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सामाजिक न्याय

नारीवादी विदेश नीति

  • 24 Apr 2021
  • 10 min read

यह एडिटोरियल दिनांक 09/04/2021 को "द इंडियन एक्सप्रेस" में प्रकाशित लेख “Why India needs a feminist foreign policy” पर आधारित है। इसमें भारत में नारीवादी विदेश नीति की ज़रूरत क्यों है, इस पर चर्चा की गई है।

भारत को सितंबर 2020 में चार साल के कार्यकाल के लिये महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के सदस्य के रूप में चुना गया है, जहाॅं भारत लैंगिक समानता, विकास एवं शांति को बढ़ावा देने के लिये प्रतिबद्ध है।

विडंबना यह है कि हाल ही में जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, 2021 में भारत 28 रैंक फिसलकर 140वें रैंक पर आ गया है। ज्ञातव्य है कि उसने 156 देशों को रैंक प्रदान किया गया था।

यदि भारत लैंगिक समानता के मामले में अपने लक्ष्यों की पूर्ति करना चाहता है तो भारत को एक नारीवादी विदेश नीति (Feminist Foreign Policy- FFP) (एफएफपी) फ्रेमवर्क को अपनाने पर विचार करना होगा। एफएफपी फ्रेमवर्क एक अधिक औपचारिक दृष्टिकोण है जो विकास मॉडल से आगे जाकर लैंगिक समानता निर्धारित करने हेतु व्यापक पहुॅंच, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की बात करता है।

नारीवादी विदेश नीति फ्रेमवर्क क्या है?

  • एफएफपी कूटनीति एवं सुरक्षा पर तीन मुख्य नारीवादी सिद्धांतों पर कार्य करता है: सुरक्षा की व्यापक समझ, अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संबंधों का संतुलन एवं महिलाओं के लिये राजनीतिक एजेंसी।
  • इस अर्थ में एफएफपी युद्ध, शांति और विकास की पारंपरिक धारणाओं से आगे बढ़कर अर्थशास्त्र, वित्त, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण सहित अन्य क्षेत्रों को भी विदेश नीति में शामिल करने का प्रयास करता है।
  • नारीवादी विदेश नीति फ्रेमवर्क सुरक्षा को समग्र तरीके से देखता है एवं महिलाओं और हाशिये पर रहने वाले समूहों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्माण करता है। एफएफपी फ्रेमवर्क सदियों से पुरुषों के कूटनीति और विदेश नीति पर एकाधिकार के प्रति एक प्रतिक्रिया है।
  • तथ्यों के अनुसार, निर्णय लेते समय अलग-अलग समूहों को ध्यान रखकर निर्णय लेने से निर्णय अधिक सटीक होता है। अतः महिलाओं को न केवल शांति व्यवस्था कायम रखने में शामिल करना आवश्यक है, बल्कि कूटनीति, विदेश और सुरक्षा नीति में भी शामिल करना चाहिये। कई मायनों में यह विकास के बॉटम अप दृष्टिकोण पर कार्य करता दिखता है।
  • स्वीडन के बाद कई अन्य देशों - कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और, हाल ही में मेक्सिको ने भी या तो नारीवादी विदेश नीति फ्रेमवर्क या फिर नीतियों के निर्माण में नारीवादी दृष्टिकोण को अपनाया।

भारत को एफएफपी फ्रेमवर्क की आवश्यकता क्यों है?

  • एफएफपी दृष्टिकोण को अपनाने से भारत में समानता, सामाजिक कल्याण और शांति के लिये मार्ग प्रशस्त होता है।
  • एफएफपी दृष्टिकोण से भारत की निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं और हाशिये पर रहने वाले अन्य समूहों की भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।
  • शीर्ष नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी भारत में आंतरिक बदलाव को उत्प्रेरित कर सकता है साथ ही समाज में पितृसत्तात्मकता को कम करने में मददगार साबित होगी।
  • एक रिसर्च के अनुसार, लैंगिक समानता किसी राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास, लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती और राष्ट्रीय सुरक्षा की प्रगति के लिये एक महत्त्वपूर्ण शर्त है।
  • हालाॅंकि एफएफपी फ्रेमवर्क को भारतीय संदर्भ के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिये। यह लिंग आधारित बदलाव के लिये एक प्रारंभिक बिंदु भी हो सकता है जो न केवल विकास बल्कि, सशक्तीकरण और निर्णय लेने के व्यापक दायरे को भी अपने में शामिल करेगा।
  • एफएफपी अपनाने से भारत को शांति के लिये अनुकूल माहौल बनाने, महिलाओं के खिलाफ घरेलू बाधाओं/ हिंसा को समाप्त करने और मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के निर्माण में भी सहायता प्राप्त होगी।

