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भारतीय अर्थव्यवस्था

शैडो बैंकिंग और भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट

  • 03 Jun 2019
  • 22 min read

यह लेख "द हिंदू" में प्रकाशित "Crisis in NBFC Sector Could Hurt Economic Growth" का भावानुवाद है। इस लेख में वर्तमान NBFC संकट के भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के बारे में विचार किया गया है।

संदर्भ

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (Non-Banking Financial Companies-NBFCs) में वर्तमान तरलता संकट भले ही फिलहाल के लिये प्रणालीगत जोखिम उत्पन्न न करें लेकिन दीर्घावधि में निवेशक अर्थव्यवस्था के समग्र विकास पर इसका प्रभाव पड़ने की संभावना है।

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ (NBFCs) वे वित्तीय संस्थान हैं जो विभिन्न बैंकिंग सेवाओं की पेशकश करते हैं लेकिन बैंकिंग लाइसेंस धारण नहीं करते हैं। सामान्यतः इन संस्थानों को आम लोगों से पारंपरिक मांग जमा (जैसे चेक या बचत खाते के माध्यम से सरलता से उपलब्ध धन) लेने की अनुमति नहीं होती है। यह सीमितता उन्हें पारंपरिक निरीक्षण के दायरे से बाहर रखती है।

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी

  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी उस संस्था को कहते हैं जो कंपनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत पंजीकृत होती है और जिसका प्रमुख कार्य उधार देना तथा विभिन्न प्रकार के शेयरों, प्रतिभूतियों, बीमा कारोबार तथा चिटफंड से संबंधित कार्यों में निवेश करना होता है।
  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ भारतीय वित्तीय प्रणाली में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
  • यह संस्‍थाओं का विजातीय समूह है (वाणिज्यिक सहकारी बैंकों को छोड़कर) जो विभिन्‍न तरीकों से वित्तीय मध्‍यस्‍थता का कार्य करता है जैसे –
    • जमा स्‍वीकार करना
    • ऋण और अग्रिम देना
    • प्रत्‍यक्ष अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप में निधियाँ जुटाना
    • अंतिम व्ययकर्त्ता को उधार देना
    • थोक और खुदरा व्यापारियों तथा लघु उद्योगों को अग्रिम ऋण देना।

बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में क्या अंतर है?

NBFC ऋण प्रदान करते हैं और निवेश भी करते हैं। इस प्रकार उनकी गतिविधियाँ बैंकों के समान ही होती हैं, हालाँकि उनके बीच निम्नलिखित अंतर भी होता है:

  • NBFC मांग जमा (Demand Deposits) स्वीकार नहीं कर सकते हैं;
  • NBFC भुगतान और निपटान प्रणाली का अंग नहीं होते हैं तथा स्वयं द्वारा भुगतेय चेक जारी नहीं कर सकते हैं;
  • बैंकों की तरह NBFC के जमाकर्त्ताओं को निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation) की निक्षेप बीमा सुविधा उपलब्ध नहीं होती है।

अर्थव्यवस्था में NBFC का क्या योगदान है?

  • NBFC बैंकिंग प्रणाली से बाहर उपभोक्ताओं की विविध वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए देश के समावेशी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को उनकी व्यावसायिक आवश्यकताओं के लिये सबसे उपयुक्त नवोन्मेषी वित्तीय सेवाएँ प्रदान करने में प्रायः NBFC अग्रणी भूमिका निभाते हैं।
  • NBFC परिवहन, रोज़गार सृजन, धन सृजन, ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण के प्रसार और समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के सहयोग आदि के साथ अर्थव्यवस्था के विकास में भागीदारी कर एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।
  • वे बीमा से संबंधित मामलों में ग्राहकों को वित्तीय सहायता और मार्गदर्शन जैसी सेवाएँ भी प्रदान करते हैं।

NBFC का तरलता संकट आर्थिक विकास को कैसे प्रभावित कर सकता है?

