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शासन व्यवस्था

COVID-19 के विषय में स्वतंत्र चर्चा का अधिकार

  • 01 Apr 2020
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये 

COVID-19

मेन्स के लिये

न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय के प्रभाव, फेक न्यूज़ का महामारी पर प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कोरोनावायरस (COVID-19) के विषय में स्वतंत्र चर्चा के अधिकार को सही ठहराते हुए मुख्यधारा की मीडिया को निर्देश दिया है कि समाज में बड़े पैमाने पर घबराहट फैलाने से बचने के लिये इस विषय पर केवल आधिकारिक सूचना को ही प्रकाशित एवं प्रसारित किया जाए।

प्रमुख बिंदु

  • न्यायालय ने सरकार को आगामी 24 घंटों में मीडिया के सभी माध्यमों से कोरोनावायरस (COVID-19) के संदर्भ में हो रहे विकास पर एक दैनिक बुलेटिन शुरू करने का आदेश दिया।
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अगुवाई वाली एक न्यायपीठ ने केंद्र सरकार के अनुरोध पर निर्णय दिया है, ध्यातव्य है कि केंद्र सरकार ने अपने अनुरोध में कहा था कि मीडिया संस्थानों को ‘न्याय के हित’ में सटीक तथ्यों का पता लगाने के पश्चात् ही कोरोनावायरस (COVID-19) पर कुछ भी प्रकाशित या प्रसारित करना चाहिये। 
    • इस संदर्भ में गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, मीडिया विशेष रूप से वेब पोर्टल द्वारा प्रकाशित और प्रसारित किसी भी गलत सूचना में आम जनमानस में घबराहट पैदा करने की क्षमता है।
    • मंत्रालय के अनुसार, इस तरह की रिपोर्टिंग के आधार पर एक मौजूदा संकट की स्थिति में किसी भी तरह की घबराहट की प्रतिक्रिया संपूर्ण राष्ट्र को नुकसान पहुँचा सकती है। 
    • उल्लेखनीय है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत इस प्रकार का आतंक पैदा करना एक प्रकार का आपराधिक कृत्य है।
  • विश्लेषकों के अनुसार, न्यायालय ने अपने निर्णय से पत्रकारिता की स्वतंत्रता और स्थिति के दौरान समाज में घबराहट से बचने की आवश्यकता दोनों में संतुलित स्थापित किया है।

फेक न्यूज़ और COVID-19

  • फेक न्यूज़ को आप एक विशाल वट-वृक्ष मान सकते हैं, जिसकी कई शाखाएँ और उपशाखाएँ हैं। इसके तहत किसी के पक्ष में प्रचार करना व झूठी खबर फैलाने जैसे कृत्य आते हैं। 
    • किसी व्यक्ति या संस्था की छवि को नुकसान पहुँचाने या लोगों को उसके खिलाफ झूठी खबर के ज़रिये भड़काने की कोशिश करना फेक न्यूज़ है।
  • जान-बूझकर या अनजाने में फेक न्यूज़ और जनता के मन में आतंक पैदा करने में सक्षम सामग्री को कोरोनावायरस के मौजूदा संकट के प्रबंधन में एक बड़ी बाधा के रूप में देखा जा रहा है।
  • सोशल मीडिया पर कोरोनावायरस को लेकर कई प्रकार की झूठी खबरें चल रहीं हैं, जिनसे न केवल आम लोगों में भ्रम पैदा हो रहा है, बल्कि कोरोनावायरस महामारी के विरुद्ध चल रही लड़ाई भी कमज़ोर हो रही है।
  • गृह मंत्रालय के अनुसार, इस प्रकार की झूठी खबरें गरीबों के मध्य भय पैदा कर रहा है और उन्हें सामूहिक पलायन करने को मज़बूर कर रहा है, जिसके कारण सरकार द्वारा उठाए जा रहे निवारक उपाय विफल हो रहे हैं। 

COVID-19 की मौजूदा स्थिति

  • कोरोनावायरस मौजूदा समय में विश्व के समक्ष एक गंभीर चुनौती बन गया है और दुनिया भर में इसके कारण अब तक 42000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और तकरीबन 800000 लोग इसकी चपेट में हैं। 
  • भारत में भी स्थिति काफी गंभीर है और इस खतरनाक वायरस के कारण अब तक देश में 35 लोगों की मृत्यु हो चुकी है तथा देश में 1300 से अधिक लोग इसकी चपेट में हैं। 
  • भारत सरकार द्वारा कोरोनावायरस के प्रसार को रोकने के लिये कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, ध्यातव्य है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में 21 दिवसीय लॉकडाउन की घोषणा की थी।
  • इसके अलावा गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा 21,064 राहत शिविर बनाए गए हैं और लगभग 6,66,291 लोगों को शरण दी गई है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, हवाई अड्डों पर 15.25 लाख यात्रियों की जाँच की गई, 12 प्रमुख बंदरगाहों पर 40,000 लोगों की जाँच की गई और भूमि सीमाओं पर 20 लाख लोगों की जाँच की गई है।

स्रोत: द हिंदू

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