भारतीय अर्थव्यवस्था
भारतीय रेलवे मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता
- 12 Feb 2026
- 161 min read
यह लेख 09/02/2026 को द हिंदू बिज़नेस लाइन में प्रकाशित “At a crossroads” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारतीय रेलवे के अभूतपूर्व पूंजीगत व्यय के साथ उसकी निरंतर बनी हुई वित्तीय एवं संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण करता है। इसमें तर्क दिया गया है कि किराया सुधार, माल ढुलाई में विविधता और संस्थागत दक्षता के बिना, दीर्घकालिक स्थिरता अनिश्चित बनी रहेगी।
प्रिलिम्स के लिये: डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, अमृत भारत योजना, कवच, पारगमन उन्मुख विकास, वर्ष 2030 तक नेट जीरो रेलवे।
मेन्स के लिये: भारतीय रेलवे में वर्तमान घटनाक्रम, रेलवे से जुड़े प्रमुख मुद्दे, आवश्यक उपाय।
भारतीय रेल, जिसे प्रायः देश की जीवनरेखा कहा जाता है, वर्तमान में एक संवेदनशील वित्तीय चरण से गुजर रही है। वित्त वर्ष 2026 में ₹2.5 लाख करोड़ तथा वित्त वर्ष 2027 में ₹2.78 लाख करोड़ की बजटीय सहायता के बावजूद, इसका परिचालन अनुपात 98 प्रतिशत से अधिक बना हुआ है, जिससे विस्तार हेतु आंतरिक अधिशेष सीमित रह गया है। माल ढुलाई से प्राप्त आय, जो कुल राजस्व का लगभग दो-तिहाई भाग है, अब भी अत्यधिक रूप से कोयले पर निर्भर (लगभग 50 प्रतिशत) बनी हुई है, जबकि भारत स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की दिशा में अग्रसर है। साथ ही, वेतन और पेंशन पर राजस्व का लगभग 68 प्रतिशत व्यय हो जाने से, तीव्र गति से विकसित होती अर्थव्यवस्था में रेलवे को वित्तीय स्थिरता तथा लॉजिस्टिक्स रूपांतरण की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
भारतीय रेलवे क्षेत्र में वर्तमान विकास क्या है?
- DFC और लॉजिस्टिक्स लागत में कमी: मालवाहक अवसंरचना को सुदृढ़ करना भारत की आर्थिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने और लॉजिस्टिक्स अक्षमताओं को घटाने का केंद्रीय आधार बन गया है।
- वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, (WDFC) पूर्ण रूप से चालू होने के अवस्था में है, जिसके माध्यम से दादरी को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) से निर्बाध रूप से जोड़ा जाना संभव होगा।
- यात्री और माल यातायात के पृथक्करण से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत में संरचनात्मक कमी आ रही है, जो लगभग 14% से घटकर एकल अंकों की ओर अग्रसर है, क्योंकि इससे डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनों का संचालन 50 किमी प्रति घंटे से अधिक की औसत गति पर संभव हो पा रहा है।
- उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में भारतीय रेलवे का माल ढुलाई स्तर 1.6 अरब टन से अधिक रहा, जो वित्त वर्ष 2024 की तुलना में सीमित किंतु सकारात्मक विस्तार को दर्शाता है।
- वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, (WDFC) पूर्ण रूप से चालू होने के अवस्था में है, जिसके माध्यम से दादरी को जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) से निर्बाध रूप से जोड़ा जाना संभव होगा।
