैधानिक रूप से राज्यों की परिषद (Council of States) है, भारत की द्विसदनीय संसद का उच्च सदन है। राज्यसभा की उत्त्पत्ति का मूल वर्ष 1918 की मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट और इसके उपरांत आए भारत सरकार अधिनियम, 1919 (जिसने संसद के एक द्वितीय फेडरल चैंबर का उपबंध किया) में खोजा जा सकता है।

  • भारतीय राज्य व्यवस्था की संघीय प्रकृति पर बल देते हुए राज्यसभा एक स्वस्थ द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameralism) को न केवल ‘दूसरे विचार के एक सदन’ (House for second thought)  के रूप में सुनिश्चित करती है बल्कि ‘सुधार के एक सदन’ (House of correction) के रूप में राज्य के अधिकारों की संरक्षक भी है।
  • देश में व्याप्त राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए, राज्यसभा के कार्यों का सतर्क मूल्यांकन हमारे संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को प्रबल करने के लिये और भी आवश्यक हो जाता है।

राज्यसभा भारतीय लोकतंत्र में प्रासंगिक कैसे है?

  • स्थायी निकाय: लोकसभा के विपरीत राज्यसभा कभी विघटित नहीं होती, बल्कि इसके एक तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
    • इससे एक निरंतरता सुनिश्चित होती है और सदन में नए एवं पुराने सदस्यों के संलयन का एक अवसर भी मिलता है।
      • इस प्रकार की व्यवस्था को अतीत के साथ-साथ वर्तमान मतों/विचारों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित करने तथा सार्वजनिक नीति में निरंतरता बनाए रखने में मदद करने हेतु अभिकल्पित किया गया है।
  • समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन संबंधी भूमिका: राज्यसभा कानूनों की गहन समीक्षा में मदद करती है, क्योंकि यह अधिकाधिक कार्यकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने में निचले सदन या लोकसभा को पूरकता प्रदान करती है।
    • यह संशोधन एवं पुनर्विचार का प्रस्ताव कर लोकसभा द्वारा जल्दबाजी में लाए गए और दोषपूर्ण एवं अनुत्तरदायी विधानों पर नियंत्रण का प्रयास करती है।
    • यह छोटे और क्षेत्रीय दलों को अपने विचार प्रस्तुत करने के लिये एक मंच भी प्रदान करती है।
  • ‘चेक एंड बैलेंस’ का सदन: चूँकि लोकसभा के निर्णय लोकलुभावनवादी हो सकते हैं और ये सदस्यों को सर्वोत्तम निर्णय के विपरीत जाने हेतु प्रवृत्त कर सकते हैं, राज्यसभा उस पर नियंत्रण और संतुलन रखती है।
    • ब्रिटेन के ‘हाउस ऑफ लॉर्ड्स’ के विपरीत राज्यसभा सदस्यों को वंशानुगत सदस्यता अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
  • राज्यों का प्रतिनिधित्व: अप्रत्यक्ष चुनावों की प्रक्रिया भी भारतीय संसदीय प्रणाली में अपनी जगह रखती है जहाँ राज्यसभा के सदस्य एकल संक्रमणीय मत के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
    • यह राज्यों, लोगों और संसद के बीच एक वाहिका के रूप में कार्य करता है, जहाँ राज्यों को एक स्वतंत्र आवाज़ देकर विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों को आगे बढ़ाता है।
    • संविधान की चौथी अनुसूची में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिये राज्यसभा में सीटों के आवंटन संबंधी प्रावधान किये गए हैं।
  • सहभागी लोकतंत्र को बढ़ावा: राज्यसभा के 12 सदस्य कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवाओं में उनके योगदान के लिये भारत के राष्ट्रपति द्वारा 6 साल की अवधि के लिये मनोनीत किये जाते हैं।
    • राज्यसभा की यह विशेषता इसे और भी अधिक लोकतांत्रिक एवं सहभागी बनाती है क्योंकि इससे समाज में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रख्यात लोग भारतीय राजनीति के उच्चतम सोपानों तक अपनी राह नाते हैं।

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ

  • राज्य सूची के विषयों पर विधि-निर्माण: अनुच्छेद 249 संसद को राज्य सूची में सूचीबद्ध विषयों पर विधि-निर्माण की अनुमति देता है, यदि राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित करती है।
  • अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण: अनुच्छेद 312 संसद को संघ और राज्यों के लिये अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण करने की अनुमति देता है, यदि राज्यसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करती है।
  • राष्ट्रपति शासन की घोषणा: आमतौर पर ऐसी उद्घोषणाओं को संसद के दोनों सदनों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है।
    • लेकिन उद्घोषणा के समय यदि लोकसभा विघटित हो, तब राज्यसभा अकेले ही राष्ट्रपति शासन लगाने का अनुमोदन कर सकती है (अनुच्छेद 352, 356 और 360)।
      • वर्ष 1977 में तमिलनाडु एवं नगालैंड में राष्ट्रपति शासन का विस्तार करने हेतु और वर्ष 1991 में हरियाणा में राष्ट्रपति शासन लगाने हेतु विशेष रूप से राज्यसभा की बैठक आहूत की गई थी।
  • उपराष्ट्रपति को पद से हटाना: उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के लिये राज्यसभा ही पहल कर सकती है।
    • अभिप्राय यह है कि उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, लोकसभा में नहीं (अनुच्छेद 67)।

