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जैव विविधता और पर्यावरण

डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर

  • 11 Aug 2023
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

निम्न-कार्बन विद्युत संसाधन, डीकार्बोनाइज़ेशन, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, दुर्लभ मृदा तत्त्व, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962

मेन्स के लिये:

डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर

चर्चा में क्यों?

सौर और पवन ऊर्जा में वृद्धि के बावजूद कोयले की खपत में वृद्धि गहन डीकार्बोनाइज़ेशन सुनिश्चित करने के लिये छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसे निम्न कार्बन विद्युत संसाधनों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

  • समय और लागत में वृद्धि पारंपरिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से संबंधित एक समस्या रही है। इसके विकल्प के रूप में कई देश पारंपरिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के पूरक के लिये छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर(अधिकतम 300 मेगावाट क्षमता वाले परमाणु रिएक्टर) विकसित करने पर विचार कर रहे हैं।

डीकार्बोनाइज़ेशन:

  • परिचय:
    • डीकार्बोनाइज़ेशन से आशय मानव गतिविधियों, विशेष रूप से कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने की प्रक्रिया से है।
  • आवश्यकता:
    • डीकार्बोनाइज़ेशन का वैश्विक प्रयास संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य 7 के अनुरूप है, जो सस्ती और धारणीय ऊर्जा तक पहुँच पर बल देता है।
    • हालाँकि विश्व के ऊर्जा आपूर्ति का 82% हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर पर निर्भर करता है, यह देखते हुए विद्युत क्षेत्र में तत्काल डीकार्बोनाइज़ेशन काफी आवश्यक हो गया है।
    • सौर और पवन ऊर्जा में वृद्धि के बावजूद यूरोप में कोयले की खपत में वृद्धि गहन डीकार्बोनाइज़ेशन, ग्रिड स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये निम्न कार्बन विद्युत संसाधनों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
  • डीकार्बोनाइज़ेशन की चुनौतियाँ:
    • स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण चुनौतियाँ: कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव, वैश्विक स्तर पर एक जटिल चुनौती बनी हुई है। विभिन्न देश इस बात से सहमत हैं कि केवल सौर और पवन ऊर्जा पर निर्भर रहना सभी के लिये विश्वसनीय एवं किफायती ऊर्जा तक पहुँच के लिये पर्याप्त नहीं होगा।
      • नवीकरणीय ऊर्जा वाली डीकार्बोनाइज़्ड विद्युत् प्रणालियों में कम-से-कम एक स्थिर विद्युत् स्रोत शामिल करने से ग्रिड/ढाँचे की विश्वसनीयता बढ़ती है तथा व्यय भी कम होता है, जो संतुलित ऊर्जा मिश्रण में योगदान प्रदान करता है।
    • महत्त्वपूर्ण खनिजों की मांग और जटिलताएँ: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वर्ष 2030 तक लिथियम, निकल, कोबाल्ट एवं दुर्लभ मृदा तत्त्वों जैसे महत्त्वपूर्ण खनिजों की मांग में संभावित 3.5 गुना वृद्धि का अनुमान लगाया है, जो स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिये आवश्यक हैं।
      • हालाँकि यह मांग वृद्धि कई वैश्विक मुद्दों को उठाती है, जिसमें नवीन खदानों और प्रसंस्करण सुविधाओं को विकसित करने के लिये बड़े पूंजी निवेश भी शामिल हैं।
    • खनिज आपूर्ति शृंखला: चीन, इंडोनेशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे देशों के तीव्र विकास, खनिज निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण क्षमताओं ने पर्यावरणीय तथा सामाजिक भू-राजनीति में आपूर्ति जोखिम को प्रदर्शित किया है।
      • इसके कारण सतत् स्वच्छ ऊर्जा की उन्नति के लिये इन चुनौतियों का समाधान करना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR):

  • परिचय:
    • SMR उन्नत परमाणु रिएक्टर होते हैं जिनकी विद्युत क्षमता 300 मेगावाट (e) प्रति यूनिट तक होती है, जो पारंपरिक परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों की उत्पादन क्षमता का लगभग एक-तिहाई है।
    • SMR बड़ी मात्रा में न्यून कार्बन वाली विद्युत का उत्पादन कर सकते हैं, जो इस प्रकार है:
      • स्मॉल: भौतिक रूप से यह पारंपरिक परमाणु ऊर्जा रिएक्टर की तुलना में बहुत छोटे होते हैं।
      • मॉड्यूलर: सिस्टम और घटकों को फैक्टरी में असेंबल करना और स्थापना के लिये एक इकाई के रूप में किसी स्थान पर ले जाना संभव बनाना।
      • रिएक्टर: ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु ऊष्मा पैदा करने के लिये परमाणु विखंडन का उपयोग करना।
    • इनके डिज़ाइन में उन्नत सुरक्षा सुविधाएँ शामिल हैं, जो अनियंत्रित रेडियोधर्मी सामग्री के निकलने के जोखिम को कम करती हैं।
      • SMR को 90% से अधिक क्षमता कारकों के साथ 40-60 वर्षों तक संचालित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