- कवच- सुरक्षा नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण: वर्ष 2025 में सफल परीक्षणों के उपरांत, दिल्ली–मुंबई तथा दिल्ली–हावड़ा जैसे उच्च घनत्व गलियारों पर कवच (स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली) की स्थापित क्षमता उल्लेखनीय स्तर तक पहुँच चुकी है।
- अब नीति का ध्यान 'ट्रैक कवरेज' से हटकर 'लोको-इंटीग्रेशन' की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिससे सिग्नल पासिंग एट डेंजर (SPAD) जैसी घटनाओं की रोकथाम सीधे रोलिंग स्टॉक स्तर पर सुनिश्चित की जा सके।
- जनवरी 2026 तक 1,306 किलोमीटर मार्ग पर कवच 4.0 प्रणाली क्रियाशील हो चुकी थी, जबकि बजट 2026-27 में रेलवे सुरक्षा मद हेतु लगभग ₹1.20 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है।
- अब नीति का ध्यान 'ट्रैक कवरेज' से हटकर 'लोको-इंटीग्रेशन' की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिससे सिग्नल पासिंग एट डेंजर (SPAD) जैसी घटनाओं की रोकथाम सीधे रोलिंग स्टॉक स्तर पर सुनिश्चित की जा सके।
- दुर्गम क्षेत्रों में रणनीतिक रेल विस्तार: रेलवे ने वाणिज्यिक व्यवहार्यता से आगे बढ़कर रणनीतिक एकीकरण को प्राथमिकता देते हुए हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के कठिनतम भूभागों में संपर्क बढ़ाया है।
- यह ‘इंजीनियरिंग कूटनीति’ न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों की राष्ट्रीय सुरक्षा को बल प्रदान करती है, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक एकीकरण को भी प्रोत्साहित करती है।
- उदाहरण के लिये, अप्रैल 2025 में न्यू पंबन वर्टिकल-लिफ्ट ब्रिज का उद्घाटन हुआ तथा उधमपुर–श्रीनगर–बारामुला रेल लिंक (USBRL) के पूर्ण संचालन से कश्मीर घाटी राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जुड़ गई।
- इसके अलावा, भारतीय प्रधानमंत्री ने आइज़ोल में बैराबी-सैरांग ब्रॉड गेज रेलवे लाइन का उद्घाटन किया, जिससे भूमि से घिरे मिज़ोरम को रेल संपर्क के माध्यम से देश के शेष हिस्सों से जोड़ा गया।
- यह ‘इंजीनियरिंग कूटनीति’ न केवल सीमावर्ती क्षेत्रों की राष्ट्रीय सुरक्षा को बल प्रदान करती है, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक एकीकरण को भी प्रोत्साहित करती है।
- फ्लीट मानकीकरण एवं वंदे भारत स्लीपर: बहुप्रतीक्षित वंदे भारत स्लीपर ट्रेनसेट को जनवरी 2026 में व्यावसायिक रूप से लॉन्च किया गया, जो घरेलू हवाई यात्रा को प्रतिस्पर्द्धा देने हेतु 'केवल गति' से आगे बढ़कर 'रात्रिकालीन आरामदायक यात्रा' की ओर एक संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है।
- इस पहल का उद्देश्य उन्नत सवारी गुणवत्ता (कंपन रहित यात्रा) सुनिश्चित करना तथा गोल्डन क्वाड्रिलैटरल मार्गों पर राजधानी ट्रेनों की तुलना में यात्रा समय को लगभग 15–20% तक घटाकर प्रीमियम यात्री वर्ग को पुनः आकर्षित करना है।
- उदाहरण के लिये, वंदे भारत स्लीपर (हावड़ा–गुवाहाटी) सेवा ने यात्रा अवधि को लगभग तीन घंटे कम कर दिया है।
- 'स्वरेल' सुपर ऐप और डिजिटल एकीकरण: रेल मंत्रालय ने डिजिटल विभाजन को समाप्त करने तथा विशाल यात्री डेटा पारितंत्र का मुद्रीकरण करने के लिये 'स्वरेल' सुपर ऐप (जो IRCTC, UTS और रेल मदद को एकीकृत करता है) का बीटा संस्करण लॉन्च किया है।
- यह प्लेटफॉर्म भारतीय रेलवे को 'टिकट प्रदाता' से 'समेकित गतिशीलता सेवा प्रदाता' में रूपांतरित करता है, जहाँ एक ही PNR के माध्यम से निर्बाध बहु-मोडल कनेक्टिविटी (रेल तथा अंतिम-मील टैक्सी/मेट्रो) उपलब्ध कराई जाती है।