  • म्यूचुअल फंड और NBFC क्षेत्र दृढ़ता से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं क्योंकि म्यूचुअल फंड ही वाणिज्यिक पत्र (Commercial paper) और ऋण-पत्र (Debentures) के माध्यम से NBFC का सबसे बड़ा वित्त प्रदाता है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि NBFC क्षेत्र में म्यूचुअल फंड का समस्त निवेश उच्च निवेश ग्रेड अथवा या ट्रिपल-ए (AAA) में नहीं है। यदि कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के सामने समस्या आती है तो बैंक जोखिम बिक्री (Selling the Exposure) की एक श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है जो NBFC क्षेत्र के लिये और अधिक कठिनाई उत्पन्न कर सकती है।

NBFC, म्यूचुअल फंड (शैडो बैंकिंग) और संकट

  • म्यूचुअल फंड एक प्रकार का वित्तीय साधन है जो कई निवेशकों से एकत्रित धनराशि से तैयार होता है जिसे स्टॉक, बॉण्ड, वित्तीय बाज़ार साधनों (Money Market Instruments) एवं अन्य आस्तियों जैसे प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है।
  • शैडो बैंकिंग प्रणाली (Shadow Banking System) वित्तीय मध्यस्थों का एक समूह है जो वैश्विक वित्तीय प्रणाली में साख (क्रेडिट) निर्माण का कार्य करते हैं, लेकिन इसके सदस्य नियामक निगरानी के अधीन नहीं होते।
  • म्यूचुअल फंड कंपनियों ने NBFC में निवेश किया है। बैंकों ने वाणिज्यिक पत्रों (निगम द्वारा जारी आरक्षित, अल्पकालिक ऋण साधन जो सामान्यतः देय खातों और वस्तु-सूची (Accounts Payable and Inventories) के वित्तपोषण के लिये और अल्पकालिक देयताओं की पूर्ति के लिये जारी किये जाते हैं) के आधार पर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को ऋण प्रदान किया है। वर्तमान समय में ऐसे पत्र अनुपयोगी हो गए हैं।
  • 27 अगस्त, 2018 को जब IL&FS गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी निर्धारित अंतिम समय-सीमा पर ऋण चुकाने में विफल रही, तब से शेयर बाज़ार अपने कदम पीछे खींच रहा है और NBFC स्टॉक के मूल्यों में गिरावट आ रही है।
  • भारत में ऋणों का लगभग 25 प्रतिशत 50 भिन्न शैडो बैंकों (NBFC) से लिया गया है। वे उपयुक्त रूप से विनियमित नहीं हैं और आवास जैसे विशेष क्षेत्रों में ऋण प्रदान करते हैं।
    • उन्हें सामान्यतः जमा राशि प्राप्त करने की अनुमति नहीं होती है और इसलिये वे ऋण से अपना वित्तपोषण करते हैं। वे हिस्सेदारी में इतने वृहत् आकार के हैं कि भारत की संपूर्ण वित्तीय प्रणाली को नुकसान पहुँचा सकते हैं। म्यूचुअल फंड्स जो कि आम ग्राहकों को बेचे जाते हैं, 55 बिलियन डॉलर का (प्रबंधन के अंदर कुल आस्तियों का 11 प्रतिशत) ऋण जोखिम (Exposure) रखते हैं।
    • पारंपरिक बैंकों ने शैडो बैंकों को 70 बिलियन डॉलर का ऋण प्रदान किया है, जो पारंपरिक बैंकों की मूल पूंजी के 2/5वें हिस्से के बराबर है।