राज्यसभा से संबंधित चिंताएँ

  • राज्यसभा के संघीय चरित्र को नष्ट करना: जन प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 के माध्यम से संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 3 से ‘अधिवास’ (Domicile) शब्द का विलोपन कर दिया है।
    • यह समस्या ‘कुलदीप नैयर निर्णय’ से और बढ़ गई जिसने अधिवास की शर्त को हटा दिया।
    • संशोधन के बाद, कोई व्यक्ति जो किसी राज्य का न तो निवासी है और न ही अधिवासी, उस राज्य से राज्यसभा चुनाव लड़ सकता है।
      • सत्तारूढ़ दलों ने कई अवसरों पर लोकसभा चुनाव में पराजित रहे अपने उम्मीवारों को उच्च सदन में पहुँचाने के लिये राज्यसभा सीटों का इस्तेमाल किया है।
  • धन विधेयकों से संबंधित सीमित शक्तियाँ: धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं। राज्यसभा धन विधेयक में संशोधन करने या इसे अस्वीकृत करने की शक्ति भी नहीं रखती।
    • इसके लिये 14 दिनों के भीतर अपनी अनुशंसाओं के साथ या उसके बिना विधेयक को लोकसभा को वापस भेजना अनिवार्य है।
    • इस संबंध में लोकसभा राज्यसभा की किसी अनुशंसा या सभी अनुशंसाओं को स्वीकृत-अस्वीकृत कर सकने का स्वायत्त अधिकार रखती है।
    • दोनों ही मामलों में, इस धन विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
  • राज्यसभा को ‘बायपास’ करना:
    • कुछ मामलों में राज्यसभा को दरकिनार करते हुए हुए साधारण विधेयकों को धन विधेयक के रूप में पारित करते हुए देखा गया है, जो संसद के उच्च सदन की प्रभावशीलता को प्रश्नगत करता है।
  • संयुक्त बैठक के प्रावधान से संबद्ध समस्याएँ: किसी गतिरोध की स्थिति में राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है। ऐसे मामले में बैठक लोकसभा के ‘प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियम’ द्वारा शासित होती है, न कि राज्यसभा के नियमों द्वारा।
    • चूँकि संयुक्त बैठक में सामान्यतः लोकसभा के सदस्यों की संख्या अधिक होती है, राज्यसभा पर लोकसभा की इच्छा ही अधिभावी होती है।
  • अन्य सीमाएँ: अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) की पहल राज्यसभा में नहीं की जा सकती।
    • इसके अलावा, यह लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) के कार्यकरण में सीमित भूमिका ही रखती है और प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) में उसकी कोई भूमिका नहीं है।

गतिरोध की स्थितियाँ

  • लोकसभा और राज्यसभा के बीच गतिरोध की स्थिति में संसद की संयुक्त बैठक आहूत की जाती है। गतिरोध इन तीन स्थितियों में बनता है:
    • यदि विधेयक दूसरे सदन द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है।
    • यदि विधेयक में किये जाने वाले संशोधनों के बारे में सदनों ने अंततः असहमति जताई है।
    • यदि दूसरे सदन द्वारा विधेयक पारित किये बिना विधेयक की प्राप्ति की तारीख से छह महीने से अधिक बीत चुके हैं।
  • संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
  • संयुक्त बैठक का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों या वित्तीय विधेयकों पर लागू होता है, धन विधेयकों या संविधान संशोधन विधेयकों पर नहीं।

आगे की राह

  • राज्यसभा में प्रत्येक राज्य के लिये समान प्रतिनिधित्व के साथ संघवाद को उसके वास्तविक सार में सुनिश्चित करने हेतु एक तंत्र का होना आवश्यक है।
    • यह आवश्यक है ताकि बड़े राज्य सदन की कार्यवाही में हावी नहीं हो और हमारे लोकतंत्र का सुचारू संचालन हो सके।
  • उच्च सदन में चर्चा/बहस की गुणवत्ता में सुधार के लिये मनोनयन की एक बेहतर प्रक्रिया की आवश्यकता है।
  • यह भी महत्त्वपूर्ण है कि राज्य-विशिष्ट चिंताओं को इंगित करने वाली अधिकाधिक आवाज़ों को अवसर मिले और सरकार की ओर से इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी जाए।
  • इसके अतिरिक्त, सदन के अंदर व्यवधानों पर कम और चर्चा एवं बहस पर अधिक समय दिये जाने की आवश्यकता है ताकि सुनिश्चित हो सके कि सभी विधान उपयुक्त और उत्पादक संसदीय संवीक्षा से होकर गुज़रें।

निष्कर्ष

  • जीवंत बहसों एवं सूचना-पूर्ण चर्चाओं के साथ ही राष्ट्रहित में जटिल मुद्दों के प्रबंधन की क्षमता के साथ राज्यसभा ने एक यादगार यात्रा तय की है।
    • हालाँकि इसने गतिरोधों और व्यवधानों में वृद्धि भी देखी है जो निश्चित रूप से सभी हितधारकों के लिये चिंता का विषय है।
  • लेकिन भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव के बीच भी राज्यसभा राजनीतिक एवं सामाजिक मूल्यों की संरक्षक बनी रही है, वह संस्कृति एवं विविधता का आदान-प्रदान स्थल है और समग्र रूप से, भारत नामक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य की एक अथक ध्वजवाहक बनी रही है।

अभ्यास प्रश्न: अधिकाधिक कार्यकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने में राज्यसभा की भूमिका के संबंध में भारत में द्विसदनीय व्यवस्था के महत्त्व का आकलन करें।

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