- यह ऐप प्रतिदिन 1.5 लाख टिकट बुकिंग की क्षमता को एकीकृत करता है। इसका उद्देश्य अनारक्षित (UTS) और आरक्षित टिकटों को एक ही इंटरफ़ेस में मिलाकर 'डिजिटल विभाजन' को कम करना भी है।
- भारत की हाई-स्पीड रेल की दिशा में प्रगति: मुंबई–अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) परियोजना सूरत–बिलिमोरा खंड में अंतिम पूर्व-चालन चरण में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ महाराष्ट्र और गुजरात में 100% भूमि अधिग्रहण पूर्ण हो गया है।
- अब परियोजना का ध्यान सिविल संरचना (पियर्स एवं वायाडक्ट) से हटकर ट्रैक बिछाने तथा सिग्नलिंग प्रणालियों पर केंद्रित हो गया है, जिससे भारत के हाई-स्पीड रेल वाले देशों के विशिष्ट समूह में सम्मिलित होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
- इसके अतिरिक्त, खबरों के अनुसार जापान द्वारा भारत को शिंकानसेन तकनीक पर आधारित दो ट्रेनसेट (E5 और E3 शृंखला) प्रदान करने की योजना भी इस सहयोग को और सुदृढ़ करती है।
- अब परियोजना का ध्यान सिविल संरचना (पियर्स एवं वायाडक्ट) से हटकर ट्रैक बिछाने तथा सिग्नलिंग प्रणालियों पर केंद्रित हो गया है, जिससे भारत के हाई-स्पीड रेल वाले देशों के विशिष्ट समूह में सम्मिलित होने का मार्ग प्रशस्त होता है।
- परिचालन अनुपात के माध्यम से वित्तीय सुदृढ़ीकरण: अत्यधिक पूंजीगत व्यय के बावजूद, भारतीय रेलवे ने परिचालन व्यय नियंत्रण और गैर-किराया राजस्व (विज्ञापन, परिसंपत्ति मुद्रीकरण) के हिस्से को बढ़ाकर अपनी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है।
- परिचालन अनुपात (OR) में मामूली लेकिन महत्त्वपूर्ण सुधार ने यह संकेत दिया कि रेलवे अत्यधिक बजट निर्भरता के बिना मूल्यह्रास और पेंशन देनदारियों को कवर करने के लिये पर्याप्त अधिशेष उत्पन्न कर रहा है।
- उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में परिचालन अनुपात 98.32% तक पहुँच गया, जो वित्त वर्ष 2024 में 98.43% था।
- इसके अलावा कोयले की ढुलाई से आय में लगभग 7% की वृद्धि के कारण सकल यातायात प्राप्तियाँ ₹2.65 लाख करोड़ तक पहुँच गईं।
- ऊर्जा परिवर्तन की त्वरित प्रक्रिया: भारतीय रेलवे ने 'नेट जीरो 2030' लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 100% विद्युतीकरण प्रभावी ढंग से प्राप्त कर लिया है और मुख्य लाइनों से डीज़ल इंजनों को चरणबद्ध रूप से हटाया जा रहा है।
- वर्तमान में मुख्य ज़ोर 'सौर ऊर्जा संयंत्रों' को स्थापित करने और ओपन एक्सेस के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा प्राप्त करने पर है ताकि बिजली बिल को कम किया जा सके, जो कर्मचारियों की लागत के बाद दूसरा सबसे बड़ा व्यय मद है।
- उदाहरण के लिये, नवंबर 2025 तक, भारतीय रेलवे ने 898 मेगावाट सौर ऊर्जा स्थापित की है। इसमें से 629 मेगावाट का उपयोग सीधे कर्षण (ट्रैकिंग) के लिये किया जाता है और 269 मेगावाट का उपयोग स्टेशन प्रकाश व्यवस्था जैसी गैर-कर्षण आवश्यकताओं के लिये किया जाता है।
- वर्तमान में मुख्य ज़ोर 'सौर ऊर्जा संयंत्रों' को स्थापित करने और ओपन एक्सेस के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा प्राप्त करने पर है ताकि बिजली बिल को कम किया जा सके, जो कर्मचारियों की लागत के बाद दूसरा सबसे बड़ा व्यय मद है।
- अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत अवसंरचना पुनरुद्धार: अमृत भारत योजना के अंतर्गत 1,300 से अधिक स्टेशनों का आधुनिकीकरण 'सजावटी सुधार' से आगे बढ़कर 'शहरी केंद्रों' के निर्माण की दिशा में अग्रसर है, जिससे शहर के दोनों ओर का एकीकरण हो सके।
- यह केवल दिखावटी नहीं बल्कि आर्थिक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है, छत पर प्लाजा और वाणिज्यिक स्थान विकसित करके रेलवे स्टेशनों को 24/7 शहरी आर्थिक केंद्रों में बदल रहा है। उदाहरणस्वरूप, वित्त वर्ष 2025 में ₹12,000 करोड़ के पूंजीगत व्यय के साथ 50 प्रमुख स्टेशनों का सक्रिय पुनर्विकास किया गया।
- यह विकास केवल सौंदर्यपरक नहीं बल्कि आर्थिक भी है, जिसमें रूफ प्लाज़ा और वाणिज्यिक स्थलों के माध्यम से रेलवे स्टेशनों को 24×7 शहरी आर्थिक केंद्रों में रूपांतरित किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में ₹12,000 करोड़ के पूंजीगत व्यय के साथ 50 प्रमुख स्टेशनों का सक्रिय रूप से पुनर्विकास किया जा रहा है।
- अति-विस्तार और क्षेत्रीय एकीकरण (RRTS और मेट्रो मेश): भारत ने पृथक शहर-महानगरों से क्षेत्रीय रूप से एकीकृत 'मेश नेटवर्क' मॉडल में परिवर्तन किया है, जो अर्द्ध-उच्च गति RRTS (नमो भारत) के माध्यम से उपनगरों को आर्थिक केंद्रों से प्रभावी रूप से जोड़ता है तथा आर्थिक 'मेगा-क्षेत्रों' के निर्माण के लिये 'एक राष्ट्र, एक कार्ड' (NCMC) के माध्यम से पहुँच को मानकीकृत करता है।
- शहर के भीतर की कनेक्टिविटी से शहरों के बीच की कनेक्टिविटी की ओर यह परिवर्तन शहरीकरण का विकेंद्रीकरण करता है और महानगरों के आवास तथा बाज़ारों पर दबाव कम करता है।
- उदाहरण के लिये, भारत का परिचालन मेट्रो नेटवर्क वर्ष 2014 में 5 शहरों में फैले 248 किमी से बढ़कर मई 2025 तक 23 शहरों में 1,013 किमी हो गया है।
- शहर के भीतर की कनेक्टिविटी से शहरों के बीच की कनेक्टिविटी की ओर यह परिवर्तन शहरीकरण का विकेंद्रीकरण करता है और महानगरों के आवास तथा बाज़ारों पर दबाव कम करता है।
भारतीय रेलवे क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- सुरक्षा आधुनिकीकरण (कवच) एवं वित्तीय जटिलताएँ: हालाँकि सुरक्षा मानकों में सुधार हुआ है, किंतु स्वदेशी कवच सुरक्षा प्रणाली की स्थापना उच्च-घनत्व नेटवर्क पर समय-सीमाओं को पूरा करने में सुस्त रही है।
- 68,000 किलोमीटर से अधिक के नेटवर्क को कवर करने में धीमी प्रगति के कारण मानवीय त्रुटियों के जोखिम बने हुए हैं। जनवरी 2026 तक केवल लगभग 1,306.3 किलोमीटर मार्ग पर कवच संस्करण 4.0 संचालित हो पाया।
- हालाँकि 2024-25 में दुर्घटनाओं की संख्या घटकर 31 हो गई, लेकिन गैर-कवच मार्गों पर जोखिम अभी भी काफी अधिक बना हुआ है।
- 68,000 किलोमीटर से अधिक के नेटवर्क को कवर करने में धीमी प्रगति के कारण मानवीय त्रुटियों के जोखिम बने हुए हैं। जनवरी 2026 तक केवल लगभग 1,306.3 किलोमीटर मार्ग पर कवच संस्करण 4.0 संचालित हो पाया।
- वित्तीय अस्थिरता और पेंशन बोझ: परिचालन अनुपात लगातार उच्च बना हुआ है, जो दर्शाता है कि रेलवे अपनी आय का अधिकतर हिस्सा केवल परिचालन के लिये खर्च कर देता है, जिससे महत्त्वपूर्ण सुरक्षा पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) के लिये नगण्य अधिशेष बचता है।
