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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

इक्कीसवीं सदी को कैसे एशिया और अफ्रीका की सदी बनाएँ?

  • 01 Jun 2017
  • 9 min read

संदर्भ
इस लेख में भारत-अफ्रीका संबंधों, भारत और जापान की पहल से बनने वाले एशिया-अफ्रीका विकास गलियारे का महत्त्व तथा इक्कीसवीं सदी को कैसे एशिया-अफ्रीका की सदी बनाई जाए, इन तमाम मुद्दों का विश्लेषण किया गया है। 

महत्त्वपूर्ण बिंदु 

  • पिछले कुछ वर्षों से भारत एवं अफ्रीका के संबंधों में मज़बूती आई है। इसका कारण दोनों पक्षों के नेताओं एवं उद्योग जगत के लोगों की सक्रिय भागीदारी है। यह बात अभी हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में संपन्न हुई ‘अफ्रीकी विकास बैंक’ की वार्षिक बैठक से परिलक्षित होती है।  
  • वार्षिक बैठक के लिये गांधीनगर को चुनने के अफ्रीकी विकास बैंक के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि उसे भारतीय अर्थव्यस्था की हाल की उपलब्धियों एवं भविष्य की संभावनाओं पर कितना भरोसा है। यह इण्डिया इंक (India inc.) के साथ और व्यापक तौर पर जुड़ने के प्रति अफ्रीका की बढ़ती रुचि को भी स्पष्ट करता है।  
  • वस्तुतः अफ्रीकी विकास बैंक के प्रमुख इस बात को अच्छी तरह से समझतें हैं कि भारत पूरी दुनिया के लिये विकसित हो रहा एक प्रकाश स्तम्भ है। इसे में, यह अवसर भारत और अफ्रीका के मध्य सफल भागीदारी के लिये एकदम उचित है।  
  • भारत के प्रति अफ्रीका की रुचि एवं भरोसे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अक्तूबर 2015 में भारत-अफ्रीका मंच शिखर सम्मलेन के अवसर पर सभी 54 अफ्रीकी देशों ने अपने-अपने  प्रतिनिधियों को भेजा था, जिसमें से 41 देशों ने अपने राज्य प्रमुख अथवा सरकार के प्रमुखों को भेजा था।
  • भारत के नेताओं की अफ्रीका दौरे की इच्छा और तैयारी की प्रशंसा अफ्रीकी देशों की सरकारें करती हैं।  पिछले दो वर्षों के दौरान भारत के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने 16 अफ्रीकी देशों की यात्राएँ की हैं। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि भारत, अफ्रीका को कितना महत्त्व दे रहा है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी देश की आर्थिक एवं विदेश नीति के संदर्भ में अफ्रीका को सर्वोच्च  प्राथमिकता पर रखा है।  

एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा  (AAGC) 

  • दरअसल, एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा एक दृष्टिकोण दस्तावेज़ है, जिसका खाका भारत और जापान की तीन शोध संस्थाओं ने संयुक्त रूप से तथा कुछ अन्य एशियाई और अफ्रीकी विशेषज्ञ समूहों के साथ विचार-विमर्श करके  तैयार किया  गया है।  
  • इसमें सतत् और अभिनव विकास के लिये भारत और अफ्रीका के मध्य निकट संबंधों की परिकल्पना की गई है। इसमें अफ्रीका, भारत, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया एवं ओसेनिया पर विशेष फोकस होगा।   
  • एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा के निम्न चार स्तम्भ होंगे– 

→ विकास एवं सहयोगी परियोजनाएँ  
→ गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचनाएँ एवं संस्थागत संपर्क  
→ कौशल एवं क्षमता में वृद्धि  
→ लोगों के बीच भागीदारी 

  • एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा में निम्न क्षेत्र की विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी-

→ स्वास्थ्य एवं औषधि क्षेत्र 
→ कृषि एवं कृषि-प्रसंस्करण
→ आपदा प्रबंधन 
→ कौशल विकास 

