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‘नया क्वाड’: संभावनाएँ और चुनौतियाँ

  • 22 Nov 2021
  • 13 min read

यह लेख 19/11/2021 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘‘A collaborative tech vision for US, UAE, Israel and India’’ लेख पर आधारित है। इसमें ‘नए क्वाड’ गठबंधन और इस गठबंधन में सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में प्रौद्योगिकी की संभावनाओं पर चर्चा की गई है।

संदर्भ

हाल ही में भारत, अमेरिका, इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों के बीच आयोजित बैठक ने भारत के विदेश नीति हलकों को एक और ‘क्वाड’ समूह के उभार की चर्चा तेज़ हुई है, जिसे विश्लेषक ‘नए क्वाड’ के नाम से संबोधित कर रहे हैं।  

बैठक की चर्चा में शामिल रहे विभिन्न मुद्दों में से इस गठबंधन का प्रौद्योगिकी आयाम सहयोग के लिये सर्वाधिक संभावनापूर्ण प्रतीत होता है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, नवाचार एवं स्टार्ट-अप में अपनी अद्वितीय उपलब्धियों के साथ इनमें से प्रत्येक देश साझा प्रौद्योगिकीय लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। 

प्रौद्योगिकीय विकास के क्षेत्र में एक साथ कार्य करना अमेरिका, इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के लिये अपरिहार्य बनाता है कि वे अपने इस नवस्थापित गठबंधन को सशक्त बनाएँ।

'नए क्वाड' के भीतर सहयोग

  • इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात का नया सहयोग: हाल ही में इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात के स्टार्टअप क्षेत्रों ने फिनटेक और डिजिटल सुरक्षा पर सहयोग हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।   
    • एक इज़रायली गैर-लाभकारी संगठन ‘स्टार्ट-अप ‘नेशन सेंट्रल’ (जो टेक इकोसिस्टम को कनेक्ट करता है) और संयुक्त अरब अमीरात के वित्तीय केंद्र ‘दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर’ के बीच संपन्न हुआ यह समझौता स्टार्ट-अप के लिये नियामक ‘सैंडबॉक्स एंड एक्सेलरेटर’ का निर्माण करेगा और उन्हें बाज़ार पहुँच के अवसर प्रदान करेगा।    
    • वर्ष 2020 में अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किये जाने के बाद से इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच कई सहयोगी परियोजनाओं की शुरुआत हुई है।   
  • संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल के साथ भारत का सहयोग: भारत और अमेरिका विभिन्न परियोजनाओं पर दोनों देशों (संयुक्त अरब अमीरात और इज़रायल) के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं।
    • मई 2021 में इज़रायल स्थित ‘इकोपिया’ (Ecoppia) कंपनी- जो रोबोटिक सोलर क्लीनिंग प्रौद्योगिकी में विशेषज्ञ है, ने संयुक्त अरब अमीरात में कार्यान्वित अपनी एक परियोजना के लिये भारत में स्थित अपनी विनिर्माण सुविधा के उपयोग हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं जो ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ इंडो-इज़रायल चैंबर्स ऑफ कॉमर्स’ द्वारा समर्थित एक पहल है।  
      • इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जल एवं ऊर्जा परियोजनाओं पर भी आपसी सहयोग कर रहे हैं। 
  • क्वांटम प्रौद्योगिकी में प्रयास: अबू धाबी का प्रौद्योगिकी नवाचार संस्थान संयुक्त अरब अमीरात का पहला क्वांटम कंप्यूटर बना रहा है।  
    • इज़रायल और अमेरिका ने क्वांटम प्रौद्योगिकी पर अनुसंधान को प्राथमिकता देते हुए इस क्षेत्र को क्रमशः 91 मिलियन डॉलर और 1.2 बिलियन डॉलर की राशि आवंटित की है।    
      • तकनीकी दिग्गज कंपनियाँ- IBM और गूगल ने पहले ही अपने क्वांटम कंप्यूटर के माध्यम से अभूतपूर्व सफलताएँ हासिल कर ली हैं।
    • भारत भी अपने ‘क्वांटम तकनीक और अनुप्रयोगों पर राष्ट्रीय मिशन’ के माध्यम से तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और साथ ही उसने फ्राँस जैसे देशों से सहयोग भी किया है।

चुनौतियाँ

  • पश्चिम एशिया में चीन की बढ़ती तकनीकी प्रगति और भूमिका: रूस के साथ सहयोग और ‘मेड इन चाइना-2025’ जैसी घरेलू प्रमुख पहलों के साथ बीजिंग ने उभरती प्रौद्योगिकियों का अनुसरण किया है और वाशिंगटन के साथ अपने क्षमता अंतर को कम करने में सफलता पाई है। वस्तुतः कुछ मामलों में तो उसने प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ की स्थिति प्राप्त कर ली है।   
    • चीन ने हाल के वर्षों में अवसंरचना, कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी से संबंधित परियोजनाओं में पश्चिम एशिया के कई देशों (जो भारत के महत्त्वपूर्ण भागीदार रहे हैं) के साथ अपने सहयोग में वृद्धि की है।  
      • संयुक्त अरब अमीरात विश्व के उन पहले देशों में से एक था जिसे 5G परियोजना के लिये चीनी बहुराष्ट्रीय कंपनी हुआवे (Huawei) का सहयोग प्राप्त हुआ था। 
  • एकल राष्ट्रीय प्रयास पर्याप्त नहीं: तकनीकी प्रगति की अत्यंत तीव्र गति के साथ इन परिवर्तनकारी तकनीकों को विकसित करने और अपनाने में संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी वैश्विक शक्ति के भी एकल राष्ट्रीय प्रयास इष्टतम परिणाम नहीं दे सकेंगे।
    • विश्व में रक्षा प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं विकास पर सर्वाधिक व्यय करने के बावजूद अमेरिका अब पहले की तरह विश्व का प्रौद्योगिकीय नेतृत्व करने में सक्षम नहीं है।   

