हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:
झारखण्ड संयुक्त असैनिक सेवा मुख्य प्रतियोगिता परीक्षा 2016 -परीक्षाफलछत्तीसगढ़ पीसीएस प्रश्नपत्र 2019छत्तीसगढ़ पी.सी.एस. (प्रारंभिक) परीक्षा, 2019 (महत्त्वपूर्ण अध्ययन सामग्री).छत्तीसगढ़ पी.सी.एस. प्रारंभिक परीक्षा – 2019 सामान्य अध्ययन – I (मॉडल पेपर )UPPCS मेन्स क्रैश कोर्स.
हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स (Hindi Literature: Pendrive Course)
मध्य प्रदेश पी.सी.एस. (प्रारंभिक) परीक्षा , 2019 (महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री)मध्य प्रदेश पी.सी.एस. परीक्षा मॉडल पेपर.Download : उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (प्रवर) प्रारंभिक परीक्षा 2019 - प्रश्नपत्र & उत्तर कुंजीअब आप हमसे Telegram पर भी जुड़ सकते हैं !यू.पी.पी.सी.एस. परीक्षा 2017 चयनित उम्मीदवार.UPSC CSE 2020 : प्रारंभिक परीक्षा टेस्ट सीरीज़

डेली अपडेट्स

शासन व्यवस्था

अनुच्छेद 370 निरस्त होने के निहितार्थ तथा 35A, 371 तथा इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन

  • 06 Aug 2019
  • 21 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस आलेख में हाल ही में समाप्त किये गए अनुच्छेद 370 के साथ अनुच्छेद 35A, 371 तथा इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन की चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए मे जम्मू-कश्मीर राज्य से संविधान का अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य का विभाजन दो केंद्रशासित क्षेत्रों- जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख के रूप में करने का प्रस्ताव किया। इस संदर्भ में संसद ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक 2019 पारित कर दिया है। यह विधेयक पहले राज्यसभा में और उसके बाद लोकसभा में पारित हुआ। यह विधेयक जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान समाप्त करने, जम्मू कश्मीर को विधायिका वाला केंद्रशासित क्षेत्र और लद्दाख को बिना विधायिका वाला केंद्रशासित क्षेत्र बनाने का प्रावधान करता है। अब राज्य में अनुच्छेद 370 (1) ही लागू रहेगा, जो संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर के लिये कानून बनाने से संबंधित है।

आइये, संक्षेप में समझते हैं कि आखिर यह अनुच्छेद 370 है क्या?

पृष्ठभूमि

अनुच्छेद 370 भारत के संव‍िधान में 17 अक्तूबर, 1949 को शाम‍िल किया गया था। यह अनुच्छेद जम्‍मू-कश्मीर को भारत के संव‍िधान से अलग करता है और राज्‍य को अपना संव‍िधान खुद तैयार करने का अध‍िकार देता है। इस मामले में अपवाद केवल आर्ट‍िकल अनुच्छेद 370(1) को रखा गया है। अनुच्छेद 370 जम्‍मू-कश्‍मीर के मामले में संसद को संसदीय शक्‍त‍ियों का इस्तेमाल करने से रोकता है।

नवंबर 1956 में जम्मू-कश्मीर में अलग संविधान का काम पूरा हुआ और 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 दरअसल केंद्र से जम्मू-कश्मीर के संबंधों की रूपरेखा निर्धारित करता है। अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देता है। इसके तहत भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के मामले में सिर्फ तीन क्षेत्रों- रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिये कानून बना सकती है। इसके अलावा किसी कानून को लागू करवाने के लिये केंद्र सरकार को राज्य सरकार की मंज़ूरी की आवश्यकता होती है।

कैसे लागू हुआ अनुच्‍छेद 370?

