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डेली अपडेट्स

अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अमेरिकी नीति तथा परमाणु हथियारों की होड़

  • 07 Sep 2019
  • 14 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस आलेख में INF संधि की समाप्ति तथा परमाणु हथियारों के प्रति परिवर्तित अमेरिकी नीति की चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

2 अगस्त, 2019 को अमेरिका ने औपचारिक रूप से अमेरिका-रूस इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस (INF) संधि का परित्याग कर दिया। INF संधि की उलटी गिनती अक्तूबर 2018 में ही शुरू हो गई थी जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका संधि से बाहर निकलने पर विचार कर रहा है। वर्ष 1987 में संपन्न हुए इस समझौते ने दोनों देशों पर यह वैधानिक बाध्यता आरोपित की थी कि वे 500 से 5,500 किलोमीटर रेंज के बीच के सभी ज़मीन-आधारित मिसाइलों को समाप्त कर देंगे, इस लक्ष्य को वर्ष 1991 तक प्राप्त कर लिया गया था।

न्यू स्टार्ट संधि (new Strategic Arms Reduction Treaty-START)

INF संधि की समाप्ति के पश्चात् अब न्यू स्टार्ट संधि पर भी खतरा मंडरा रहा है। ध्यातव्य है कि ट्रंप प्रशासन इस संधि की पहले से ही आलोचना करता रहा है। इस संधि पर वर्ष 2010 में हस्ताक्षर किये गए थे तथा इसकी समय-सीमा फरवरी 2021 तक निर्धारित की गई थी। इस संधि की समय सीमा में पाँच वर्ष का विस्तार किये जाने का प्रावधान मौजूद है, किंतु मौजूदा अमेरिकी प्रशासन का रवैया इस संधि को भी समाप्त करने के पक्ष में है। यह संधि रूस और अमेरिका के परमाणु हथियार और मिसाइलों की संख्या की सीमा निश्चित करती है। इस संधि में निर्धारित हथियारों की संख्या अमेरिका के दृष्टिकोण से उसके हित में नहीं है, इसी आधार पर अमेरिकी प्रशासन इस संधि को समाप्त करने पर भी विचार कर रहा है। न्यू स्टार्ट संधि ने वर्ष 1991 में हस्ताक्षरित स्टार्ट-I (START I) संधि का स्थान लिया था और इसकी समय-सीमा दिसंबर 2009 में समाप्त हो चुकी है।

Advantage Russia

अमेरिका द्वारा यह आशंका प्रकट की गई थी कि रूस संभवतः परमाणु परीक्षण स्थगन का अनुपालन उस तरीके से नहीं कर रहा है, जो कि व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (Comprehensive Test Ban Treaty- CTBT) द्वारा आरोपित 'ज़ीरो-यील्ड’ मानक के अनुरूप है। CTBT प्रभावी नहीं हुई है लेकिन अमेरिका इसका एक हस्ताक्षरकर्त्ता है और रूस ने इस पर हस्ताक्षर करने के साथ ही इसकी पुष्टि भी की है। INF संधि से अमेरिका का बाहर होना, CTBT का अनुपालन न किया जाना तथा न्यू स्टार्ट संधि से अमेरिका के बाहर होने की मंशा परमाणु हथियारों की नई होड़ की ओर संकेत करती है।

शीत युद्ध वार्ता

1980 के दशक में शीत युद्ध का तनाव बढ़ता हुआ नज़र आया। वर्ष 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप ने अमेरिका को पाकिस्तान की सहायता से एक जिहाद को वित्तपोषित करने का अवसर प्रदान किया। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने तो USSR को एक शैतान साम्राज्य की संज्ञा दे डाली, साथ ही अपने अंतरिक्ष युद्ध पहल का आरंभ किया। सोवियत संघ द्वारा यूरोप में SS-20 मिसाइलों की तैनाती के प्रत्युत्तर में अमेरिका ने पर्सिंग II और क्रूज़ मिसाइलों की तैनाती की। वर्ष 1985 में दोनों देशों ने तीन हथियार नियंत्रण वार्ताएँ आरंभ कीं। पहली समझौता वार्ता के अंतर्गत 5,500 किलोमीटर से अधिक रेंज के रणनीतिक हथियारों पर एक सहमति बनी जिसने वर्ष 1991 में START समझौते को जन्म दिया। इस समझौते ने दोनों पक्षों को 6,000 वॉरहेड्स तक सीमित कर दिया। दूसरी वार्ता के अंतर्गत मध्यम दूरी की मिसाइलों पर विचार किया गया जो यूरोपीय देशों के लिये विशेष रूप से चिंता का विषय था और इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1987 में इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस (INF) संधि संपन्न हुई। तीसरी वार्ता परमाणु और अंतरिक्ष क्षेत्र से संबंधित थी जिसका उद्देश्य अमेरिका के रणनीतिक प्रतिरक्षा पहल (Strategic Defence Initiative- SDI) के संबंध में सोवियत चिंताओं को संबोधित करना था लेकिन इस समझौता वार्ता का कोई ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हुआ।