शैडो बैंकिंग के खतरे

  • अल्पकालिक ऋण लेकर दीर्घावधिक ऋण प्रदान करना एक उच्च जोखिम कार्य है जो IL&FS कंपनी की विफलता में प्रकट भी हुआ है। (सामान्यतः गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ दीर्घ अवधी में कार्यपूर्णता वाली कंपनियों में निवेश करती हैं, जैसे- अवसंरचनात्मक परियोजनाएँ, जहाँ 12-14 वर्षों में रिटर्न प्राप्त होता है, जबकि वे म्यूचुअल फंड जैसे अल्पावधिक वित्तपोषण से पूंजी प्राप्त करते हैं जिन्हें 3-4 वर्ष के अंदर शीघ्र भुगतान करना होता है और इस प्रकार वे एक उच्च जोखिम के शिकार होते हैं)। कंपनी की विफलता के बाद सरकार ने इसे अपने क्षेत्राधिकार में ले लिया है, हालाँकि पहले से ही अप्रत्यक्ष रूप से इसका 40 प्रतिशत स्वामित्व सरकार के ही पास था।
  • वित्तीय बाज़ार में म्यूचुअल फंड को लेकर भारी अविश्वास की स्थिति है और बैंक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को ऋण देने के प्रति अनिच्छुक हैं। ठोस पूंजी अनुपात की रिपोर्टों के बावजूद उनकी बैलेंस-शीट में छुपे संभावित खतरों को लेकर पर्याप्त आशंका व्याप्त है। इधर कई माह से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को तरलता की कमी का सामना भी करना पड़ रहा है।
  • ऐसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की ऋण अदायगी में चूक भारत की संपूर्ण वित्तीय प्रणाली को नुकसान पहुँचा सकती है, जहाँ म्यूचुअल फंड्स 55 बिलियन डॉलर तक का (प्रबंधन के अंदर कुल आस्तियों का 11 प्रतिशत) ऋण जोखिम (Exposure) प्रकट कर रहे हैं।
  • पारंपरिक बैंकों ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को 70 बिलियन डॉलर का ऋण प्रदान कर रखा है, जो पारंपरिक बैंकों की मूल पूंजी के 40 प्रतिशत के बराबर है।

क्या है ‘IL&FS संकट’?

  • इस संकट की शुरुआत तब हुई जब SIDBI से लिये गए अल्पावधि ऋण को चुकाने में IL&FS असफल रही। डिफॉल्टर होने की वज़ह से IL&FS की रेटिंग लगातार गिरने लगी।
  • IL&FS फाइनेंशियल सर्विसेज़, IL&FS की 100% सहायक कंपनी भी 46 करोड़ रुपए का ऋण चुकाने में असफल रही।
  • IL&FS 10 वर्षों से अधिक अवधि की परियोजनाओं का वित्त पोषण करती है, लेकिन इसके द्वारा लिये गए उधार कम अवधि के होते हैं, जो परिसंपत्ति-देयता अंतर को बढ़ा देता है।
  • अनुमान के मुताबिक, तीन वर्षों तक 17% विसंगतियाँ नकारात्मक रहीं। जब ऋण का बहिर्वाह संपत्ति के अंतर्वाह से अधिक हो जाता है तब परिसंपत्ति-देयता विसंगति नकारात्मक हो जाती है।
  • IL&FS का सबसे बड़ा शेयरधारक LIC है, जिसके पास 25.34% शेयर हैं। LIC के बाद ORIX के पास 23.54% शेयर हैं।

प्रभाव क्या पड़ेगा?

  • IL&FS के डिफॉल्ट हो जाने से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ, मुख्य रूप से हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के निवेशक परेशानी में पड़ गए है।
  • बैंक और म्यूचुअल फंड, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों तथा अन्य गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिये वित्तपोषण के मुख्य स्रोत हैं। वित्तपोषण में बैंक 40% और म्यूचुअल फंड 30% का योगदान देते हैं।
  • IL&FS ने संकट का सामना करने के लिये तीन तरह की रणनीतियों की शुरुआत की है- राइट शेयर जारी करना, ऋण चुकाने के लिये संपत्ति की बिक्री और लिक्विडिटी शेयर जारी करना जब तक कि संपत्ति की बिक्री शुरू नहीं हो जाती।
  • यह राइट शेयर जारी करते हुए 4,500 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बना रही है जिसमें यह 150 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से 30 करोड़ इक्विटी शेयर जारी करेगी।
  • इसके बोर्ड ने सहायक कंपनियों जैसे- IL&FS फाइनेंशियल सर्विसेज़, IL&FS ट्रांसपोर्टेशन, IL&FS एनर्जी, IL&FS एन्वायरनमेंट और IL&FS एजुकेशन में ₹ 5,000 करोड़ के पुनर्पूंजीकरण को भी मंज़ूरी दे दी है।