- कार्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा पेंशन बिल में खर्च हो जाता है, जो बैलेंस शीट पर एक बोझ की तरह काम करता है, जिससे किसी भी आधुनिकीकरण के लिये सकल बजटीय सहायता (GBS) पर निर्भरता अनिवार्य हो जाती है।
- उदाहरण के लिये, बजट दस्तावेज़ों के अनुसार, पेंशन पर व्यय वर्ष 2024-25 में 58844.07 करोड़ रुपये था, जिसके वर्ष 2026-27 में बढ़कर 74500 करोड़ रुपये होने की संभावना है।
- कार्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा पेंशन बिल में खर्च हो जाता है, जो बैलेंस शीट पर एक बोझ की तरह काम करता है, जिससे किसी भी आधुनिकीकरण के लिये सकल बजटीय सहायता (GBS) पर निर्भरता अनिवार्य हो जाती है।
- क्रॉस-सब्सिडीकरण दुविधा: भारतीय रेलवे यात्री किराया कम रखने हेतु माल ग्राहकों से अधिक शुल्क वसूलता है, जिससे उच्च-मूल्य वाले माल (FMCG, ऑटो) सड़क मार्ग की ओर चला जाता है।
- इसका परिणाम यह होता है कि समय-संवेदनशील वस्तुओं के लिये रेल माल ढुलाई अप्रतिस्पर्द्धी रहती है, रेलवे थोक वस्तु (कोयला/लौह अयस्क) जाल में फँस जाता है और लॉजिस्टिक्स बाज़ार खो देता है।
भारत में माल ढुलाई की दरें वैश्विक मानकों की तुलना में काफी अधिक हैं, जिसके परिणामस्वरूप माल ढुलाई में रेल की हिस्सेदारी 29% पर स्थिर हो गई है, जो राष्ट्रीय रेल योजना के 45% के लक्ष्य से कम है।
- इसका परिणाम यह होता है कि समय-संवेदनशील वस्तुओं के लिये रेल माल ढुलाई अप्रतिस्पर्द्धी रहती है, रेलवे थोक वस्तु (कोयला/लौह अयस्क) जाल में फँस जाता है और लॉजिस्टिक्स बाज़ार खो देता है।
- अभिजात्यीकरण और जनरल क्लास पर दबाव: वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनों के बढ़ते विस्तार से सामान्य और स्लीपर श्रेणी की बोगियों में कटौती हो रही है जो अब एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक आलोचना का विषय बन चुकी है।
- इस 'अभिजात्य पूर्वाग्रह' के कारण नॉन-एसी कोच अत्यधिक भीड़भाड़ वाले हो गए हैं, जिससे प्रवासी और कम आय वर्ग अलग-थलग रह जाते हैं।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2024-25 में 651 करोड़ यात्रियों ने सामान्य कोचों का उपयोग किया, जो 2022-23 की तुलना में 17% अधिक है, फिर भी उन्हें सीमित क्षमता का सामना करना पड़ा।
- इस 'अभिजात्य पूर्वाग्रह' के कारण नॉन-एसी कोच अत्यधिक भीड़भाड़ वाले हो गए हैं, जिससे प्रवासी और कम आय वर्ग अलग-थलग रह जाते हैं।
- सुरक्षा श्रेणियों में दीर्घकालिक मानव संसाधन कमी: ट्रैक मेंटेनर्स, लोको पायलट और स्टेशन मास्टर जैसे महत्त्वपूर्ण सुरक्षा पदों की रिक्तियों को भरने में देरी ने कर्मचारियों में थकान और लंबित रखरखाव का एक खतरनाक चक्र उत्पन्न कर दिया है।
- भर्ती अभियान की घोषणाओं और वास्तविक तैनाती के बीच समयांतराल के कारण ज़मीनी स्तर के कर्मचारी निर्धारित कार्य घंटों से अधिक काम करते हैं।
- ऑल इंडिया रेलवेमेन फेडरेशन (AIRF) के अनुसार, रेलवे बोर्ड द्वारा हाल ही में 22,000 एंट्री-लेवल पदों को भरने की मंजूरी वास्तविक रिक्तियों की तुलना में कम है, जिससे सुरक्षा जोखिम बढ़ रहा है।
- अवसंरचना पर भार और क्षमता सीमाएँ: रेल नेटवर्क गंभीर अत्यधिक क्षमता से ग्रस्त है, जहाँ समान ट्रैक पर 'मिश्रित यातायात' (धीमी मालगाड़ी + तेज़ यात्री) दोनों की औसत गति को कम कर देता है।
- डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के आंशिक रूप से चालू होने के बावजूद, उनसे जुड़ने वाले 'फीडर ट्रैक' अभी भी अवरुद्ध हैं, जिससे गति लाभ कम हो जाता है।
- हालाँकि फरवरी 2026 तक डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) 96.4% चालू हो चुके हैं, फिर भी पारंपरिक फीडर ट्रैक पर माल ढुलाई को यात्री ट्रैफिक से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है।
- अमृत भारत स्टेशन के पुनर्निर्माण में परिचालन विलंब: महत्त्वाकांक्षी अमृत भारत स्टेशन योजना को कार्यान्वयन संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ा है, जहाँ सैकड़ों सक्रिय स्टेशनों पर एक साथ निर्माण कार्य के कारण यात्रियों को गंभीर असुविधा और सुरक्षा संबंधी खतरे उत्पन्न हुए हैं।
- उदाहरण के लिये, अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत गाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन के 350 करोड़ रुपये के नवीनीकरण में काफी विलंब हो रहा है और फरवरी 2026 तक केवल 40% काम ही पूरा हुआ है।
भारतीय रेलवे को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- पूर्वानुमानात्मक रख-रखाव के लिये 'डिजिटल ट्विन' को क्रियान्वित करना: भारतीय रेल को 'कैलेंडर-आधारित' रख-रखाव से हटकर 'स्थिति-आधारित' रख-रखाव की ओर बढ़ना चाहिये। इसके लिये पटरियों, पुलों तथा रोलिंग स्टॉक जैसी भौतिक परिसंपत्तियों का रियल-टाइम 'डिजिटल ट्विन' तैयार किया जाना चाहिये।
- पहियों और पटरियों पर IoT सेंसर तथा ध्वनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करके दरार या बेयरिंग विफलता जैसी समस्याओं का कई सप्ताह पहले पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।
- यह सक्रिय दृष्टिकोण सुरक्षा से जुड़ी 'कमियों' को समाप्त करता है, जिससे पटरी से उतरने की घटनाओं का जोखिम बहुत हद तक कम हो जाता है तथा रख-रखाव के लिये उपलब्ध समय का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होता है
- एक स्वतंत्र नियामक के माध्यम से टैरिफ को युक्तिसंगत बनाना: किराया निर्धारण को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और माल ढुलाई दरों को यात्री सब्सिडी से अलग करने के लिये सरकार को एक वैधानिक रेल नियामक प्राधिकरण की स्थापना करनी चाहिये।
- इस तंत्र को आगत लागत (ऊर्जा, कर्मचारी) के आधार पर आवधिक किराया संशोधन के लिये एक पारदर्शी सूत्र स्थापित करना चाहिये, जिससे वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
- माल ढुलाई से 'क्रॉस-सब्सिडी का बोझ' हटाकर रेलवे को सड़क परिवहन के मुकाबले उच्च-मूल्य लॉजिस्टिक्स में पुनः प्रतिस्पर्द्धी बनाया जा सकता है।
- सामान्य वर्ग के लिये 'न्यूनतम क्षमता गारंटी' को संस्थागत रूप देना: 'अभिजात्य पूर्वाग्रह' को संतुलित करने के लिये नीति के माध्यम से सभी लंबी दूरी की ट्रेनों में अनारक्षित तथा स्लीपर डिब्बों का एक न्यूनतम अनुपात अनिवार्य किया जाना चाहिये, चाहे प्रीमियम ‘वंदे भारत’ सेट के लिये कितना भी दबाव क्यों न हो।
- इसके लिये किफायती किराये पर प्रीमियम ट्रेनों के समान गति देने वाली उच्च-घनत्व वाली 'अमृत भारत' पुश-पुल ट्रेनों की तैनाती की जानी चाहिये।
- इससे रेलवे का 'सामाजिक अनुबंध' पुनर्स्थापित होगा, भीड़भाड़ कम होगी और प्रवासी श्रमिकों के लिये सम्मानजनक यात्रा सुनिश्चित हो सकेगी।