INF संधि की एक निरस्त्रीकरण संधि के रूप में प्रशंसा की गई, जबकि न तो परमाणु वॉरहेड्स नष्ट किये गए थे तथा न ही समान रेंज के वायु तथा समुद्र से मार करने वाली मिसाइलों पर कोई अंकुश लगाया गया। चूँकि यह एक द्विपक्षीय समझौता था इसलिये इस संधि ने अन्य देशों को प्रतिबंधित नहीं किया था, यद्यपि यह बात अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं थी क्योंकि यह द्विध्रुवीयता का युग था और अमेरिका-सोवियत परमाणु समीकरण ही एकमात्र समीकरण था जिसकी चिंता की जा रही थी। वर्ष 1991 तक INF संधि ने अपने लक्ष्य पूरे कर लिये। इसके तहत USSR ने कुल 1,846 मिसाइलों को नष्ट कर दिया जबकि अमेरिका ने भी 846 पर्सिंग और क्रूज़ मिसाइलों के साथ इतनी ही संख्या में अपने मिसाइल नष्ट किये। साथ ही संबंधित उत्पादन प्रतिष्ठानों को भी बंद कर दिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन की सूक्ति ‘ट्रस्ट बट वेरीफाई’ (Trust But Verify) का अनुपालन करते हुए INF संधि ऐसा पहला समझौता रहा जिसमें ऑन-साइट निरीक्षण सहित गहन सत्यापन उपायों को शामिल किया गया था। वर्ष 1991 के अंत में शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के साथ हथियारों की यह होड़ समाप्त हो गई। सोवियत संघ के सहयोगी रहे देश अब उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organization- NATO) में शामिल हो रहे थे और यूरोपीय संघ (EU) की सदस्यता पाने के लिये वार्ता कर रहे थे। अमेरिका अपनी प्रौद्योगिकीय उन्नति के विस्तार के लिये मिसाइल रक्षा और सटीक आक्रमण क्षमताओं में निवेश कर रहा था। उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ कदम परमाणु हथियार और पारंपरिक हथियारों के मध्य के अंतर को समाप्त कर रहे थे।

एंटी बैलिस्टिक मिसाइल संधि से अमेरिका की वापसी

वर्ष 2001 में अमेरिका ने वर्ष 1972 की एंटी बैलिस्टिक मिसाइल संधि (Anti Ballistic Missile-ABM Treaty) की एकतरफा समाप्ति की घोषणा की तो इससे द्विपक्षीय परमाणु हथियार नियंत्रण के एक मूल आधार को नष्ट कर दिया गया। INF संधि पहले से ही खतरे में थी। अमेरिका ने रूस के मध्यम दूरी की मिसाइलों के परीक्षण को लेकर एक दशक पहले ही चिंता जताना शुरू कर दिया था। रूस ने जब इन मिसाइलों का उत्पादन शुरू किया तो अमेरिका ने इसे INF संधि का उल्लंघन माना। वस्तुतः रूस का मानना ​​है कि ABM संधि से अमेरिका के एकतरफा बहिर्गमन के बाद से परमाणु स्थिरता की स्थिति बिगड़नी शुरू हुई। जैसे ही अमेरिका ने अपनी प्रौद्योगिकीय बढ़त का उपयोग कर लाभ की स्थिति पाई, रूस भी अपने आक्रामक परमाणु शस्त्रागार पर अधिकाधिक निर्भर होता गया और उसने इसके आधुनिकीकरण व विविधीकरण की शुरुआत की।