जम्‍मू-कश्‍मीर सरकार ने इसका मूल मसौदा पेश क‍िया। संशोधन व व‍िचार-व‍िमर्श के बाद 27 मई, 1949 को संव‍िधान सभा में अनुच्‍छेद 306ए (अब 370) पारित हुआ। 17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्‍छेद 370 भारतीय संव‍िधान का ह‍िस्‍सा बन गया।

स्थायी या अस्थायी का विवाद

इस अनुच्छेद को संव‍िधान में शीर्षक में ‘टेम्‍परेरी’ शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हुए शाम‍िल क‍िया गया था। इसे इस रूप में भी अस्‍थायी माना जा सकता है क‍ि जम्‍मू-कश्‍मीर संव‍िधान सभा को इसे बदलने, हटाने या रखने का अध‍िकार था। संव‍िधान सभा ने इसे लागू रखने का फैसला क‍िया। इसके अलावा यह तब तक के लिये एक अंतरिम व्यवस्था मानी गई थी, जब तक कि सभी हितधारकों को शामिल करके कश्मीर मुद्दे का अंतिम समाधान नहीं निकल आता।

क्‍या खत्‍म हो सकता है अनुच्‍छेद 370?

भले ही अनुच्‍छेद 370 अस्‍थायी नहीं है, फ‍िर भी इसे खत्‍म क‍िया जा सकता है। इसे राष्‍ट्रपत‍ि के आदेश से और जम्‍मू-कश्‍मीर संव‍िधान सभा की सहमत‍ि से खत्‍म क‍िया जा सकता है। इस संदर्भ में वस्तुस्थिति यह है कि जम्‍मू-कश्‍मीर संव‍िधान सभा 26 जनवरी, 1957 को भंग हो चुकी है और अभी राज्‍य में राज्यपाल शासन है, इसलिये राष्‍ट्रपत‍ि का आदेश ही इसे खत्‍म करने के लिये काफी है। भारतीय संविधान के 21वें भाग का 370 एक अनुच्छेद है। इसके 3 खंड हैं और तीसरे खंड में लिखा है कि भारत का राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के परामर्श से धारा 370 को कभी भी खत्म कर सकता है।

इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन (IOA)

विलय का प्रारूप (Instrument of Accession-IOA) इसलिये बनाया गया था क्योंकि भारत के दो हिस्से किये जा रहे थे- एक का नाम भारत और दूसरे का नाम पाकिस्तान, अतः ऐसे में विलय पत्र का होना ज़रूरी था। विलय प्रारूप बनाकर 25 जुलाई, 1947 को गवर्नर जनरल माउंटबेटन की अध्यक्षता में सभी रियासतों को बुलाया गया। इन सभी रियासतों को बताया गया कि आपको अपना विलय करना है, चाहे हिंदुस्तान में करें या पाकिस्तान में, यह उनका निर्णय है। यह विलय पत्र सभी रियासतों के लिये एक ही फॉर्मेट में बनाया गया था जिसमें कुछ भी लिखना या काटना संभव नहीं था। इस विलय पत्र पर रियासतों के प्रमुख राजा या नवाब को अपना नाम, पता, रियासत का नाम और सील लगाकर उस पर हस्ताक्षर करके गवर्नर जनरल को देना था, जिसे यह निर्णय लेना था कि कौन सी रियासत किस देश के साथ रह सकती है।

26 अक्तूबर, 1947 को महाराजा हरि स‍िंह द्वारा दस्‍तखत किये गए संध‍ि-पत्र को भी इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन कहा जाता है। इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन भारतीय स्‍वतंत्रता अध‍िनि‍यम, 1947 के ज़र‍िये अमल में आया था। दरअसल कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने शुरू में स्वतंत्र रहने का फैसला किया था, लेकिन पाकिस्तान के कबायली आक्रमण के बाद उन्होंने भारत से मदद मांगी तथा कश्मीर को भारत में शामिल करने पर रज़ामंदी जताई। गौरतलब है कि महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किये और गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने 27 अक्तूबर, 1947 को इसे स्वीकार कर लिया। इसमें न कोई शर्त शामिल थी और न ही रियासत के लिये विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज़ पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाला इलाका (POK) भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया।

