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संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की ज़रूरत

  • 20 Feb 2019
  • 14 min read

संदर्भ

16वीं लोकसभा का अंतिम सत्र अभी हाल ही समाप्त हुआ है। संभावना है कि 17वीं लोकसभा के लिये चुनावों का एलान मार्च की शुरुआत में हो जाएगा और अप्रैल-मई महीनों में चुनाव संपन्न हो जाएंगे। चुनावी चर्चाओं में वोट शेयर, सेटों, गठबंधनों का बाज़ार तो गर्म है ही, साथ ही प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसके कयास भी लगाए जाने लगे हैं। लेकिन संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर कोई चर्चा नहीं है और न ही इस मुद्दे पर किसी राजनीतिक दल की कोई रुचि दिखाई देती है।

जहाँ तक संसद के निचले सदन (Lower House-भारत में लोकसभा) की बात है तो महिला सांसदों के प्रतिशत के मामले में भारत विश्व में 193 देशों में 153वें स्थान पर है।

अफ्रीकी देश रवांडा में हैं सबसे अधिक महिला सांसद

आश्चर्यजनक रूप से लंबे समय तक गृहयुद्ध की आँच में झुलसने वाले अल्पविकसित अफ्रीकी देश रवांडा की संसद में महिलाओं की संख्या सबसे ज़्यादा है। Inter-Parliamentary Union की एक रिपोर्ट के अनुसार, रवांडा के निचले सदन (The Chamber of Deputies) में 61% संख्या महिलाओं की है। रवांडा दुनिया का पहला देश है जिसकी संसद में महिलाएँ पुरुषों से अधिक हैं। जनसंहार के बाद निर्मित रवांडा का संविधान संसद में महिलाओं के लिये तीस फीसदी सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है। लेकिन उसने पहले से ही अपने संसद में सबसे अधिक महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का रिकॉर्ड कायम रखा है।

महिला सांसदों के वैश्विक आँकड़ों पर एक नज़र

Women in india

  • क्षेत्रवार देखा जाए तो नॉर्डिक (Nordic) देशों में महिला सांसदों का प्रतिशत सबसे अधिक है। इनमें डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन जैसे स्कैंडीनेवियाई देशों के साथ फिनलैंड, आइसलैंड और फैरो (Faroe) आइलैंड शामिल हैं।
  • UK और USA में यह क्रमशः 32 और 23 प्रतिशत है। देखने में USA में यह प्रतिशत भले ही कम दिखाई दे रहा है, लेकिन वहाँ कांग्रेस के लिये हुए हालिया चुनावों में महिलाओं ने अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
  • यहाँ तक कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की स्थिति हमसे बेहतर है, वहाँ की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 20% है।

एशियाई और सार्क देशों की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

Women in asiaभारत में क्या है स्थिति

  • 2014 में हुए चुनावों में भारत की संसद के निचले सदन लोकसभा के लिये चुने गए 545 सदस्यों में 65 महिलाएँ चुनकर आईं, जो कुल संख्या का 12% है। यह लोकसभा का 16वाँ चुनाव था।
  • आज़ादी के बाद केवल 15वीं और 16वीं लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी देखने को मिली, जो इससे पहले 9% से कम रहती थी।

भारतीय चुनाव प्रणाली में लोकसभा में प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर है। ऐसे में सर्वाधिक जनसंख्या वाले (लगभग 200 मिलियन) राज्य उत्तर प्रदेश से 80 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं, लगभग 100 मिलियन जनसंख्या वाला राज्य बिहार 40 सांसदों को लोकसभा में भेजता है। इसी तरह लगभग 114 मिलियन जनसंख्या वाले राज्य महाराष्ट्र से 48 सांसद लोकसभा के लिये चुने जाते हैं।

