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भारतीय राजनीति

न्यायाधिकरणों की दयनीय स्थिति

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  • 07 Aug 2021
  • 5 min read

प्रिलिम्स के लिये

न्यायाधिकरण और संबंधित प्रावधान

मेन्स के लिये

न्यायाधिकरणों से संबंधित मुद्दे 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने केंद्र सरकार के खिलाफ नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए प्रश्न किया कि क्या सरकार वर्षों से लंबित रिक्तियों को न भरकर देश भर के न्यायाधिकरणों को ‘निष्क्रिय’ करने का विचार कर रही है।

Metropolitan-Level

प्रमुख बिंदु

न्यायाधिकरणों के विषय में

  • न्यायाधिकरण या ट्रिब्यूनल एक अर्द्ध-न्यायिक संस्था है, जिसे प्रशासनिक या कर संबंधी विवादों को सुलझाने के लिये स्थापित किया जाता है।
  • यह कई कार्य करता है, जिसमें विवादों का निपटान, चुनाव लड़ने वाले पक्षों के बीच अधिकारों का निर्धारण करना, प्रशासनिक निर्णय लेना, मौजूदा प्रशासनिक निर्णय की समीक्षा करना आदि शामिल हैं।
  • न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे, इन्हें 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भारतीय संविधान में शामिल किया गया था।
    • अनुच्छेद 323A प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित है।
    • अनुच्छेद 323-B अन्य मामलों के लिये न्यायाधिकरणों से संबंधित है।
  • ट्रिब्यूनल की स्थापना न्यायालयों के कार्यभार को कम करने और निर्णयों में तेज़ी लाने के लिये की गई थी, जिसे ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आने वाले वकीलों और विशेषज्ञों द्वारा संचालित किया जाएगा।

ट्रिब्यूनल से संबंधित मुद्दे: 

  • स्थायी रिक्तियाँ: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विभिन्न न्यायाधिकरणों में देश भर में 20 पीठासीन अधिकारियों, 110 न्यायिक सदस्यों और 111 तकनीकी सदस्यों की रिक्तियाँ लंबित थीं।
  • सिफारिशों की अनदेखी: रिक्तियों को भरने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के मौज़ूदा न्यायाधीशों के नेतृत्व वाली चयन समितियों द्वारा की गई नामों की सिफारिशों को सरकार ने काफी हद तक नज़रअंदाज कर दिया है।
  • लोगों को न्याय प्राप्त करने के अधिकार से वंचित करना: न्यायालय ने कहा कि न्यायाधिकरण निष्क्रिय हैं तथा उच्च न्यायालयों के पास न्यायाधिकरणों द्वारा संचालित कानून के क्षेत्रों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, याचिकाकर्त्ताओं को न्याय के लिये भटकना पड़ता है।
  • गैर-एकरूपता की समस्या: अधिकरणों में सेवा शर्तों, सदस्यों के कार्यकाल, विभिन्न न्यायाधिकरणों के प्रभारी नोडल मंत्रालयों के संबंध में गैर-एकरूपता की समस्या बनी हुई है।
    • ये कारक अधिकरणों के प्रबंधन और प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालिया विकास की पहलें:

  • ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स (रेशनलाइज़ेशन एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) बिल, 2021 लोकसभा में पेश किया गया है।
  • यह बिल कुछ मौजूदा अपीलीय निकायों को भंग करता है और उनके कार्यों को अन्य मौजूदा न्यायिक निकायों को स्थानांतरित करता है।
  • एक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि चार वर्ष होगी, जो अध्यक्ष के लिये सत्तर वर्ष और अन्य सदस्यों के लिये 70 वर्ष की ऊपरी आयु सीमा के अधीन होगी।
  • यह विधेयक निर्दिष्ट करता है कि अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिये पात्र व्यक्ति की आयु कम-से-कम 50 वर्ष होनी चाहिये।

आगे की राह:

  • भारत में न्यायाधिकरण प्रणाली में सुधार किया जाना सदियों पुरानी समस्या का समाधान करने की कुंजी हो सकती है जो अभी भी भारतीय न्यायिक प्रणाली को अपंग बनाती है - न्यायिक देरी और बैकलॉग की समस्या।
  • अधिकरणों की स्वतंत्रता से समझौता किये बिना उनके मामलों को विनियमित करने हेतु राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC) की स्थापना की गई है।

स्रोत-द हिंदू

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