एफएफपी फ्रेमवर्क के तहत भारत द्वारा शुरू की गई नीतिगत पहल

  • वर्ष 2007 में भारत ने सार्क, आईबीएसए (IBSA), आईओआरए (IORA) और अन्य बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से लैंगिक सशक्तीकरण कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिये लीबिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन के लिये पहली महिला इकाई तैनात की। समावेशी और सतत् विकास के लिये महिलाओं का नेतृत्व सुनिश्चित करना भारत का लक्ष्य है।
  • इसी तरह कई विदेशी कार्यक्रमों की वार्ताओं में भी लैंगिक पक्ष शामिल होता है जैसे- अफगानिस्तान, लेसोथो और कंबोडिया में देखा गया है।
  • वर्ष 2015 में भारत ने विदेश मंत्रालय के तहत जेंडर बजट का क्रियान्वयन भी देखा गया। 

इस मुद्दे से संबंधित चुनौतियाँ

  • महिलाओं की निर्भरता: भारत में महिलाओं की निर्भरता एवं अधीनता के कारण एफएफपी फ्रेमवर्क के प्रभावी रूप से क्रियान्वित होने की संभावना कम हो जाती है।
    • कुछ मायनों में यह भारत में व्यापक खाई को प्रदर्शित करता है जहाॅं वर्ष 2019 में महिला मंत्रियों की संख्या 23.1 थी, वहीं 2021 में यह घटकर 9.1 प्रतिशत रह गई है। संसद में महिलाओं की संख्या केवल 14.4 प्रतिशत है।
  • पितृसत्ता: पितृसत्तात्मक मूल्य भारतीय समाज के भीतर इतनी गहराई तक सम्‍मिलित हैं कि घरेलू स्तर पर असमानता की प्रणाली में बदलाव लाने में शायद ही कामयाबी हासिल हो।
    • महिलाओं को पारंपरिक रूप से विदेश नीति के संचालन से बाहर रखा गया है। इसे एक विशिष्ट "महिला दृष्टिकोण" को अपनाकर "सॉफ्ट सिक्योरिटी" जैसे- मानव अधिकार, महिला सशक्तीकरण, प्रवासन और तस्करी के मामलों तक ही सीमित रखा गया, किंतु अधिक महत्वपूर्ण विषय जैसे बाह्य एवं अंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति जैसे मामलों में महिलाओं की उपस्थिति गौण रही।

आगे की राह

  • निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी: विदेश नीति, कूटनीति, नौकरशाही, सैन्य एवं निर्णय लेने वाली अन्य शीर्ष संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी के समक्ष आने वाली चुनौतियों को कम करना चाहिये। यह कार्य भारत या तो महिलाओं के लिये कोटा प्रणाली या फिर पुरुषों के समान भागीदारी सुनिश्चित कर पूरा कर सकता है। 
  • अधिक प्रतिनिधित्व: भारत नीति निर्माण के विभिन्न स्तरों पर महिलाओं को सक्रिय रूप से नियुक्त कर एवं उन्हें सीधे अपने विदेशी संबंधों के संचालन में शामिल करके एफएफपी की ओर कदम बढ़ा सकता है।
    • इसका अर्थ केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना नहीं होना चाहिये, बल्कि ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जो नई सोच को बढ़ावा दे।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: एफएफपी फ्रेमवर्क के उचित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय नागरिक समाज संगठनों के साथ सहयोग कर सकता है।

निष्कर्ष

भारतीय संदर्भ में एफएफपी फ्रेमवर्क का निर्माण न केवल हमारी विदेश नीति की प्रक्रिया को नया दृष्टिकोण प्रदान करेगा बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण की तरह देखा जाएगा कि भारत जैसा एक विकासशील लोकतांत्रिक राष्ट्र जिसकी जड़ों में पितृसत्ता मजबूती से जमी हुई है, किस प्रकार एक एफएफपी फ्रेमवर्क को अपनाने पर विचार कर सकता है।

अभ्यास प्रश्न: यदि भारत चाहता है कि लैंगिक असमानता को दूर करने का लक्ष्य प्राप्त कर सके तो भारत को एक नारीवादी विदेश नीति (एफएफपी) फ्रेमवर्क को अपनाने पर विचार करना चाहिये। चर्चा कीजिये।

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