  • इसके विपरीत पूर्वोत्तर में असम को छोड़कर शेष सात राज्यों- अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर, नगालैंड, मिज़ोरम, मेघालय और सिक्किम से बहुत कम सांसदों को लोकसभा में जगह मिलती है। इसका एकमात्र कारण इन राज्यों में जनसंख्या बेहद कम होना है।
  • उत्तर प्रदेश से महिला सांसदों का राष्ट्रीय औसत प्रतिनिधित्व 17.5% (14 सांसद) अपेक्षाकृत कुछ बेहतर है, जबकि महाराष्ट्र में यह केवल 12.5% (6 सांसद) और बिहार केवल 7.9% (3 सांसद) है।
  • जबकि जनसंख्या के अनुसार राज्यों में लोकसभा की कुल सीटों का आवंटन होता है, ऐसे में देश की आधी आबादी (महिलाओं) का प्रतिनिधित्व मात्र 12 प्रतिशत है, जो कि बेहद कम है और इसमें निश्चित ही सुधार की आवश्यकता है।
  • देश में राज्यों की विधानसभाओं की बात करें तो स्थिति और भी शोचनीय दिखाई देती है। सभी विधानसभाओं में महिला सदस्यों का राष्ट्रीय औसत केवल 9% है। इनमें बिहार, राजस्थान और हरियाणा विधानसभाओं में महिलाओं का 14% प्रतिनिधित्व है, जबकि पुद्दुचेरी और नगालैंड की विधानसभाओं में एक भी महिला सदस्य नहीं है।

क्या हैं प्रमुख चुनौतियाँ

महिला आरक्षण विधेयक, 2008 (108वाँ संविधान संशोधन विधेयक) को राज्यसभा ने 9 मार्च 2010 को पारित किया था, लेकिन 9 साल बीतने के बाद भी यह लोकसभा से पारित नहीं हो पाया है। लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो जाने की वज़ह से यह विधेयक रद्द हो जाता है। इस विधेयक में महिलाओं के लिये लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

  • महिलाओं को नीति निर्धारण में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने के पीछे निरक्षरता भी एक बड़ा कारण है। अपने अधिकारों को लेकर पर्याप्त समझ न होने के कारण महिलाओं को अपने मूल और राजनीतिक अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं हो पाती।
  • शिक्षा, संसाधनों/संपत्ति का स्वामित्व और रोज़मर्रा के काम में पक्षपाती दृष्टिकोण जैसे मामलों में होने वाली लैंगिक असमानताएँ महिला नेतृत्व के उभरने में बाधक बनती हैं।
  • कार्यों और परिवार का दायित्व: महिलाओं को राजनीति से दूर रखने में पुरुषों और महिलाओं के बीच घरेलू काम का असमान वितरण भी महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को परिवार में अधिक समय देना पड़ता है और घर तथा बच्चों की देखभाल का ज़िम्मा प्रायः महिलाओं को ही संभालना पड़ता है। बच्चों की आयु बढ़ने के साथ महिलाओं की ज़िम्मेदारियाँ भी बढती जाती हैं।

राजनीति में रुचि का अभाव: राजनीतिक नीति-निर्धारण में रुचि न होना भी महिलाओं को राजनीति में आने से रोकता है। इसमें राजनीतिक दलों की अंदरूनी गतिविधियाँ और इज़ाफा करती हैं। राजनीतिक दलों के आतंरिक ढाँचे में कम अनुपात के कारण भी महिलाओं को अपने राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों की देखरेख के लिये संसाधन और समर्थन जुटाने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिये पर्याप्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने से कतराते हैं। इसके अलावा, महिलाओं पर थोपे गए सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व भी उन्हें राजनीति में आने से रोकते हैं। महिलाएँ भी इसे सामाजिक संस्कृति मानते हुए सहन करने को विवश रहती हैं। जनता का रुझान न केवल यह निर्धारित करता है कि कितनी महिला उम्मीदवार चुनाव जीतेंगी, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जनता का रुझान यह भी तय करता है कि किस महिला को कौन सा पद दिया जाना चाहिये।

