भारतीय राजव्यवस्था
वन अधिकार अधिनियम के खिलाफ जनजातियों का विरोध प्रदर्शन
- 18 Feb 2026
- 101 min read
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: वन अधिकार अधिनियम (FRA), PESA अधिनियम, अनुसूचित क्षेत्र, व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), न्यूनतम समर्थन मूल्य
मुख्य परीक्षा के लिये: वन अधिकार अधिनियम (FRA) के कार्यान्वयन में कमियाँ, जनजातीय भूमि अधिकार, केंद्र-राज्य शासन संबंधी मुद्दे, वनवासियों की आजीविका की सुरक्षा, संरक्षण बनाम अधिकार संबंधी वार्त्ता
चर्चा में क्यों?
हाल ही में महाराष्ट्र में जनजातीय किसानों ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के प्रभावी कार्यान्वयन, भूमि के पट्टों, सिंचाई, रोज़गार और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर 'लंबी पदयात्रा' निकाली।
सारांश
- महाराष्ट्र में जनजातीय विरोध प्रदर्शन वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लागू करने में लगातार हो रही विफलताओं को रेखांकित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिकार असुरक्षित हैं और आजीविका अनिश्चित बनी हुई है।
- खंडित भूमि रिकॉर्ड, वन अधिकार दावों का बड़े पैमाने पर खारिज होना और सीमांत ग्रामसभा जैसे संरचनात्मक मुद्दे सहभागी वन शासन को कमज़ोर करना जारी रखते हैं।
- कृषि संकट, अपर्याप्त सिंचाई, MSP कवरेज की कमी और रोज़गार एवं शिक्षा में अंतराल ने जनजातीय समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक सुभेद्यता को और बढ़ा दिया है।
- यह आंदोलन अधिकार-आधारित और आजीविका-केंद्रित शासन दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देता है, जो संरक्षण के उद्देश्यों को सामुदायिक भागीदारी और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ संतुलित करता हो।
वनों में रहने वाले समुदायों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
- औपनिवेशिक काल से पूर्व: उपनिवेशवाद से पहले स्थानीय समुदायों के पास अपने क्षेत्र या उससे भी विस्तृत क्षेत्र के वनों पर पारंपरिक अधिकार थे। भले ही राजा या सरदार विशिष्ट वनों में शिकार के अधिकारों का दावा करते थे, फिर भी स्थानीय समुदायों की वनों से मिलने वाले अन्य सभी लाभों तक पहुँच बनी रहती थी।
- औपनिवेशिक काल: औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय वन अधिनियम, 1878 पेश किया, जो 'सर्वोपरि अधिकार' के विचार पर आधारित था (जिसका अर्थ है कि शासक का सदैव सभी संपत्ति पर स्वामित्व होता है)।
- इमारती लकड़ी और राजस्व को अधिकतम करने के लिये वनों की कटाई और उनके स्वरूप को परिवर्तित करने हेतु इंपीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना की गई थी।
- इसका कार्य 'राज्य' की संपत्ति को स्थानीय समुदायों से बचाना भी था, जिन्हें अब 'अतिक्रमणकारी' माना जाने लगा।
- इस औपनिवेशिक वन नीति द्वारा थोपे गए अतिक्रमण के कई रूप थे:
- वनों को अब मुख्य रूप से इमारती लकड़ी के संसाधन के रूप में देखा जाने लगा था, इसलिये झूम कृषि पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- कृषि भूमियों का तथाकथित सर्वेक्षण और अधिवास अपूर्ण था और पूर्ण रूप से राज्य (सरकार) के पक्ष में केंद्रित था।
- वानिकी कार्यों के लिये श्रम सुनिश्चित करने हेतु 'वन ग्राम' बनाए गए, जहाँ परिवारों (मुख्यतः जनजातियों) को अनिवार्य श्रम (जो वास्तव में बँधुआ मज़दूरी थी) के बदले कृषि के लिये वन भूमि पट्टे पर दी गई थी।
- चूँकि वन अब राज्य की संपत्ति थे, इसलिये वनोपज तक सीमित पहुँच अस्थायी और सशुल्क कर दी गई। यह पूरी तरह से पुलिस शक्तियों से लैस वन नौकरशाही की दया पर निर्भर था।
- स्थानीय आजीविका की ज़रूरतों के लिये दी गई किसी भी छूट को 'विशेषाधिकार' कहा गया, जिसे किसी भी समय वापस लिया जा सकता था।
- जहाँ‑जहाँ वन तक पहुँच की अनुमति भी दी जाती थी, वहाँ भी स्थानीय समुदाय को वन प्रबंधन का कोई अधिकार नहीं था, क्योंकि राज्य की ओर से मूल्यवान वनों की कटाई की जाती थी और अधिक उपयोग किये जाने वाले वनों को व्यवहारतः खुली पहुँच वाला क्षेत्र बना दिया जाता था।
- इमारती लकड़ी और राजस्व को अधिकतम करने के लिये वनों की कटाई और उनके स्वरूप को परिवर्तित करने हेतु इंपीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना की गई थी।
- स्वतंत्रता के बाद का युग:
- आज़ादी के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। जब सरकार ने रियासतों और ज़मींदारी संपदाओं को जल्दबाजी में संघ में शामिल किया, तो वहाँ के निवासियों की जाँच किये बिना ही उनके वन क्षेत्रों को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया।
- जो लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, वे अचानक ‘अतिक्रमणकारी’ घोषित कर दिये गए।
- बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से सरकार ने 'अधिक भोजन उगाओ' जैसे विभिन्न अभियानों के तहत वन भूमि को पट्टे पर दिया। हालाँकि, इन पट्टों का उचित विनियमन कभी नहीं किया गया।
- बांधों के कारण विस्थापित हुए लोगों को वैकल्पिक भूमि प्रदान नहीं की गई, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने अंततः अन्यत्र वन भूमि पर 'अतिक्रमण' कर लिया।
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (FCA), ये दोनों ही मान्यता प्राप्त डोमेन के ढाँचे के भीतर परिकल्पित किये गए थे।
- अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान स्थापित करने के लिये कई समुदायों को जबरन विस्थापित किया गया था।
- विकास परियोजनाओं हेतु वनों के उपयोग के दौरान स्थानीय निवासियों के विचारों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। पर्याप्त शुल्क वसूलने के बावजूद उनके जीवन पर पड़े नकारात्मक प्रभावों के लिये उन्हें उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया।
- कृषि योग्य वन भूमि को लंबे समय तक मान्यता न मिलने के कारण आदिवासी समुदायों द्वारा बार-बार बड़े पैमाने पर लामबंदी और लंबी पदयात्राएँ की गई हैं।
- आज़ादी के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। जब सरकार ने रियासतों और ज़मींदारी संपदाओं को जल्दबाजी में संघ में शामिल किया, तो वहाँ के निवासियों की जाँच किये बिना ही उनके वन क्षेत्रों को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 क्या है और इसके प्रावधान क्या हैं?
- मान्यता: यह अधिनियम उन वनवासी अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वनवासियों (ओटीएफडी) को वन भूमि में वन अधिकार एवं कब्ज़े की मान्यता देता है और उन्हें यह अधिकार प्रदान करता है जो पीढ़ियों से ऐसे जंगलों में निवास कर रहे हैं।
- पात्रता: वन अधिकारों का दावा कोई भी सदस्य या समुदाय कर सकता है जो 13 दिसंबर, 2005 से पहले कम-से-कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) तक वास्तविक आजीविका आवश्यकताओं के लिये मुख्य रूप से वन भूमि में निवास करता रहा हो।
- संरक्षण: यह पहल वनों के संरक्षण तंत्र को सुदृढ़ करती है, जिसके परिणामस्वरूप वन आश्रित समुदायों (FDST) और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (OTFD) के लिये आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- विकेंद्रीकरण: ग्राम सभा FDST और OTFD को दिये जाने वाले व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) या सामुदायिक वन अधिकार (CFR) या दोनों की प्रकृति और सीमा निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिये प्राधिकारी है।
- इस अधिनियम में चार प्रकार के अधिकारों की पहचान की गई है:
- स्वामित्व अधिकार: यह FDST (वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियाँ) और OTFD (अन्य पारंपरिक वनवासी) को उस भूमि पर स्वामित्व अधिकार प्रदान करता है जिस पर वे खेती करते हैं, जिसकी अधिकतम सीमा 4 हेक्टेयर है। यह स्वामित्व केवल उस भूमि पर लागू होगा जिस पर परिवार वास्तव में खेती कर रहा है और किसी भी नई भूमि का आवंटन नहीं किया जाएगा।
- उपयोग के अधिकार: वन निवासियों को लघु वन उपज (MFP) इकट्ठा करने, चरागाह भूमि का उपयोग करने और पशुचारण मार्गों तक पहुँचने का कानूनी अधिकार है।
- राहत एवं विकास संबंधी अधिकार: अवैध बेदखली या जबरन विस्थापन की स्थिति में नागरिकों को पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्राप्त है, हालाँकि यह अधिकार वन संरक्षण संबंधी प्रतिबंधों के अधीन होगा।
- वन प्रबंधन अधिकार: इसमें किसी भी सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण या प्रबंधन का अधिकार शामिल है, जिसे वे पारंपरिक रूप से सतत उपयोग के लिये संरक्षित और सुरक्षित करते आ रहे हैं।
वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन में क्या-क्या समस्याएँ हैं?