- वस्तु परिवहन को 'व्हाइट गुड्स' तथा पार्सल लॉजिस्टिक्स में विविधीकृत करना: रेलवे के वस्तु परिवहन को कोयला व लौह अयस्क जैसी थोक वस्तुओं तक सीमित रखने के बजाय एक समर्पित 'तेज़ी से बिकने वाले उपभोक्ता वस्तु (FMCG) इकोसिस्टम' विकसित किया जाना चाहिये।
- इसके लिये छोटे आकार के कंटेनरों का मानकीकरण करना और समय-सारणीबद्ध पार्सल ट्रेनों को शुरू करना आवश्यक है जो ई-कॉमर्स आपूर्ति शृंखलाओं के साथ निर्बाध रूप से एकीकृत हो सकें।
- इस उच्च-लाभकारी 'रिटेल लॉजिस्टिक्स' बाज़ार में हिस्सेदारी बढ़ाना ऊर्जा तथा इस्पात क्षेत्रों की अस्थिरता से राजस्व को सुरक्षित रखने का एकमात्र धारणीय उपाय है।
- इसके लिये छोटे आकार के कंटेनरों का मानकीकरण करना और समय-सारणीबद्ध पार्सल ट्रेनों को शुरू करना आवश्यक है जो ई-कॉमर्स आपूर्ति शृंखलाओं के साथ निर्बाध रूप से एकीकृत हो सकें।
- DFC के लिये 'फीडर रूट'अवरोधों का समाधान: निवेश का केंद्र मुख्य समर्पित माल गलियारों (DFC) से हटाकर उन 'फीडर और कनेक्टर' मार्गों के उन्नयन पर होना चाहिये जो औद्योगिक भीतरी क्षेत्रों को DFC की मुख्य शृंखला से जोड़ते हैं।
- जब तक इन एकल-पटरी वाले मार्गों को दोहरी लाइन एवं विद्युतीकृत पटरियों में परिवर्तित नहीं किया जायेगा, तब तक DFC की उच्च-गति क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हो सकेगा।
- 'हब-एंड-स्पोक' एकीकरण रणनीति यह सुनिश्चित करती है कि कॉरिडोर पर प्राप्त लॉजिस्टिक्स की गति अंतिम-बिंदु की भीड़भाड़ में नष्ट न हो जाए।
- जब तक इन एकल-पटरी वाले मार्गों को दोहरी लाइन एवं विद्युतीकृत पटरियों में परिवर्तित नहीं किया जायेगा, तब तक DFC की उच्च-गति क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं हो सकेगा।
- कर्मचारियों की सुरक्षा के लिये बायो-मैथमेटिकल रोस्टरिंग लागू करना: थकान के कारण होने वाली मानवीय त्रुटियों को समाप्त करने के लिये रेलवे को केवल कार्य अवधि (Duty Hours) के बजाय दैनिक जैविक चक्र (सर्केडियन रिद्म) के आधार पर चालक दल के समय-सारणी प्रबंधन हेतु बायो-मैथमेटिकल रोस्टरिंग सॉफ्टवेयर अपनाना चाहिये।
- इसके साथ लोको पायलटों के लिये उच्च-गति सिग्नलिंग परिस्थितियों से निपटने हेतु AR/VR आधारित अनिवार्य सिम्युलेटर प्रशिक्षण जोड़ा जाना चाहिये।
- सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कर्मचारियों के संज्ञानात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि फिज़िकल सिग्नलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को उन्नत करना।
- इसके साथ लोको पायलटों के लिये उच्च-गति सिग्नलिंग परिस्थितियों से निपटने हेतु AR/VR आधारित अनिवार्य सिम्युलेटर प्रशिक्षण जोड़ा जाना चाहिये।
- ट्रांज़िट-ऑरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) के माध्यम से मूल्य सृजन: स्टेशन के पुनर्विकास का ध्यान केवल सतही दिखावटी उन्नयन तक सीमित न रहकर पटरियों और यार्डों के ऊपर के ऊर्ध्वाधर वायु-क्षेत्र के व्यावसायिक उपयोग पर आधारित गहन TOD पर होना चाहिये।
- स्टेशनों से एकीकृत मिश्रित-उपयोग वाले वाणिज्यिक तथा आवासीय केंद्र विकसित करके रेलवे दीर्घकालिक 'गैर-किराया राजस्व' उत्पन्न कर सकती है।