अंतर्राष्ट्रीय दृष्टांत

  • वर्ष 1997-98 में अमेरिका स्थित विश्व की सबसे बड़ी हेज़ फंड कंपनी Long-Term Capital Management (LTCM) दिवालिया हो रही थी। इस कंपनी का नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्रियों और वॉल स्ट्रीट के बड़े व्यापारियों के पास था जो अमेरिकी प्रशासन में प्रभाव रखते थे। अमेरिकी प्रशासन ने चुनाव होने तक इस हेज़ फंड का अस्तित्व बनाए रखने के लिये 14 निवेश बैंकों को इसे ऋण देने के लिये विवश किया। इसके उपरांत इस कंपनी को चुपचाप समाप्त हो जाने के लिये छोड़ दिया गया।
  • यह महज़ संयोग नहीं है कि एलटीसीएम के इन विवश 14 ऋणदाताओं में से कुछ वर्ष 2008 के वित्तीय संकट में दिवालिया हो गए। उनकी विफलता का बीज वर्ष 1998 में ही एलटीसीएम संकट में रोप दिया गया था। हम अनुमान लगा सकते हैं कि IL&FS भारत के लिये मात्र ‘लेहमैन ब्रदर्स’ ही नहीं बल्कि LTCM साबित हो जाने की क्षमता रखती है।
  • LTCM के उदाहरण और एलआईसी द्वारा आईएल एंड एफएस को बचाने के प्रयास के बीच समानता देखी जा सकती है। एक NBFC को बचाने के इस प्रयास द्वारा सरकार वस्तुतः एक विफलता को पुरस्कृत कर रही है।

म्यूचुअल फंड पर सेबी के दिशा-निर्देश

  • सेबी ने म्यूचुअल फंड को कुछ शर्तों के अधीन (इंडेक्स फंड्स और ईटीएफ को छोड़कर) ‘कॉल ऑप्शन’ (Call Options) की अनुमति देने का निर्णय लिया।
  • वर्तमान में म्यूचुअल फंड योजनाओं को इक्विटी डेरिवेटिव्स (Equity Derivatives) में लेन-देन करने की अनुमति है लेकिन उन्हें ‘ऑप्शन राइटिंग’ अथवा सन्निहित लिखित ऑप्शन पर इंस्ट्रूमेंट्स खरीद की अनुमति नहीं है।

IL&FS

  • इंफ्रास्ट्रक्चर लीज़िग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज़ (IL&FS) भारतीय अवसंरचना विकास तथा वित्त कंपनी है। जिसका कार्य प्रमुख आधारभूत परियोजनाओं के लिये वित्त तथा ऋण प्रदान करना है।
  • इसकी परियोजनाओं में एशिया की सबसे लंबी द्वि-दिशात्मक सुरंग चेनानी-नाशरी शामिल है। फिलहाल यह कंपनी दिवालिया होने की कगार पर है।
  • यह 250 से अधिक सहायक कंपनियों के माध्यम से संचालित होती है।
  • 1987 में इसे भारत सरकार के स्वामित्व वाले तीन वित्तीय संस्थानों अर्थात् सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (HDFC) और यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया (UTI) द्वारा ‘आर.बी.आई. रजिस्टर्ड कोर इंवेस्टमेंट कंपनी’ के रूप में गठित किया गया था।

‘कॉल ऑप्शन’ एक समझौता है जो किसी क्रेता को एक विशेष अवधि के अंदर निर्दिष्ट मूल्य पर आस्ति खरीद का अधिकार देता है।

