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जीव विज्ञान और पर्यावरण

विश्व जैव ईंधन दिवस

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  • 12 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये

विश्व जैव ईंधन दिवस, जैव ईंधन, बायोमेथेनेशन

मेन्स के लिये

जैव ईंधन को बढ़ावा देने हेतु सरकार की पहल  

चर्चा में क्यों?

‘विश्व जैव ईंधन दिवस’ प्रतिवर्ष 10 अगस्त को मनाया जाता है।

प्रमुख बिंदु

विश्व जैव ईंधन दिवस

  • यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में गैर-जीवाश्म ईंधन के महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये मनाया जाता है।
  • ‘संयुक्त राष्ट्र विकास औद्योगिक संगठन’ और ‘वैश्विक पर्यावरण सुविधा (एक वित्तीय तंत्र) के सहयोग से ‘नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय’ ने इस अवसर पर निम्नलिखित दो योजनाएँ शुरू की हैं:
    • इंटरेस्ट सबवेंशन योजना।
    • जैविक अपशिष्ट स्ट्रीम्स का GIS आधारित इन्वेंटरी टूल।
  • जैव ईंधन कार्यक्रम भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के लिये भी महत्त्वपूर्ण है।

इतिहास

  • यह दिवस ‘सर रुडोल्फ डीज़ल’ के सम्मान में मनाया जाता है। वह डीज़ल इंजन के आविष्कारक थे और जीवाश्म ईंधन के विकल्प के तौर पर वनस्पति तेल के प्रयोग की संभावना की भविष्यवाणी करने वाले पहले व्यक्ति थे।

वर्ष 2021 की थीम

  • यह बेहतर पर्यावरण के लिये जैव ईंधन को बढ़ावा देने पर आधारित है।

आयोजन

  • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा वर्ष 2015 से इसका आयोजन किया जा रहा है।

महत्त्व

  • कोई भी हाइड्रोकार्बन ईंधन, जो किसी कार्बनिक पदार्थ (जीवित या किसी एक समय पर जीवित सामग्री) से कम समय (दिन, सप्ताह या महीनों) में उत्पन्न होता है, उसे जैव ईंधन माना जाता है।
    • जैसे- इथेनॉल, बायोडीज़ल, ग्रीन डीज़ल और बायोगैस आदि।
  • जैव ईंधन कच्चे तेल पर निर्भरता को कम करने और स्वच्छ वातावरण को बढ़ावा देने में मदद करता है।
  • यह ग्रामीण क्षेत्रों के लिये अतिरिक्त आय और रोज़गार सृजन में भी मदद करेगा।
  • यह न केवल भारत की ग्रामीण ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगा, बल्कि परिवहन की बढ़ती मांगों को भी पूरा करेगा।
  • जैव ईंधन के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और 21वीं सदी की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकेगा।

इंटरेस्ट सबवेंशन योजना

  • यह अपशिष्ट से ऊर्जा संबंधी बायोमेथेनेशन परियोजनाओं और अभिनव व्यापार मॉडल के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
    • औद्योगिक जैविक अपशिष्ट-से-ऊर्जा जैव-मीथेनेशन परियोजनाएँ आमतौर पर पूंजी गहन और वित्तीय रूप से परिचालन लागतों (जैसे- अपशिष्ट उपलब्धता) एवं राजस्व, विशेष रूप से बायोगैस यील्ड तथा इसके उपयोग, दोनों के प्रति ही संवेदनशील होती हैं।
    • ऐसी परियोजनाओं में नवाचार का उद्देश्य समग्र ऊर्जा उत्पादन में सुधार करना होता है, जिससे ऊर्जा उत्पादन की लागत को कम-से-कम किया जा सके, लेकिन स्थापना चरण में प्रारंभिक परियोजना लागत अधिक हो सकती है फिर भी राजस्व में वृद्धि एवं परियोजना के जीवनकाल में परिचालन लागत कम होती है।
  • यह ऋण योजना लाभार्थियों को ऐसी परियोजनाओं के सामने आने वाले ऋण घटक पर ब्याज़ के वित्तीय बोझ को कम करने के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

जैविक अपशिष्ट स्ट्रीम्स का GIS आधारित इन्वेंटरी टूल

  • यह टूल पूरे भारत में उपलब्ध शहरी और औद्योगिक जैविक कचरे एवं उनकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता के ज़िला स्तर का अनुमान प्रदान करता है।
  • GIS (भौगोलिक सूचना प्रणाली) टूल SMEs (लघु एवं मध्यम उद्यम) और परियोजना डेवलपर्स को ऊर्जा परियोजनाओं के लिये नए अपशिष्ट से ऊर्जा परियोजना स्थापित करने में सक्षम बनाएगा और देश में अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र में बायोमेथेनेशन के तीव्र विकास की सुविधा प्रदान कर सकता है। 

