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सामाजिक न्याय

दो बच्चों की नीति: समय की आवश्यकता

  • 15 Feb 2020
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये

निजी विधेयक या गैर सरकारी विधेयक

मेन्स के लिये

दो बच्चों की नीति के पक्ष व विपक्ष में तर्क

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राज्यसभा के एक सदस्य द्वारा दो बच्चों की नीति से संबंधित एक निजी विधेयक या गैर सरकारी विधेयक (Private Member Bill) सदन में प्रस्तुत किया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • इस संविधान संशोधन विधेयक में उन लोगों के लिये कराधान, शिक्षा और रोज़गार के प्रोत्साहन का प्रस्ताव है जो अपने परिवार का आकार दो बच्चों तक सीमित रखते हैं।
  • विधेयक में संविधान के भाग-IV में एक नए प्रावधान को शामिल करने की मांग की गई है, जो ऐसे लोगों से सभी रियायतें वापस लेने से संबंधित हैं और जो ‘छोटे-परिवार’ के मानदंड का पालन करने में विफल रहते हैं।
  • विधेयक संविधान में अनुच्छेद-47 के बाद अनुच्छेद-47A के सम्मिलन का प्रस्ताव करता है।
  • प्रस्तावित अनुच्छेद 47A के अनुसार “राज्य, बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने की दृष्टि से छोटे परिवार को बढ़ावा दें। जो लोग अपने परिवार को 2 बच्चों तक सीमित रखते हैं उन्हें कर, रोज़गार और शिक्षा आदि में प्रोत्साहन देकर बढ़ावा दिया जाए और जो लोग इस नीति का पालन न करें उनसे सभी तरह की छूट वापस ले ली जाए।
  • इससे पूर्व मार्च 2018 में दो बच्चों की नीति की आवश्यकता पर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी।
  • हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि नीति निर्माण न्यायालय का कार्य नहीं है। यह संसद से संबंधित मामला है और न्यायालय इसमें दखल नहीं दे सकता।

निज़ी विधेयक से तात्त्पर्य

  • इसे गैर सरकारी विधेयक के नाम से भी जाना जाता है। यह संसद के किसी भी सदन में मंत्रिपरिषद के सदस्य के अलावा सदन के किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • यह किसी सार्वजनिक महत्त्व के मामले पर सदन का ध्यान आकर्षित करने के लिये प्रस्तुत किया जाता है।
  • ऐसे प्रस्ताव को सदन में पेश करने के लिये 1 माह पूर्व नोटिस देना आवश्यक है।

नीति के पक्ष में तर्क

  • जनसंख्या बढ़ने से बेरोज़गारी, गरीबी, अशिक्षा, खराब स्वास्थ्य और प्रदूषण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इसलिये दो बच्चों की नीति इस दिशा में एक कारगर उपाय सिद्ध होगा।
  • वर्ष 2050 तक देश की शहरी आबादी दोगुनी हो जाएगी, जिसके चलते शहरी सुविधाओं में सुधार और सभी को आवास उपलब्ध कराने की चुनौती होगी, साथ ही पर्यावरण को भी मद्देनज़र रखना ज़रूरी होगा।
  • आय का असमान वितरण और लोगों के बीच बढ़ती असमानता अत्यधिक जनसंख्या के नकारात्मक परिणामों के रूप में सामने आएगा।
  • जहाँ एक ओर जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है तो वहीं दूसरी ओर कृषि योग्य भूमि तथा खाद्य फसल के उत्पादन में कमी हो रही है जिससे लोगों के समक्ष खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो रहा है।

नीति के विपक्ष में तर्क

  • नीति के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर जबरन नसबंदी और गर्भपात जैसे उपाय अपनाए जाने की आशंका है।
  • इस नीति से वृद्ध लोगों की जनसंख्या बढ़ती जाएगी तथा वृद्ध लोगों को सहारा देने के लिये युवा जनसंख्या में कमी आ जाएगी।
  • इस नीति से हम जनसांख्यिकीय लाभांश की अवस्था को खो देंगे।

जनसंख्या नियंत्रण के अन्य उपाय

  • आयु की एक निश्चित अवधि में मनुष्य की प्रजनन दर अधिक होती है। यदि विवाह की आयु में वृद्धि की जाए तो बच्चों की जन्म दर को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा लोगों के अधिक बच्चों को जन्म देने के दृष्टिकोण को परिवर्तित करना।
  • भारतीय समाज में किसी भी दंपत्ति के लिये संतान प्राप्ति आवश्यक समझा जाता है तथा इसके बिना दंपत्ति को हेय दृष्टि से देखा जाता है, यदि इस सोच में बदलाव किया जाता है तो यह जनसंख्या में कमी करने में सहायक होगा।

आगे की राह

  • जनसंख्या वृद्धि ने कई चुनौतियों को जन्म दिया है किंतु इसके नियंत्रण के लिये क़ानूनी तरीका एक उपयुक्त कदम नहीं माना जा सकता। भारत की स्थिति चीन से पृथक है तथा चीन के विपरीत भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर किसी को अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में निर्णय लेने का अधिकार है।
  • भारत में कानून का सहारा लेने के बजाय जागरूकता अभियान, शिक्षा के स्तर को बढ़ाकर तथा गरीबी को समाप्त करने जैसे उपाय अपनाकर जनसंख्या नियंत्रण के लिये प्रयास करना चाहिये।
  • परिवार नियोजन से जुड़े परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये तथा ऐसे परिवार जिन्होंने परिवार नियोजन को नहीं अपनाया है उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से परिवार नियोजन हेतु प्रेरित करना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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