  • कुल मिलाकर देखा जाए तो देश में राजनीतिक दलों का माहौल ऐसा है कि महिलाएँ चाहकर भी राजनीति में हिस्सा लेने से कतराती हैं। उन्हें पार्टी में अपना स्थान बनाने के लिये कड़ी मेहनत तो करनी ही पड़ती है, साथ ही अन्य कई मुद्दों का सामना भी करना पड़ता है।

आगे की राह

  • यह समय की मांग है कि भारत जैसे देश में मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं को भागीदारी के समान अवसर मिलने चाहिये।
  • महिलाओं को उन अवांछित बाध्यताओं से बाहर आने की पहल स्वयं करनी होगी जिनमें समाज ने जकड़ा हुआ है, जैसे कि महिलाओं को घर के भीतर रहकर काम करना चाहिये।
  • राज्य, परिवारों तथा समुदायों के लिये यह बेहद महत्त्वपूर्ण है कि शिक्षा में लैंगिक अंतर को कम करना, लैंगिक आधार पर किये जाने वाले कार्यों का पुनर्निधारण करना तथा श्रम में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने जैसी महिलाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं का समुचित समाधान निकाला जाए।

सभी राजनीतिक दलों को सर्वसम्मति बनाते हुए महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना चाहिये, जिसमें महिलाओं के लिये 33% आरक्षण का प्रावधान किया गया है। जब यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा तो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व स्वतः बढ़ जाएगा, जैसा कि पंचायतों में देखने को मिलता है। 73वें संविधान संशोधन के द्वारा महिलाओं को त्रिस्तरीय ग्रामीण पंचायतों और शहरी निकायों में 1993 से 33% आरक्षण मिलता है।

  • राज्य विधानसभाओं और संसदीय चुनावों में महिलाओं के लिये न्यूनतम सहमत प्रतिशत सुनिश्चित करने हेतु मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिये इसे अनिवार्य बनाने वाले भारत निर्वाचन आयोग के प्रस्ताव (इसे गिल फॉर्मूला कहा जाता है) को लागू करने की आवश्यकता है। जो दल ऐसा करने में असमर्थ रहेगा उसकी मान्यता समाप्त की जा सकेगी।
  • दुनियाभर में कई देशों में राजनीतिक दलों में आरक्षण का प्रावधान है। इनमें स्वीडन, नॉर्वे, कनाडा, UK और फ्रांस भी शामिल हैं।
  • विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का आधार न केवल आरक्षण होना चाहिये, बल्कि इसके पीछे पहुँच और अवसर तथा संसाधनों का सामान वितरण उपलब्ध कराने के लिये लैंगिक समानता का माहौल भी होना चाहिये।
  • निर्वाचन आयोग की अगुवाई में राजनीतिक दलों में महिला आरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिये प्रयास किये जाने चाहिये। हालाँकि इससे विधायिका में महिलाओं की संख्या तो सुनिश्चित नहीं हो पाएगी, लेकिन जटिल असमानता को दूर करने में इससे मदद मिल सकती है।
  • स्वतंत्र भारत के इतिहास में देखने पर पता चलता है कि देश की कमान लंबे समय तक महिला प्रधानमंत्री के हाथों में रही है और समय-समय पर राज्यों में मुख्यमंत्री तथा सदन के अध्यक्ष पद पर महिलाएं आसीन होती आई हैं। फिर भी विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है और यह हमें बाध्य करता है कि इस मुद्दे पर बहस कर परिस्थितियों में बदलाव लाया जाए।

इस मुद्दे पर सरकार को भी प्रयास करने चाहिये, जिसमें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से महिलाओं की स्थिति में सुधार करना शामिल है ताकि महिलाएँ अपनी आंतरिक शक्ति के साथ, अपने दम पर खड़ी हो सकें। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि शिक्षा महिलाओं की सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करती है। शिक्षण संस्थानों में मिली औपचारिक शिक्षा महिलाओं में नेतृत्व के अवसर तो उत्पन्न करती ही है, साथ ही उनमें नेतृत्व गुणों का विकास भी करती है।

स्रोत: 18 फरवरी को Livemint में प्रकाशित India Needs More Women Parliamentarians पर आधारित।

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