इस अध‍िन‍ियम के ज़र‍िये ब्रिटिश साम्राज्‍य का भारत और पाक‍िस्‍तान में बँटवारा हुआ और भारत एक स्वतंत्र देश बना। तब करीब 600 र‍ियासतों की आज़ादी बहाल रखी गई थी। इस अध‍िन‍ियम में तीन व‍िकल्‍प दिये गए थे- आज़ाद देश बने रहें, भारत में म‍िल जाएँ या पाक‍िस्‍तान में शाम‍िल हो जाएँ। रियासतों के भारत या पाक‍िस्‍तान में व‍िलय का आधार इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ एक्‍सेशन को बनाया गया था। इसके लिये कोई तय रूपरेखा नहीं थी। इसलिये यह र‍ियासतों पर न‍िर्भर था क‍ि वे क‍िन शर्तों पर भारत या पाक‍िस्‍तान में शाम‍िल होती हैं।

क्या प्रमुख बदलाव होंगे इस फैसले से?

  • जम्मू-कश्मीर दो भागों में विभाजित कर दिया गया है- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब ये दो अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश होंगे।
  • जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, लेकिन लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। अर्थात् जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार बनेगी, लेकिन लद्दाख की कोई स्थानीय सरकार नहीं होगी।
  • जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान रद्द हो गया है, अब वहाँ भारत का संविधान लागू होगा। जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा भी नहीं होगा।
  • जम्मू-कश्मीर में स्थानीय लोगों की दोहरी नागरिकता समाप्त हो जाएगी।
  • जम्मू-कश्मीर सरकार का कार्यकाल अब छह साल का नहीं, बल्कि पाँच साल का होगा।
  • जम्मू-कश्मीर में देश के अन्य राज्यों के लोग भी ज़मीन लेकर बस सकेंगे। अब तक देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों को वहाँ ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं था।
  • भारत का कोई भी नागरिक अब जम्मू-कश्मीर में नौकरी भी कर सकेगा। अब तक जम्मू-कश्मीर में केवल स्थानीय लोगों को ही नौकरी करने का अधिकार था।
  • जम्मू-कश्मीर की लड़कियों को अब दूसरे राज्य के लोगों से भी विवाह करने की स्वतंत्रता होगी। किसी अन्य राज्य के पुरुष से विवाह करने पर उनकी नागरिकता खत्म नहीं होगी, जैसा कि अब तक होता रहा है।
  • अब भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर का मतदाता बन सकेगा और चुनावों में भाग ले सकेगा।
  • रणबीर दंड संहिता के स्थान पर भारतीय दंड संहिता प्रभावी होगी तथा नए कानून या कानूनों में होने वाले बदलाव स्वतः जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएंगे।

अब अनुच्छेद-370 का केवल खंड-1 लागू रहेगा, शेष खंड समाप्त कर दिये गए हैं। खंड-1 भी राष्ट्रपति द्वारा लागू किया गया था। राष्ट्रपति द्वारा इसे भी हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 370 के खंड-1 के मुताबिक जम्मू-कश्मीर की सरकार से सलाह कर राष्ट्रपति, संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों को जम्मू-कश्मीर पर लागू कर सकते हैं।

