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गोबर-धन योजना : दोहरे उद्देश्यों की कुंजी

  • 27 Feb 2018
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

  • बजट 2018-19 में गोबर-धन (Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan - GOBAR-DHAN) योजना शुरू करने की घोषणा की गई थी।
  • हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा गोबर-धन योजना के सुचारु संचालन के लिये एक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने की बात कही गई है। किसानों के लिये गोबर और फसल अवशेषों के उचित दाम सुनिश्चित करने हेतु यह प्लेटफॉर्म किसानों को खरीदारों से जोड़ेगा।

गोबर-धन (गैल्वनाइज़िंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज़-धन) योजना

  • बजट 2018-19 में इस योजना के मुख्यत: दो उद्देश्य हैं : गाँवों को स्वच्छ बनाना एवं पशुओं और अन्य प्रकार के जैविक अपशिष्ट से अतिरिक्त आय तथा ऊर्जा उत्पन्न करना।
  • गोबर-धन योजना के अंतर्गत पशुओं के गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पदार्थों को कम्पोस्ट, बायोगैस, बायो-CNG में परिवर्तित किया जाएगा।
  • इस कार्यक्रम के अप्रैल माह में शुरू होने की उम्मीद की जा रही है। इसका लक्ष्य उद्यमियों को जैविक खाद, बायोगैस / बायो-CNG उत्पादन के लिये गाँवों के क्लस्टर्स बनाकर इनमें पशुओं का गोबर और ठोस अपशिष्टों के एकत्रीकरण और संग्रहण को बढ़ावा देना है।
  • फिलहाल प्रत्येक ज़िले में एक क्लस्टर का निर्माण करते हुए लगभग 700 क्लस्टर्स स्थापित करने की योजना है।
  • इसके तहत जैव-ऊर्जा मूल्य श्रृंखला के सभी श्रेणियों में छोटे और बड़े पैमाने पर परिचालनों को शामिल करते हुए विभिन्न व्यवसाय मॉडल विकसित किये जा रहे हैं।

योजना की सफलता की संभावनाएं 

  • 19वीं पशुधन जनगणना (2012) के मुताबिक़ भारत में मवेशियों की 300 मिलियन आबादी से प्रतिदिन लगभग 30 लाख टन गोबर प्राप्त होता है।
  • कुछ यूरोपीय देशों और चीन द्वारा ऊर्जा उत्पादन के लिये पशुओं के गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट का उपयोग किया जाता है।
  • लेकिन भारत इस तरह के अपशिष्ट की आर्थिक क्षमताओं का पूरी तरह लाभ उठाने में सफल नहीं हो सका है।
  • दुनिया में सबसे बड़ी पशु जनसंख्या के साथ भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर की बड़ी मात्रा को धन और ऊर्जा में बदलकर इसका लाभ उठाने की क्षमता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अध्ययन (2014) के मुताबिक गोबर का प्रोडक्टिव तरीके से उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर 15 लाख रोज़गारों का सृजन कर सकता है। जैसे- एक किसान के लिये गोबर की बिक्री आय का एक महत्त्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत सिद्ध हो सकता है। 
  • मवेशियों का गोबर, रसोई अपशिष्ट और कृषि संबंधी कचरे का बायोगैस-आधारित ऊर्जा बनाने के लिये प्रयोग किया जा सकता है।
  • गोबर-धन की पहल से पशुओं का गोबर और अन्य कार्बनिक अपशिष्ट को खाद, बायोगैस और यहां तक ​​कि बड़े पैमाने पर बायो-CNG इकाइयों में परिवर्तित करने के लिये ऐसे ही अवसरों का सृजन किये जाने की संभावना है।
  • स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण इस पहल का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।