- व्यक्तिगत अधिकार बनाम सामुदायिक अधिकार: कुछ राज्यों में राजनेताओं द्वारा व्यक्तिगत अधिकारों को प्रमुखता दिये जाने के कारण वन अधिकार अधिनियम (FRA) का स्वरूप बदलकर मात्र 'अतिक्रमण नियमितीकरण' योजना जैसा हो गया है। इस दृष्टिकोण से सामुदायिक अधिकारों की अनदेखी हुई है, जबकि ये अधिकार सतत वन प्रबंधन के लिये अपरिहार्य हैं।
- व्यक्तिगत वन अधिकारों (IFR) की अपर्याप्त मान्यता: व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता में बाधाएँ हैं। यह प्रक्रिया असंगत तरीके से संचालित की गई है, जो अक्सर वन विभाग के प्रतिरोध, अन्य विभागों की उदासीनता और प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग से प्रभावित होती है।
- कुछ क्षेत्रों में कथित तौर पर 45% से अधिक दावों को खारिज कर दिया गया है और स्वीकृत किये गए कई दावों में वास्तव में खेती की गई भूमि की तुलना में छोटे भूमि क्षेत्र दिये गए हैं।
- संचार का अभाव वाले क्षेत्रों में डिजिटल प्रक्रियाएँ: संचार का अभाव और निम्न साक्षरता दर वाले क्षेत्रों में डिजिटल प्रक्रियाएँ, जैसे– मध्य प्रदेश में वनमित्र सॉफ्टवेयर को लागू करने में चुनौतियाँ आई हैं। इन चुनौतियों के कारण मौजूदा अन्याय और बढ़ जाता है, जिससे दावों को प्रभावी ढंग से दर्ज करने और संसाधित करने में बाधा आती है।
- सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) की अपूर्ण मान्यता: वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लागू करने में एक बड़ी कमी सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) की धीमी और अपूर्ण मान्यता है। वन नौकरशाही इन अधिकारों को पहचानने में प्रतिरोध दिखाती है। यह प्रतिरोध स्थानीय समुदायों को उनके वनों के प्रबंधन में सशक्त बनाने की प्रक्रिया में बाधा डालता है तथा CFR के पूर्ण लाभ को प्राप्त होने से रोकता है।
- वन ग्रामों की अनदेखी: अधिकांश राज्यों में ‘वन ग्रामों’ से संबंधित समस्याओं को पर्याप्त रूप से हल नहीं किया गया है, जो व्यापक और समग्र कार्यान्वयन की कमी को दर्शाता है।
- वन अधिकार अधिनियम और PESA के तहत वैधानिक अधिकारों के बावजूद ग्राम सभाओं को दावे की सत्यापन तथा अनुमोदन प्रक्रिया में अक्सर हाशिये पर रखा जाता है।
FRA के कार्यान्वयन में समस्याओं को दूर करने के लिये आवश्यक कदम क्या हैं?
