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जैव विविधता और पर्यावरण

वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2022

  • 09 Dec 2022
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2022, UNEP, CITES।

मेन्स के लिये:

जैव विविधता और वन्यजीव का महत्त्व, वन्यजीव का (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2022 का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राज्यसभा ने वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2022 पारित किया, जो वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन (Convention on International Trade on Endangered Species of Wild Fauna and Flora- CITES) के तहत भारत के दायित्वों को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है।

विधेयक का उद्देश्य:

  • लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण: विधेयक अवैध वन्यजीव व्यापार के लिये सजा बढ़ाने का प्रयास करता है।
  • संरक्षित क्षेत्रों का बेहतर प्रबंधन: यह स्थानीय समुदायों द्वारा पशुओं के चरने या आवाजाही और पीने एवं घरेलू जल के वास्तविक उपयोग जैसी कुछ अनुमत गतिविधियों के लिये अनुमति प्रदान करता है।
  • वन भूमि का संरक्षण: संबद्ध वनक्षेत्र में सदियों से रह रहे लोगों के अधिकारों की सुरक्षा को समान रूप से शामिल करना।

प्रस्तावित संशोधन

  • इस संशोधन ने CITES के तहत परिशिष्ट में सूचीबद्ध प्रजातियों के लिये एक नया कार्यक्रम प्रस्तावित किया।
  • ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग करने एवं स्थायी समिति का गठन करने के लिये धारा 6 में संशोधन किया गया है जो इसे राज्य वन्यजीव बोर्ड द्वारा प्रत्यायोजित किया जा सकता है।
  • अधिनियम की धारा 43 में संशोधन किया गया जिसमें 'धार्मिक या किसी अन्य उद्देश्य' के लिये हाथियों के उपयोग की अनुमति दी गई है ।
  • केंद्र सरकार को एक प्रबंधन प्राधिकरण नियुक्त करने में सक्षम बनाने के लिये धारा 49E को जोड़ा गया है।
  • केंद्र सरकार को एक वैज्ञानिक प्राधिकरण नियुक्त करने की अनुमति देना जो व्यापार किये जाने वाले नमूनों के अस्तित्त्व पर पड़ने वाले प्रभाव से संबंधित मामलों पर मार्गदर्शन प्रदान करे।
  • विधेयक केंद्र सरकार को विदेशी प्रजातियों के आक्रामक पौधे या पशु के आयात, व्यापार या नियंत्रण को विनियमित करने और रोकने का भी अधिकार देता है।
  • विधेयक अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिये निर्धारित दंड को भी बढ़ाता है।
    • 'सामान्य उल्लंघन' के लिये अधिकतम ज़ुर्माना 25,000 रूपए से बढ़ाकर 1 लाख रूपए कर दिया गया है।
    • विशेष रूप से संरक्षित पशुओं के मामले में न्यूनतम ज़ुर्माना 10,000 रूपए से बढ़ाकर 25,000 रूपए कर दिया गया है।

विधेयक से जुड़ी चिंताएँ:

  • वाक्यांश "कोई अन्य उद्देश्य" अस्पष्ट है और हाथियों के वाणिज्यिक व्यापार को प्रोत्साहित करने की क्षमता रखता है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष, पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र नियम आदि से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया है।
  • संसदीय स्थायी समिति द्वारा प्रदान की गई रिपोर्ट के अनुसार विधेयक की तीनों अनुसूचियों में सूचीबद्ध प्रजातियाँ अधूरी हैं।
  • वैज्ञानिक, वनस्पतिशास्त्री, जीवविज्ञानी संख्या में कम हैं और वन्यजीवों की सभी मौजूदा प्रजातियों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में तेज़ी लाने के लिये उन्हें अधिक से अधिक शामिल करने की आवश्यकता है।

वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972:

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 जंगली जानवरों और पौधों की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण, उनके आवासों के प्रबंधन एवं विनियमन तथा जंगली जानवरों, पौधों व उनसे बने उत्पादों के व्यापार पर नियंत्रण के लिये एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • यह अधिनियम सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की सुरक्षा और निगरानी प्राप्त उन पौधों और पशुओं की अनुसूची को भी सूचीबद्ध करता हैै।

CITES:

  • CITES एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जिसका राष्ट्र और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण संगठन स्वेच्छा से पालन करते हैं।
  • वर्ष 1963 में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature- IUCN) के सदस्य देशों की बैठक में अपनाए गए एक प्रस्ताव के परिणामस्वरूप CITES का मसौदा तैयार किया गया था।
  • CITES जुलाई 1975 में लागू हुआ था।
  • CITES सचिवालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है और यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा प्रशासित है।
  • भारत CITES का एक हस्ताक्षरकर्त्ता है।

वन्यजीव संरक्षण के लिये संवैधानिक प्रावधान

  • 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976, द्वारा वन और जंगली पशुओं और पक्षियों के संरक्षण को राज्य से समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया गया था।
  • संविधान के अनुच्छेद 51A(जी) में कहा गया है कि वनों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं सुधार करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य होगा।
  • राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों में अनुच्छेद 48 ए, के तहत राज्य पर्यावरण की रक्षा और विकसित करने तथा देश के वनों और वन्य जीव की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

आगे की राह:

  • वन्य जीवों के संरक्षण हेतु कानून का सख्ती से पालन आवश्यक है।
  • अचल संपत्ति में शामिल व्यवसायों और निगमों को अपनी धन और बल शक्ति को संतुलित करने के लिये कानून का सख्ती से पालन करना चाहिये।
    • कुछ निगमों के लाभ के लिये निकोबार के जंगलों को पूरी तरह से उजाड़ा व नष्ट किया जा रहा है।
    • अतः मुख्य रूप से, वन्यजीवों पर वास्तव में मनुष्यों द्वारा नहीं बल्कि निगमों द्वारा हमला किया जा रहा है।
  • केवल नियमों और तकनीकी की समझ ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आदिवासी समुदायों को भी अपने अधिकारों का ज्ञान होना आवश्यक है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न 

प्रश्न. यदि किसी विशेष पादप प्रजाति को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची VI के अंतर्गत रखा जाता है, तो इसका अर्थ क्या है? (2020)

(a) उस पौधे को उगाने के लिये लाइसेंस की जरूरत होती है।
(b) ऐसे पौधे की खेती किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है।
(c) यह एक आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल का पौधा है।
(d) ऐसा पौधा आक्रामक और पारिस्थितिकी तंत्र के लिये हानिकारक है।

उत्तर: (a)

स्रोत: द हिंदू

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