  • भारत और जापान की शोध संस्थाओं के संयुक्त अध्ययन से पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी को सिर्फ एशिया की सदी नहीं बल्कि एशिया-अफ्रीका की सदी बनाने की बात चल रही है। 
  • दरअसल, एशिया-अफ्रीका विकास गलियारा का विचार नवम्बर 2016 में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे तथा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच हुई बातचीत से उपजा है। 
  • दोनों नेताओं ने विश्व समृद्धि के प्रमुख वाहक के रूप में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के उभरते महत्त्व को समझते हुए तय किया है कि जापान के ‘गुणवत्ता पूर्ण बुनियादी ढाँचे के लिये भारत की एक्ट ईस्ट नीति एवं विस्तृत भागीदारी (Expanded Partnership for Quality Infrastructure) नीति के बीच तालमेल बैठना होगा। यह तालमेल बेहतर क्षेत्रीय एकीकरण, बेहतर सम्पर्क एवं औद्योगिक नेटवर्कों  में प्रतिबिंबित होगा। 
  • वस्तुतः उनकी रणनीति यह है कि भारत और जापान एकसमान सोच रखने वाले देशों, जैसे अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, यूएई ( UAE) एवं सिंगापुर के साथ मिलकर अफ्रीका के विकास की गति को तेज़ करने के लिये सहयोग करें। 

दृष्टिकोण में अंतर 

  • मीडिया में यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि क्या AAGC चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का  भारत का उत्तर है? तो ऐसा नहीं है, दोनों परियोजनाओं के दृष्टिकोण में अंतर है। चीन का ध्यान संरचना एवं चेक-बुक कूटनीति पर है। भारत का ध्यान सहयोगी परियोजनाओं एवं कार्यक्रमों के एक   व्यापक स्पेक्ट्रम पर है, जिसका फोकस अफ्रीका के मानव संसाधन विकास पर है।  
  • चीन अपनी परियोजना पर अकेले काम करना चाहता है, जबकि भारत अन्य इच्छुक देशों के साथ मिलकर, अफ्रीका की प्राथमिकताओं के हिसाब से उसकी सहायता करना चाहता है। यह एक स्वैच्छिक सहयोग है और भारत इसमें निर्देशक नहीं है। यह प्रबुद्ध दृष्टिकोण भारत-अफ्रीका सहयोग के लिये असीमित संभावनाएँ प्रस्तावित करता है।  
  • यह तो स्पष्ट है कि चीन तेज़ी से अफ्रीका में अपने कदम बढ़ा रहा है। इसे में, भारत और जापान को भी तेज़ी से इस दिशा में कार्य करना होगा, तथा AAGC की संकल्पना को व्यावहारिक वास्तविकता में परिवर्तित करना होगा। दृष्टिकोण दस्तावेज़ के लेखकों की योजना एक वर्ष के अन्दर एक AAGC विज़न स्टडी तैयार करने की है जिसमें विभिन्न व्यापारिक एवं परिवहन सुविधा उपायों के आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जाएगा। उसके बाद ये तीनों संस्थाएँ एशिया-अफ्रीका भागीदारी को मज़बूत करने के लिये आगे का रास्ता सुझएंगी। 

निष्कर्ष 
यदि लघु अवधि में कुछ ठोस परिणाम बनता नहीं दिखेगा तो भारत और जापान के संयुक्त दृष्टिकोण की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकता है। दोनों देशों को अफ्रीका में निरंतर सहयोग करके चीन की बढ़त के बराबर पहुँचने की आवश्यकता है। यदि नई दिल्ली और टोकियो इस दिशा में कुछ अलग करना चाहते हैं तो उन्हें शीघ्र ही कुछ अफ्रीकी देशों (जैसे कीनिया, इथियोपिया और मोज़ाम्बिक) की कंपनियों को साथ लेकर कुछ संयुक्त पायलट परियोजनाओं (जैसे स्वास्थ्य देखभाल, कृषि तथा ब्लू अर्थव्यवस्था) पर कार्य प्रारंभ करना चाहिये।

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