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शासन व्यवस्था

टू फिंगर टेस्ट

  • 03 Nov 2022
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

सर्वोच्च न्यायालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन

मेन्स के लिये:

बलात्कार पीड़ितों के लिये प्रतिगामी कानून

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कथित बलात्कार पीड़ितों का 'टू-फिंगर टेस्ट' कराने वालों को कदाचार का दोषी ठहराया जाएगा।

टू फिंगर टेस्ट:

  • परिचय:
    • चिकित्सक द्वारा किये जाने वाले टू-फिंगर टेस्ट में पीड़िता के जननांगों की संसर्ग संबंधी अभ्यास की जाँच की जाती है।
      • यह अभ्यास अवैज्ञानिक है और कोई विशिष्ट जानकारी प्रदान नहीं करता है। इसके अलावा ऐसी 'सूचना/जानकारी' का बलात्कार के आरोप से कोई लेना-देना नहीं है।
    • महिला जिसका यौन उत्पीड़न हुआ है, उसके स्वास्थ्य और चिकित्सीय ज़रूरतों का पता लगाने, साक्ष्य एकत्र करने आदि के लिये उसे चिकित्सीय परीक्षण से गुज़रना पड़ता है।
    • यौन उत्पीड़न पीड़ितों के मामलों से निपटने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी एक पुस्तिका कहती है, "कौमार्य (या 'टू-फिंगर') परीक्षण के लिये कोई जगह नहीं है, इसकी कोई वैज्ञानिक वैधता नहीं है।"
  • सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन:
    • वर्ष 2004 में सर्वोच्च न्यायालय की एकल बेंच ने महिलाओं के एक्टिव और पैसिव इंटरकोर्स को आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) के तत्त्वों को लागू करने के आलोक में अप्रासंगिक माना।
    • न्यायालय ने कहा कि जब कोई महिला बलात्कार का आरोप लगाती है तो उसे, उसके यौन रूप से सक्रिय होने के कारण बलात्कार न मानना पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण का प्रतीक है।
    • मई 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि टू फिंगर टेस्ट किसी महिला के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है और सरकार से यौन शोषण की पुष्टि के लिये बेहतर चिकित्सा प्रक्रिया प्रदान करने हेतु आग्रह किया था।
    • आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1966 तथा अपराध के शिकार एवं शक्ति के दुरुपयोग के पीड़ितों के लिये न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा 1985 का आह्वान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बलात्कार पीड़ित कानूनी सहायता की हकदार हैं क्योंकि इससे उन्हें नुकसान पहुँचने के साथ इनकी शारीरिक या मानसिक अखंडता और गरिमा पर आघात होता है।
    • अप्रैल 2022 में मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य को टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था।

सरकार के दिशा-निर्देश:

  • त्वरित सुनवाई के लिये आपराधिक कानून में संशोधन और यौन उत्पीड़न के मामलों में बढ़ी सज़ा पर विचार हेतु गठित जस्टिस वर्मा समिति, 2013 की रिपोर्ट के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वर्ष 2014 की शुरुआत में यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की चिकित्सा जाँच हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये।
  • दिशानिर्देशों के अनुसार, बलात्कार/यौन हिंसा को स्थापित करने के लिये 'टू-फिंगर टेस्ट' नहीं किया जाना चाहिये।
  • दिशानिर्देशों में कहा गया है कि किसी भी मेडिकल जाँच के लिये बलात्कार पीड़िता (या उसके अभिभावक, यदि वह नाबालिग/मानसिक रूप से विकलांग है) की सहमति आवश्यक है। सहमति न देने पर भी पीड़िता को आवश्यक इलाज की सुविधा मुहैया कराई जाती है।
  • हालाँकि ये दिशानिर्देश मात्र हैं कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं।

आगे की राह

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को निजी एवं सरकारी अस्पतालों में परिचालित किया जाना चाहिये।
  • बलात्कार पीड़िताओं का परीक्षण किये जाने से रोकने हेतु स्वास्थ्य प्रदाताओं के लिये कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिये।
  • इस मुद्दे को डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों दोनों के व्यापक संवेदीकरण एवं प्रशिक्षण द्वारा संबोधित किया जा सकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न: हमें देश में महिलाओं के प्रति यौन-उत्पीड़न के बढ़ते हुए दृष्टांत दिखाई दे रहे हैं। इस कुकृत्य के विरूद्ध विद्यमान विधिक उपबंधों के होते हुए भी ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। इस संकट से निपटने के लिये कुछ नवाचारी सुझाव दीजिये। (2014)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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