- यह 'भूमि-मूल्य अधिग्रहण' मॉडल एक वित्तीय सुरक्षा कवच बनाता है, जो टिकट बिक्री और सरकारी बजटीय समर्थन से स्वतंत्र होता है।
- 'कैप्टिव ग्रीन एनर्जी माइक्रो-ग्रिड' की स्थापना: केवल विद्युतीकरण तक सीमित रहने के बजाय रेलवे को अपने विशाल खाली भूमि बैंक का उपयोग कर कैप्टिव सौर तथा पवन ऊर्जा पार्क स्थापित करने चाहिये तथा ओपन एक्सेस नियमों के तहत सीधे बिजली प्राप्त करनी चाहिये।
- यह रणनीति एक आंतरिक 'ऊर्जा सूक्ष्म ग्रिड' का निर्माण करती है जो रेलवे को राज्य के DISCOM द्वारा लगाए जाने वाले अस्थिर वाणिज्यिक शुल्कों से बचाती है। इसके अलावा, दूरस्थ विरासत मार्गों पर हाइड्रोजन-ईंधन चालित ट्रेनों का पायलट संचालन 'नेट ज़ीरो 2030' के लक्ष्य को साकार करने की दिशा में एक समग्र कदम होगा।
निष्कर्ष:
भारतीय रेलवे वर्तमान में ऐसे संरचनात्मक संक्रमण-बिंदु पर खड़ा है जहाँ अभूतपूर्व पूंजी निवेश को प्रणालीगत दक्षता और वित्तीय स्थिरता में रूपांतरित करना आवश्यक हो गया है। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, वंदे भारत सेवाओं के विस्तार तथा लगभग पूर्ण विद्युतीकरण जैसी पहलें आधुनिकीकरण की दिशा में प्रगति का संकेत देती हैं। लेकिन क्रॉस-सब्सिडी, पेंशन का भार और क्षमता संतृप्ति जैसी दीर्घकालीन संरचनात्मक चुनौतियाँ अब भी यथावत बनी हुई हैं। इस क्षेत्र की दीर्घकालिक व्यवहार्यता किराया युक्तिकरण, माल ढुलाई में विविधीकरण, सुरक्षा एवं प्रौद्योगिकी के एकीकृत उपयोग तथा संस्थागत सुधारों पर निर्भर करेगी।
विस्तार-केंद्रित दृष्टिकोण से दक्षता-आधारित परिवर्तन की ओर सुविचारित संक्रमण ही यह निर्धारित करेगा कि भारतीय रेलवे देश की उभरती हुई लॉजिस्टिक्स क्रांति की आधारशिला बनेगा अथवा वित्तीय रूप से सीमित रहेगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न अभूतपूर्व पूंजीगत व्यय के बावजूद, भारतीय रेलवे को संरचनात्मक वित्तीय और परिचालन संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। इसका समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. परिचालन अनुपात (OR) क्या है?
यह कुल राजस्व का वह प्रतिशत है, जो परिचालन व्यय पर खर्च किया जाता है; OR जितना कम होगा, वित्तीय स्वास्थ्य उतना ही अच्छा माना जाता है।
प्रश्न 2. कवच 4.0 क्या है?
यह एक स्वदेशी स्वचालित ट्रेन संरक्षण प्रणाली है, जिसका उद्देश्य सिग्नल एट डेंजर (SPAD) की घटनाओं को रोकना है।
प्रश्न 3. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) का उद्देश्य क्या है?
माल ढुलाई और यात्री यातायात को अलग करना तथा लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना।
प्रश्न 4. रेलवे में क्रॉस-सब्सिडीकरण क्या है?
माल ढुलाई से प्राप्त आय का उपयोग यात्री किराए को सब्सिडी देने हेतु किया जाना।
प्रश्न 5. अमृत भारत स्टेशन योजना क्या है?
1,300 से अधिक रेलवे स्टेशनों को एकीकृत शहरी हब के रूप में आधुनिकीकृत करने की परियोजना।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. भारतीय रेलवे द्वारा उपयोग किये जाने वाले जैव-शौचालय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2015)
- जैव-शौचालय में मानव अपशिष्ट का अपघटन एक कवक इनोकुलम द्वारा शुरू किया जाता है।
- इस अपघटन में अमोनिया और जलवाष्प एकमात्र अंतिम उत्पाद हैं जो वायुमंडल में निर्मुक्त होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)