- ग्राम सभा का सशक्तीकरण: सुनिश्चित कीजिये कि ग्राम सभा, जो गाँवों में स्थानीय स्वशासन का प्रतिनिधित्व करती है, वन प्रबंधन से संबंधित निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले।
- समावेशी निर्णय निर्माण: यह सुनिश्चित करने के लिये कि अधिकारधारियों के दृष्टिकोण और आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
- जवाबदेही उपाय: FRA के किसी भी उल्लंघन या अनुपालन न करने की स्थिति में जवाबदेही उपाय लागू करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि ज़िम्मेदार प्राधिकरणों को जवाबदेह ठहराया जाए।
- एकीकृत योजना: ऐसी एकीकृत योजनाएँ विकसित कीजिये जो वनों के विकास और संरक्षण दोनों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखें, साथ ही वनवासियों के अधिकारों तथा हितों का सम्मान करें।
- PESA के कार्यान्वयन को मज़बूत करना: अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी आत्म-शासन को सुदृढ़ करें और शिक्षित आदिवासी युवाओं के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ाएँ।
- जीविकोपार्जन सहायता को भूमि अधिकारों से जोड़ना: सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिये सिंचाई, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक पहुँच और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के समर्थन को वन अधिकारों की मान्यता के साथ एकीकृत करें।
- समन्वय आधारित विकास योजना: आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकारों की मान्यता को कृषि, जल प्रबंधन और शिक्षा संबंधित पहलों के साथ जोड़ें।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र में आदिवासी प्रदर्शन यह दर्शाते हैं कि अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि प्रशासन, कल्याण सेवाओं की आपूर्ति और अधिकारों की मान्यता में गंभीर कमज़ोरियाँ हैं। वन अधिकार अधिनियम का कमज़ोर क्रियान्वयन, जीविकोपार्जन की असुरक्षा तथा प्रशासनिक अड़चनें आदिवासी संकट को बनाए रखती हैं। इसके समाधान के लिये एक ऐसा अधिकार-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है, जो संरक्षण एवं समुदाय की भागीदारी के बीच संतुलन बनाए, भूमि अभिलेखों को सही करे व स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करे।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. वन अधिकार अधिनियम (FRA) में कार्यान्वयन की कमियाँ आदिवासी जीवन यापन और भागीदारी पर आधारित वन शासन दोनों को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। महाराष्ट्र में हालिया विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. वन अधिकार अधिनियम, 2006 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वनवासियों को कानूनी वन भूमि अधिकार प्रदान करना, जो पीढ़ियों से वन में रह रहे हैं।
2. FRA के तहत अधिकार कौन दावा कर सकता है?
वन क्षेत्र में कम-से-कम तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) से रहने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी, जो 13 दिसंबर, 2005 से पहले से निवास कर रहे हों।
3. FRA में ग्राम सभा की भूमिका क्या है?
ग्राम सभा दावों की पुष्टि करती है और व्यक्तिगत तथा सामुदायिक वन अधिकारों की प्रकृति व सीमा तय करती है।
4. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत कौन-कौन से अधिकार मान्यता प्राप्त हैं?
शीर्षक अधिकार, उपयोग अधिकार, राहत और विकास संबंधी अधिकार, वन प्रबंधन अधिकार।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये कौन-सा मंत्रालय नोडल एजेंसी है?
(a) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
(b) पंचायती राज मंत्रालय
(c) ग्रामीण विकास मंत्रालय
(d) जनजातीय मामलों का मंत्रालय
उत्तर: (d)
प्रश्न. भारत के संविधान की किस अनुसूची के अधीन जनजातीय भूमि का खनन के लिये निजी पक्षकारों को अंतरण अकृत और शून्य घोषित किया जा सकता है? (2019)
(a) तीसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) नौवीं अनुसूची
(d) बारहवीं अनुसूची
उत्तर: (b)
प्रश्न. यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र को भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अधीन लाया जाए, तो निम्नलिखित कथनों में कौन-सा एक इसके परिणाम को सर्वोत्तम रूप से दर्शाता है? (2022)
(a) इससे जनजातीय लोगों की ज़मीनें गैर-जनजातीय लोगों को अंतरित करने पर रोक लगेगी।
(b) इससे उस क्षेत्र में एक स्थानीय स्वशासी निकाय का सृजन होगा।
(c) इससे वह क्षेत्र संघ राज्य क्षेत्र में बदल जाएगा।
(d) ऐसे क्षेत्रों वाले राज्य को विशेष श्रेणी का राज्य घोषित किया जाएगा।
उत्तर: (a)
प्रश्न. स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के प्रति भेदभाव को दूर करने के लिये राज्य द्वारा की गई दो प्रमुख विधिक पहलें क्या हैं? (मुख्य परीक्षा- 2017)