स्वच्छ भारत मिशन

  • स्वच्छ भारत मिशन का प्रमुख लक्ष्य भारत को खुले में शौच से मुक्त (ODF) बनाने के साथ ही शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में स्वच्छता का प्रसार करना है। इस मिशन के तहत ODF मोर्चे पर अच्छी प्रगति हुई है।
  • ग्रामीण स्वच्छता कवरेज अक्टूबर 2014 में 39% से बढ़कर वर्तमान में 78% हो गया है और लगभग 3,20,000 गाँवों को ODF घोषित किया जा चुका है तथा थर्ड पार्टी सर्वेक्षणों के अनुसार शौचालयों का उपयोग 90% से अधिक है।
  • अब ग्रामीण भारत में सामान्य स्वच्छता और प्रभावी ठोस तथा तरल अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिये काफी ज़ोर दिया जा रहा है। इन उद्देश्यों को गोबर-धन योजना के साथ एकीकृत कर इस दिशा में प्रगति की जा सकती है।

चुनौतियाँ

  • इसमें प्रमुख चुनौती गोबर के उपयोग में मूल्यवर्द्धन और किसानों के बीच मवेशियों के अपशिष्ट को आय अर्जक साधन की तरह प्रोत्साहित करने के साथ ही समुदाय में स्वच्छता बनाए रखना है। 
  • बायोगैस संयंत्रों के संचालन के लिये एक प्रमुख चुनौती पशु अपशिष्ट का एकत्रीकरण और संयंत्र ऑपरेटरों को इसकी नियमित आपूर्ति बनाए रखना है।
  • यही समस्या बायो-CNG संयंत्रों जैसी उच्च मूल्य श्रृंखला वाली गतिविधियों में भी है।

आगे की राह 

  • इस योजना के सफल कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु ग्रामीण समुदायों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है जो बायोगैस संयंत्रों के संचालन को सुगम बनाने हेतु मवेशियों के गोबर को जमा करते हैं। ये संयंत्र आमतौर पर पारंपरिक LPG गैस सिलेंडर की तुलना में कम लागत पर रसोई गैस की आपूर्ति करते हैं। 

कचरे से ऊर्जा : केस स्टडी 

  • पंजाब के होशियारपुर में लाम्बरा कांगड़ी बहुउद्देशीय सहकारी सेवा सोसायटी द्वारा यह कार्य सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
  • यह सोसायटी मवेशियों के गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट को इकट्ठा कर इसका उपयोग बायोगैस संयंत्र चलाने के लिये करती है और इस तरह निर्मित कुकिंग गैस को सोसायटी के सदस्यों को उपलब्ध कराया जाता है।
  • इसी तरह सूरत (गुजरात) में ग्राम विकास ट्रस्ट द्वारा गोबर बैंक पहल की शुरुआत की गई है, जहाँ पर सामुदायिक बायोगैस संयंत्र को चलाने के लिये सदस्यों द्वारा ताज़ा गोबर लाया जाता है। सदस्यों द्वारा लाए गए गोबर को तौलकर उनके पासबुक में एंट्री कर दी जाती हैं।
  • इसके बदले में उन्हें सस्ते दामों पर कुकिंग गैस के साथ ही बायोगैस संयंत्र के अवशेष के रूप में जैविक घोल (Bio-slurry) भी उपलब्ध करा दिया जाता है जिसका वर्मी कंपोस्ट और जैविक खेती के लिये उपयोग किया जाता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में अपशिष्ट से आय सुनिश्चित करने हेतु सभी हितधारकों और क्षेत्रों की भागीदारी की आवश्यकता होगी। साथ ही निजी क्षेत्र और स्थानीय उद्यमियों के निवेश की आवश्यकता होगी।
  • डंपिंग साइटों और लैंडफिल में जाने वाले जानवरों के और जैविक अपशिष्ट का लाभ उठाने के लिये पंचायतों और ग्रामीण समुदायों को प्रमुख भूमिका निभानी होंगी।
  • अनौपचारिक स्वच्छता सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षण और उन्हें लाइसेंस देकर इस व्यवस्था में एकीकृत किया जा सकता है।
  • उचित नीतियों और व्यवहारों द्वारा इस क्षेत्र में विकास के अवसरों में बढ़ाया जा सकता है जिससे किसानों को अतिरिक्त आय, दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा और गाँवों में अधिक स्वच्छता सुनिश्चित की जा सकेगी।
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