Article 370

दिल्ली समझौता और अनुच्छेद 35A

अनुच्छेद 370 के समाप्त होने से अनुच्छेद 35A स्वत: अमान्य हो गया है। इस तरह भूमि, कारोबार और रोज़गार पर वहाँ के लोगों के विशेषाधिकार भी खत्म हो जाएंगे। अनुच्छेद 35A, जो कि अनुच्छेद 370 का विस्तार है, राज्य के स्थायी निवासियों को परिभाषित करने के लिये जम्मू-कश्मीर राज्य की विधायिका को शक्ति प्रदान करता है और वहाँ के स्थायी निवासियों को विशेषाधिकार प्रदान करता है तथा राज्य में अन्य राज्यों के निवासियों को कार्य करने या संपत्ति के स्वामित्व की अनुमति नहीं देता। इस अनुच्छेद का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकीय संरचना की रक्षा करना था।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद शेख अब्दुल्ला वहाँ के अंतरिम प्रधानमंत्री बने। वर्ष 1952 में जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच एक समझौता हुआ, जिसे दिल्ली समझौता कहा जाता है। इस दिल्ली समझौते के तहत संविधान की धारा 370(1)(D) के तहत भारत के राष्ट्रपति को जम्मू-कश्मीर के ‘राज्य विषयों’ के लिये संविधान में ‘अपवाद और संशोधन’ करने का अधिकार मिला हुआ था। इसका इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई, 1954 को एक आदेश के ज़रिये धारा 35A को लागू किया था।

अनुच्छेद 35A की संवैधानिकता को लेकर इस आधार पर बहस की जाती रही है कि इसे संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से नहीं जोड़ा गया था। हालाँकि इसी तरह के प्रावधानों का इस्तेमाल अन्य राज्यों के विशेष अधिकारों को बढ़ाने के लिये भी किया जाता रहा है।

अब चर्चा अनुच्छेद 371 की

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त किये जाने के साथ अनुच्छेद 371 भी अचानक चर्चा में आ गया है, जो अन्य राज्यों, विशेषकर पूर्वोत्तर के राज्यों को विशेष दर्जा प्रदान करता है। जिन राज्यों के लिये अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान किये गए हैं, उनमें से अधिकतर राज्य पूर्वोत्तर के हैं और विशेष दर्जा उनकी जनजातीय संस्कृति को संरक्षण प्रदान करने पर केंद्रित है।

  • अनुच्छेद 371(A) में यह प्रावधान है कि नगालैंड के मामले में नगाओं की धार्मिक या सामाजिक परंपराओं, इसके पारंपरिक कानून और प्रक्रिया, नगा परंपरा कानून के अनुसार फैसलों से जुड़े दीवानी और फौज़दारी न्याय प्रशासन और भूमि तथा संसाधनों के स्वामित्व और हस्तांतरण के संदर्भ में संसद की कोई भी कार्यवाही लागू नहीं होगी। यह तभी लागू होगी जब राज्य विधानसभा इसे लागू करने के लिये प्रस्ताव पारित करे। अनुच्छेद 371(A) कहता है कि राज्य में भूमि और संसाधन सरकार के नहीं, बल्कि लोगों के हैं। इसी वज़ह से कई भूस्वामी अपनी ज़मीन पर सरकार को कोई भी विकास कार्य करने की अनुमति नहीं देते।
  • अनुच्छेद 371(G) भी इसी तरह का है जो मिज़ोरम के लिये विशेष प्रावधान करता है। इसमें यह उल्लेख है कि मिज़ो लोगों की धार्मिक या सामाजिक परंपराओं, इसके पारंपरिक कानून और प्रक्रिया, मिज़ो परंपरा कानून के अनुसार फैसलों से जुड़े दीवानी और फौजदारी न्याय प्रशासन और भूमि तथा संसाधनों के स्वामित्व और हस्तांतरण के संदर्भ में संसद की कोई भी कार्यवाही तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि राज्य विधानसभा इसे लागू करने के लिये प्रस्ताव पारित न करे।
  • अनुच्छेद 371(B) असम के लिये विशेष प्रावधान करता है। इस अनुच्छेद को लाने का मुख्य उद्देश्य उप-राज्य मेघालय का गठन करना था।
  • अनुच्छेद 371(C) 1972 में अस्तित्व में आए मणिपुर को विशेष प्रावधान उपलब्ध कराता है।
  • अनुच्छेद 371(F), 371(H) क्रमश: सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश को विशेष प्रावधान उपलब्ध कराते हैं। अनुच्छेद 371 राष्ट्रपति को महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों और शेष राज्य तथा गुजरात के सौराष्ट्र, कच्छ और शेष राज्य के लिये अलग विकास बोर्डों के गठन की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 371(D), अनुच्छेद 371(E), अनुच्छेद 371 (J), अनुच्छेद 371(I) क्रमश: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और गोवा को विभिन्न विशेष प्रावधान उपलब्ध कराते हैं।

