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सत्यता और हेट स्पीच

  • 10 Dec 2020
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतंत्र अभिव्यक्ति ( Free Speech ) की सीमाओं और हेट स्पीच पर चर्चा करते हुए कहा गया है कि “ ऐतिहासिक सत्यता (Historical Truths) का वर्णन समाज के विभिन्न वर्गों या समुदायों के मध्य बिना किसी घृणा या शत्रुता का खुलासा किये या प्रोत्साहन के किया जाना चाहिये।"

  • एक न्यूज़ शो में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती पर की गई कथित टिप्पणी के लिये टीवी एंकर के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी।

प्रमुख बिंदु 

‘सत्य तथ्यों' पर:

  • सर्वोच्च न्यायालय ने सत्यता या सत्य तथ्यों के बारे में विस्तार से बताते हुए तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष फैसला सुनाते हुए के.ए. अब्बास बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस 1970 का उल्लेख किया, जो कि सेंसरशिप से संबंधित था। 
    • न्यायालय के निर्णय में कहा गया है कि ऐतिहासिक मूल्य के संदर्भ में नरसंहार या रक्तपात को दिखाने पर कोई रोक नहीं है लेकिन इस प्रकार  के दृश्यों को तभी दिखाया जा सकता है यदि टकराव के दृश्यों को एक कलात्मक चित्रण के हिस्से के रूप में व्यवस्थित किया जा सके।
  • संभाव्यता का मूल्यांकन एक स्वस्थ और उचित मानक के आधार पर किया जाना चाहिये जिससे इस स्थिति को स्वीकार किया जा सके कि ऐतिहासिक सत्य  प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण कारक हो सकता है।
    • हालांँकि निश्चित रूप से ऐतिहासिक तथ्यों को इस प्रकार चित्रित किया जाना चाहिये जिससे वह विभिन्न वर्गों या समुदायों के मध्य ईर्ष्या, द्वेष अथवा शत्रुता को प्रोत्साहित न करे।
  • न्यायालय द्वारा अब्राहिम सुलेमान सैत बनाम एम.सी. मोहम्मद और अन्य मामले में वर्ष 1980 में दिये गए निर्णय को भी संदर्भित किया गया।
    • न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय के अनुसार, सत्य बोलना जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 123 (3A) के तहत भ्रष्ट आचरण के आरोप का प्रत्युत्तर नहीं है।
    • प्रासंगिकता केवल इस तथ्य की थी कि क्या अभिव्यक्ति ने शत्रुता या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा दिया था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हाशियाकरण:

  • सत्यता और लोकप्रिय विश्वास या मत  के मध्य विचलन देखने को मिल सकता है। पीठ द्वारा कहा गया कि कई मायनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने उन लोगों को सशक्त बनाया है जो हाशिये पर थे तथा भेदभाव का सामना कर रहे थे। अत: यह कहना  पूरी तरह से गलत होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अभिजात वर्ग की अवधारणा एवं पहचान है ।

हेट स्पीच: 

  • हेट स्पीच का कोई उद्धारक उद्देश्य नहीं होता जिसका अर्थ है कि 'यह मुख्य रूप से एक विशेष समूह के प्रति घृणा के अलावा और कोई अर्थ नहीं रखता।’
    • यह आवश्यक रूप से व्यक्तिपरक है और वक्ता की ओर से सद्भाव तथा अच्छे उद्देश्य का परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
  • हेट स्पीच की मर्यादा के संदर्भ में न्यायालय ने  कहा कि किसी के द्वारा भी जाति, धर्म, पंथ या क्षेत्रीय आधार पर भेदभाव के प्रसार की निंदा और जाँच की जा सकती है।
  • न्यायालय के अनुसार,  हेट स्पीच के अपराधीकरण का उद्देश्य गरिमा की रक्षा करना और जाति, पंथ, धर्म, लिंग, लैंगिक पहचान, यौन अभिविन्यास, भाषायी वरीयता आदि की परवाह किये बिना विभिन्न तत्त्वों और समूहों के मध्य राजनीतिक एवं सामाजिक समानता सुनिश्चित करना है।
    • भारत में हेट स्पीच को किसी भी कानून के तहत परिभाषित नहीं किया गया है। हालांँकि कुछ विधानों में किये गए विधिक प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपवाद के रूप में अभिव्यक्ति के चुनिंदा रूपों को प्रतिबंधित करते हैं।

स्व-विनियमन:

  • हर किसी को घृणित और अनुचित व्यवहार के खिलाफ सामाजिक सद्भाव और सहिष्णुता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कार्य करना चाहिये जिसे आत्म-संयम, संस्थागत जाँच और सुधार, साथ ही स्व-विनियमन या वैधानिक नियमों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

राजनीतिक अभियक्ति:

  • लोकतंत्र के संरक्षण और संवर्द्धन के लिये सरकार की नीतियों से संबंधित राजनीतिक अभिव्यक्ति को अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
    • खंडपीठ द्वारा दिये गए निर्णय के अनुसार, चुनी हुई सरकार की नीतियों  पर असहमति और उसकी आलोचना नैतिक रूप से गलत या भ्रामक पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
    • सरकार को क्या सही है या गलत, क्या अच्छा है या बुरा, क्या वैध है या अवैध, इन सभी पहलुओं से बचना चाहिये क्योंकि इन पहलुओं को सार्वजनिक चर्चा के लिये  छोड़ देना चाहिये।

आशय और उद्देश्य:

  • न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यह प्रभावशाली व्यक्ति या आम जन धर्म, जाति, पंथ इत्यादि से संबंधित विवादास्पद और संवेदनशील विषयों के बारे में चर्चा करते हैं या अभिव्यक्ति करते हैं तो उन्हें धमकियों और अभियोजन/मुकद्दमों के खतरे से डरना नहीं चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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