  • उद्योग की प्रबंधनाधीन परिसंपत्ति (Assets Under Management- AUM) 25 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर है, जिससे लगभग 13,000 करोड़ रुपए का राजस्व सृजन हुआ।
  • बाज़ार नियामक ने इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीम के निवेशकों द्वारा भुगतान किये गए व्ययों (Expenses) को कम करने का निर्णय लिया है।
  • कुल व्यय अनुपात (Total Expense Ratio-TER) किसी योजना के कोष का वह प्रतिशत है जो एक म्यूचुअल फंड कंपनी व्यय (प्रशासनिक और प्रबंधन व्यय सहित) के लिये शुल्क के रूप में वसूलती है।
  • इक्विटी-उन्मुख म्यूचुअल फंड योजनाओं के लिये कुल व्यय अनुपात की सीमा 1.25 प्रतिशत और अन्य योजनाओं के लिये 1 प्रतिशत निर्धारित किया गया।
  • इक्विटी-उन्मुख योजनाओं के लिये फंड ऑफ फंड्स (FOF) की सीमा 2.25 प्रतिशत एवं अन्य योजनाओं के लिये 2 प्रतिशत होगी।
  • इसके साथ ही, प्रबंधनाधीन परिसंपत्ति (AUM) स्लैब में वृद्धि के साथ कुल व्यय अनुपात में कमी आएगी।
  • उदाहरण के लिये, उच्चतम एयूएम स्लैब (500 बिलियन रुपए से अधिक) के लिये टीईआर 0.8 से 1.05 प्रतिशत के बीच है, जबकि निम्नतम AUM स्लैब (शून्य से 5 बिलियन रुपए के लिये) 2 से 2.25 प्रतिशत के बीच है।
  • पारदर्शिता- सेबी ने यह अनिवार्य किया है कि कमीशन और व्यय का भुगतान केवल योजना से किया जाएगा, किसी अन्य मार्ग से नहीं।
  • इसके अतिरिक्त, म्यूचुअल फंड उद्योग को सभी योजनाओं में किसी भी अग्रिम कमीशन का भुगतान किये बिना कमीशन के ‘फुल-ट्रेल मॉडल’ (Full Trail Model) को अपनाना होगा।
  • प्रकटीकरण- सेबी ने आवश्यक किया है कि सभी योजनाओं के रिटर्न का श्रेणीवार प्रकटीकरण इसके कुल रिटर्न के संबंध में भारतीय म्यूचुअल फंड एसोसिएशन (AMFI) की वेबसाइट पर किया जाए।
  • उधार- 1 बिलियन रुपए से अधिक की बकाया उधारी वाली कंपनिययाँ वर्ष के लिये अपने वृद्धिशील उधार का 25 प्रतिशत बॉण्ड बाज़ार से जुटाएंगी।

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिये लोकपाल योजना

  • 23 फरवरी, 2018 को आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 45-IA के तहत आरबीआई के साथ पंजीकृत NBFCs के विरुद्ध शिकायतों के निवारण के लिये इस योजना की शुरुआत की गई थी| यह योजना सभी जमाराशि स्वीकार करने वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को कवर करती है।
  • NBFC लोकपाल भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा नियुक्त एक वरिष्ठ अधिकारी होता है जो सेवा में कमी के लिये NBFCs के विरुद्ध ग्राहकों की शिकायतों का निवारण करता है।
  • यह योजना NBFC द्वारा सेवाओं में कमी से संबंधित एक निःशुल्क और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र प्रदान करती है।
  • यह योजना एक अपीलीय तंत्र भी प्रदान करती है जिसके तहत शिकायतकर्त्ता/NBFC के पास अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष लोकपाल के निर्णय के खिलाफ अपील करने का विकल्प होता है।
  • NBFC लोकपाल के कार्यालय चेन्नई, कोलकाता, मुंबई और नई दिल्ली में हैं तथा संबंधित क्षेत्रों में ग्राहकों की शिकायतों का निवारण करते हैं।
  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी-इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी (NBFC-IFC), कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC), इन्फ्रास्ट्रक्चर डेट फंड-नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (Infrastructure Debt Fund-non Banking Financial Companies-IDF-NBFC) और लिक्विडेशन के अंतर्गत शामिल NBFC को इस योजना के दायरे से बाहर रखा गया है।

आगे की राह

भारत को नियामक अंतरपणन (Arbitrage) को भी समाप्त करना चाहिये जो शैडो बैंकों को अपना अधिकांश धन खुदरा निवेशकों और जमाकर्त्ता बैंकों से जुटाने की अनुमति देता है। शैडो ऋणदाताओं को प्रकट रूप से सामने आकर बैंक प्रारूप धारण करना चाहिये अथवा उनके कार्यकलाप पर एक सीमितता लागू होनी चाहिये ताकि शेष बैंकिंग क्षेत्र की सुरक्षा हो।

संभावित प्रश्न: भारत में शैडो बैंकिंग के अपने लाभ हैं, लेकिन इसमें कई जोखिम भी संलग्न हैं। पुष्टि करें।

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