आगे की राह

  • भारतीय टेक-हब के लिये अवसर: नवाचार और स्टार्टअप क्षेत्र में हालिया सहयोग को देखते हुए यह विचार करना तर्कसंगत है कि "नए क्वाड" प्रौद्योगिकी-आधारित सहयोग की दिशा में महत्त्वपूर्ण होगा।  
    • भारतीय दृष्टिकोण से, इस तरह की साझेदारी अमेरिका के उद्यम पूंजी वित्तपोषण, इज़रायल के स्टार्ट-अप, उद्योग और अकादमी जगत के बीच घनिष्ठ सहयोग और संयुक्त अरब अमीरात के वित्तपोषण एवं नवाचार पर फोकस का का लाभ उठा सकती है।   
    • इनमें भारत के बंगलूरू और संभावित रूप से हैदराबाद स्केलिंग और विनिर्माण के अवसर का लाभ उठा सकते हैं, क्योंकि वहाँ विभिन्न रक्षा सार्वजनिक इकाइयों एवं अनुसंधान प्रतिष्ठानों, निजी क्षेत्र की कंपनियों और स्टार्टअप के साथ एक जीवंत प्रौद्योगिकी आधार पहले से मौजूद है।  
  • सहयोग के लिये प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ: नए क्वाड के प्रौद्योगिकी सहयोग का एजेंडा तीन प्रौद्योगिकियों—क्वांटम साइंस, ब्लॉकचेन और 3डी प्रिंटिंग के चयन के साथ शुरू किया जा सकता है।   
    • ये परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियाँ एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, क्रिप्टोग्राफी, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और विनिर्माण के लिये आकर्षक अनुप्रयोग प्रदान करती हैं। 
    • अमेरिका, इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात में स्टार्टअप समुदाय पहले से ही एक उन्नत अनुसंधान एवं विकास चरण में पहुँच चुके हैं, जिससे भारत को विशेषज्ञता के सृजन और इन प्रौद्योगिकियों के विकास एवं अनुप्रयोगों के वृहत पैमाने की पेशकश करने का अवसर मिल सकता है।  
      • इज़रायल ने विश्व भर में लगभग 40%, 3D प्रिंटर के निर्माण हेतु उत्तरदायी है और दुबई स्थित एक कंपनी इस भूभाग में 3D प्रिंटिंग की अग्रणी कंपनी के रूप में उभरी है।
      • इसके विपरीत, भारत 3D प्रिंटिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में अपेक्षाकृत सुस्त रहा है, लेकिन वह निश्चित रूप से अमेरिका, इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात की विशेषज्ञता से लाभान्वित हो सकता है।
  • अन्य क्षेत्रों में सहायता के लिये प्रौद्योगिकी सहयोग: ब्लॉकचेन की ही तरह, भारत और संयुक्त अरब अमीरात बैंकिंग, फिनटेक और ट्रेड फाइनेंसिंग में उपयोग हेतु अनुकूलित अनुप्रयोगों को तैयार करने हेतु साइबर और क्रिप्टोग्राफी में अमेरिकी और इज़रायली विशेषज्ञता का लाभ उठा सकते हैं।    
    • यह प्रशासन और लेनदेन लागत को कम करने में योगदान कर सकता है।
    • इसके अलावा, दोहरे उपयोग की उनकी प्रकृति चारों देशों की सेनाओं को तकनीकी बढ़त प्रदान करने की क्षमता रखती है। 
      • इसके साथ ही यह समूह के एजेंडे में सुरक्षा सहयोग तत्व को भी जोड़ सकता है।

निष्कर्ष

वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी-आधारित भागीदारी, विभिन्न देशों के बीच सहयोग की एक प्रमुख प्रवृत्ति बन गई है, जहाँ समान विचारधारा वाले विभिन्न देश उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में सहयोग के तरीकों पर विचार कर रहे हैं।

यदि चारों देश प्रौद्योगिकियों के चयन, वित्तपोषण और विकास के लिये अपने इस गठबंधन में नवाचार पारितंत्र को जोड़ते हैं तो यह सरकार-सरकार संलग्नता तक सीमित रहने के बजाय समूह के लिये सहयोग के आधार को अधिक व्यापक बनाने में मदद करेगा।

अभ्यास प्रश्न: भारत अपने भागीदार देशों के साथ उन कई क्षेत्रों में सहयोग कर सकता है जहाँ वे अधिक उन्नत चरण तक पहुँच चुके हैं और प्रौद्योगिकी उनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। चर्चा कीजिये।

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