नहीं चलेगी रणबीर दंड संहिता

  • कानूनी मामलों में अदालतें भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code-IPC) के तहत कार्रवाई करती हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे की वज़ह से वहाँ भारतीय दंड संहिता लागू नहीं होती थी।
  • वहाँ इसके बजाय रणबीर दंड संहिता (Ranbir Penal Code) का इस्तेमाल होता था। इसे रणबीर आचार संहिता भी कहा जाता है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भारतीय दंड संहिता का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। राज्य में केवल रणबीर दंड संहिता का प्रयोग होता था, जो ब्रिटिश काल से इस राज्य में लागू थी।
  • भारत के आज़ाद होने से पहले जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत था और उस समय वहाँ डोगरा राजवंश का शासन था। महाराजा रणबीर सिंह जम्मू-कश्मीर के शासक थे; इसलिये 1932 में उन्हीं के नाम पर रणबीर दंड संहिता लागू की गई थी।

राष्ट्रीय बहस का मुद्दा

अनुच्छेद 370 शुरू से ही राष्ट्रीय बहस का मुद्दा रहा है। देश का एक वर्ग इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों को भारत से जोड़ने वाली कड़ी मानता रहा है। लिहाज़ा उसकी मान्यता रही है कि इससे कोई छेड़छाड़ कश्मीरी जनता की भावनाओं के अलावा भारत की मूल संवैधानिक प्रस्थापना के भी खिलाफ जाएगी। जबकि दूसरी राय यह रही है कि इसके तहत मिलने वाले अधिकार और व्यवस्थाएँ भारत की एकात्मकता के खिलाफ हैं और इनमें ज़्यादातर दशकों पहले निष्प्रभावी हो चुकी हैं।

निष्कर्ष

राज्य में पिछले तीन-चार दशकों से जिस तरह के हालात बने हुए थे, उसे देखते हुए यह ज़रूरी भी हो गया था कि इस अनुच्छेद को ख़त्म कर दिया जाए। ऐसा करते समय जाहिर है सरकार के सामने राज्य के विकास को लेकर अपनी परिकल्पनाएं होंगी। वैसे भी यह संवेदनशील कदम काफी सोच-विचार के बाद ही उठाया गया होगा। राज्य की संवेदनशील स्थिति के मद्देनज़र किसी भी जोखिम से निपटने की रणनीति सरकार के पास होगी और इसके लिये ज़रूरी तैयारी भी उसने कर रखी होगी। लेकिन यह धारणा बनाना उचित नहीं होगा कि अनुच्छेद 370 खत्म होने से कश्मीर की समस्या रातोंरात सुलझ जाएगी। इसके अलावा इसे किसी की जीत या हार के रूप में प्रचारित करना ठीक नहीं है, क्योंकि इससे बाकी देश में भी तनाव पैदा हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर को दो राज्यों में बाँट देने के बाद भी वहाँ अमन-चैन कायम हो पाएगा या नहीं?

अभ्यास प्रश्न: अनुच्छेद 370 निरस्त हो जाने से जम्मू-कश्मीर का विकास हो सकेगा तथा वहाँ के निवासी देश की मुख्य धारा में शामिल हो सकेंगे। तर्क सहित परीक्षण करें।

एसएमएस अलर्ट
 

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

नोट्स देखने या बनाने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

प्रोग्रेस सूची देखने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close

आर्टिकल्स को बुकमार्क करने के लिए कृपया लॉगिन या रजिस्टर करें|

close