वर्ष 2017 में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने अमेरिकी के सुरक्षा वातावरण का पहले की तुलना में कठोर मूल्यांकन किया और परमाणु हथियारों के लिये अधिक विस्तृत भूमिका की मांग की गई। इस प्रकार, उन नीतियों का परित्याग कर दिया गया, जो शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से प्रयोग में थीं। रूस को एक विघटनकारी शक्ति के रूप में देखा गया जो यूरोप और पश्चिम एशिया में अपने पक्ष में सुरक्षा और आर्थिक संरचनाओं के पुनर्निर्माण का प्रयास कर रहा था। चीन को पहली बार सामरिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में चिह्नित किया गया जो निकट भविष्य में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आधिपत्य और भविष्य में वैश्विक पूर्व-प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये अमेरिका को अपदस्थ करने की मंशा रखता था। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर भूराजनीतिक झुकाव के साथ अमेरिका का मानना ​​है कि INF संधि उसे चीन की तुलना में नुकसान की स्थिति में रख रही थी, जो तेज़ी से अपना सैन्य आधुनिकीकरण कर रहा है वर्तमान में चीन के 95 प्रतिशत बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइल इन्वेंट्री आईएनएफ रेंज के हैं। इस राजनीतिक पृष्ठभूमि में इस संधि का टूटना लगभग तय ही था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि न्यू स्टार्ट संधि के भविष्य पर निर्णय 2020 के चुनाव के बाद जनवरी 2021 में लिया जाएगा। विदित है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस संधि के धुर-विरोधी हैं, अतः उनके पुनर्निर्वाचन की स्थिति में न्यू स्टार्ट की परिणिति भी INF संधि के समान ही होगी। इसका अर्थ यह है कि वर्ष 1972 के बाद पहली बार (जब Strategic Arms Limitation Act- SALT लाया गया था) अमेरिका और रूस के सामरिक शस्त्रागार किसी भी हथियार नियंत्रण समझौते से नियंत्रित नहीं होंगे।

लो-यील्ड हथियारों का परीक्षण

अमेरिका की NPR (Nuclear Posture Review) रिपोर्ट 2018 लो-यील्ड हथियारों (छोटे परमाणु हथियार जिनकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम होती है) सहित नए परमाणु हथियारों के विकास की परिकल्पना करती है। अमेरिकी सीनेट ने वर्ष 1999 में CTBT को अस्वीकार कर दिया था जबकि एक हस्ताक्षरकर्त्ता के रूप में अमेरिका ने इसका पर्यवेक्षण किया है। अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि चीन CTBT के उल्लंघन के बिना ऐसी सैन्य प्रगति हासिल नहीं कर सकता है। चूँकि CTBT को अमेरिका, चीन, ईरान, इज़राइल और मिस्र की पुष्टि (Ratification) तथा भारत, पाकिस्तान एवं उत्तर कोरिया द्वारा इस पर हस्ताक्षर किये जाने की आवश्यकता है, इसके पश्चात् ही यह संधि लागू हो सकेगी। अमेरिका द्वारा पुनः परमाणु परीक्षणों की शुरुआत इसके प्रभावी पतन को सुनिश्चित करेगी।

निष्कर्ष

संभव है कि परमाणु हथियारों की यह नई होड़ एक शुरुआत भर है। शीत युद्ध के द्विध्रुवीय समीकरण के विपरीत इस बार कई देश परमाणु सैन्य सक्रियता के साथ स्थिति को अत्यंत जटिल बनाएंगे।यह प्रौद्योगिकीय प्रगति साइबर और अंतरिक्ष डोमेन में भी संघर्ष को जन्म दे रही है। परिदृश्य की ये प्रगतियाँ संघर्ष में वृद्धि के खतरे बढ़ा रही हैं और संभव है कि यह परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को ही प्रभावित न कर दे। यह उपलब्धि थी- परमाणु हथियारों के उपयोग के विरुद्ध एक निषेध की भावना जो वर्ष 1945 से वैश्विक चेतना में थी।

प्रश्न: अमेरिकी प्रशासन की नीतियाँ शीत युद्धकालीन परमाणु हथियारों की होड़ को दोबारा जन्म दे रही हैं। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिये।

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