बायोमेथेनेशन

  • बायोमेथेनेशन का आशय ऐसी प्रकिया से है जिसके द्वारा कार्बनिक पदार्थों को अवायवीय परिस्थितियों में सूक्ष्मजैविक रूप से बायोगैस में परिवर्तित किया जाता है।
    • इसमें सूक्ष्मजीवों के तीन मुख्य शारीरिक समूह शामिल हैं: किण्वन बैक्टीरिया, कार्बनिक अम्ल ऑक्सीकरण बैक्टीरिया और मिथेनोजेनिक आर्किया।
    • सूक्ष्मजीव, जैव रासायनिक रूपांतरणों के कैस्केड के माध्यम से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बनिक पदार्थों में विघटित कर देते हैं।

जैव ईंधन को बढ़ावा देने हेतु सरकार की पहल  

  • जैव ईंधन का सम्मिश्रण: जैव ईंधन के सम्मिश्रण को बढ़ावा देने के लिये इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम, इथेनॉल के लिये प्रशासनिक मूल्य तंत्र,तेल विपणन कंपनियों (OMC) के लिये खरीद प्रक्रिया को सरल बनाना, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के प्रावधानों में संशोधन आदि कुछ पहलें की गई हैं।
  • इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (ICGEB) के शोधकर्त्ता जैव ईंधन उत्पादन के लिये साइनोबैक्टीरियम (Cyanobacterium) का उपयोग करने हेतु एक विधि विकसित कर रहे हैं।
  • हाल ही में केंद्र सरकार ने भी अधिशेष चावल को इथेनॉल में बदलने की अनुमति दी है।
  • प्रधानमंत्री जी-वन योजना, 2019 : इस योजना का उद्देश्य दूसरी पीढ़ी (2G) के इथेनॉल उत्पादन हेतु वाणिज्यिक परियोजनाओं की स्थापना के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना और इस क्षेत्र में अनुसंधान तथा विकास को बढ़ावा देना है।
  • गोबर-धन (Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan - GOBAR-DHAN) योजना: यह खेतों में मवेशियों के गोबर और ठोस कचरे को उपयोगी खाद, बायोगैस और बायो-सीएनजी में बदलने और इस प्रकार गाँवों को साफ रखने व ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने पर केंद्रित है।
  • रिपर्पज़ यूज़्ड कुकिंग ऑयल (Response Used Cooking Oil): इसे भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा लॉन्च किया गया था तथा इसका उद्देश्य एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र विकसित करना है जो प्रयुक्त कुकिंग आयल को बायो-डीज़ल में संग्रह व रूपांतरण करने में सक्षम हो।
  • जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति, 2018 : इस नीति द्वारा गन्ने का रस, चीनी युक्त सामग्री जैसे- चुकंदर, मीठा शर्बत सोरघम, स्टार्च युक्त सामग्री तथा मानव उपभोग हेतु अनुपयुक्त क्षतिग्रस्त अनाज, जैसे- गेहूँ, टूटे चावल और सड़े हुए आलू का उपयोग करके एथेनॉल उत्पादन हेतु कच्चे माल के दायरे का विस्तार किया गया है।

आगे की राह 

  • भारत जैसे देश में परिवहन में जैव ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने से कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने में मदद मिलेगी।
  • एक बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था बनने हेतु भारत के पास बड़ी मात्रा में कृषि अवशेष उपलब्ध हैं, इसलिये देश में जैव ईंधन के उत्पादन की गुंजाइश बहुत अधिक है। जैव ईंधन नई नकदी फसलों के रूप में ग्रामीण और कृषि विकास में मदद कर सकता है।
  • शहरों में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट और नगरपालिका कचरे का उपयोग सुनिश्चित कर स्थायी जैव ईंधन उत्पादन के प्रयास किये जाने चाहिये। एक अच्छी तरह से डिज़ाइन और कार्यान्वित जैव ईंधन नीति भोजन एवं ऊर्जा दोनों प्रदान कर सकती है।
  • एक समुदाय आधारित बायोडीज़ल वितरण कार्यक्रम जो स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुँचाता है, फीडस्टॉक को विकसित करने वाले किसानों से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक ईंधन का उत्पादन और वितरण करने वाला एक स्वागत योग्य कदम होगा।

स्रोत: पी.आई.बी.

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