  • लाभ:
    • विश्वसनीय निम्न-कार्बन विद्युत स्रोत:
      • जैसा कि वर्ष 2050 तक विद्युत की मांग 80-150% तक बढ़ने का अनुमान है, SMR एक विश्वसनीय 24/7 कम कार्बन विद्युत स्रोत प्रदान कर सकता है जो आंतरायिक नवीकरण का पूरक है।
      • ग्रिड की विश्वसनीयता हासिल करने और डीकार्बोनाइज़्ड बिजली प्रणालियों में लागत को कम करने के लिये यह महत्त्वपूर्ण है।
    • भूमि अधिग्रहण के लिये कम चुनौतियाँ:
      • SMR कम खर्च वाला परमाणु ईंधन उत्पन्न करते हैं और इन्हें मौजूदा ब्राउनफील्ड साइट्स पर सुरक्षित रूप से संचालित किया जा सकता है, जिससे भूमि अधिग्रहण की चुनौतियाँ कम हो जाती हैं।
      • SMR को डिज़ाइन करना और निर्माण करना भी आसान है तथा क्रमिक विनिर्माण के माध्यम से लागत में कमी की संभावना है।
    • महत्त्वपूर्ण खनिजों के विकल्प:
      • स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तन के लिये लिथियम-आयन बैटरी जैसी प्रौद्योगिकियों हेतु महत्त्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता होती है, जो भू-राजनीतिक जोखिमों और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंता पैदा करते हैं।
      • SMR एक विकल्प प्रदान करते हैं क्योंकि उन्हें कम-संवर्द्धित यूरेनियम की आवश्यकता होती है, जो महत्त्वपूर्ण खनिजों की तुलना में अधिक व्यापक रूप से वितरित है।
    • भारत की ऊर्जा रणनीति के साथ एकीकरण:
      • भारत जिसका लक्ष्य वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन हासिल करना है, के लिये SMR एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चूँकि कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट और परिवर्तनीय नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत ऊर्जा मिश्रण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, SMR ऊर्जा सुरक्षा तथा ग्रिड स्थिरता को बढ़ा सकते हैं।
        • भारत का केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority) विद्युत की मांग को पूरा करने में SMR को एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के रूप में देखता है, जबकि सार्वजनिक-निजी भागीदारी सहित निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिये महत्त्वपूर्ण है।

डीकार्बोनाइज़ेशन के लिये कम कार्बन वाले विद्युत संसाधनों को बढ़ावा देना:

  • यदि SMR को विद्युत क्षेत्र को डीकार्बोनाइज़िंग करने में सार्थक भूमिका निभानी है तो नागरिक उड्डयन क्षेत्र की तुलना में एक कुशल नियामक व्यवस्था (जिसमें अधिक कठोर सुरक्षा आवश्यक है) होना आवश्यक है।
  • इस उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है यदि परमाणु ऊर्जा स्वीकार करने वाले सभी देश अपने संबंधित नियामकों को आपस में और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (International Atomic Energy Agency- IAEA) के साथ सहयोग करने का निर्देश दें ताकि वे अपनी नियामक आवश्यकताओं को सुसंगत बना सकें तथा मानक, सार्वभौमिक डिज़ाइन के आधार पर SMR के लिये वैधानिक अनुमोदन में तेज़ी ला सकें।
  • SMR तैनाती को सुविधाजनक बनाने के लिये भारत को निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देने के लिये परमाणु ऊर्जा अधिनियम (Atomic Energy Act), 1962 में संशोधन करने की आवश्यकता है।
  • परमाणु ईंधन और अपशिष्ट पर सरकारी नियंत्रण बनाए रखते हुए एक स्वतंत्र नियामक बोर्ड को पूरे परमाणु ऊर्जा चक्र की निगरानी करनी चाहिये।
  • भारत-अमेरिका '123 समझौता' (India-US '123 Agreement') भारत को IAEA सुरक्षा उपायों के तहत SMR से उपयोग किये गए ईंधन को पुन: संसाधित करने का अवसर प्रदान करता है, जो संसाधन स्थिरता में योगदान देगा।
    • यह भारत को IAEA के सुरक्षा उपायों के तहत SMR से उपयोग किये गए ईंधन को पुन: संसाधित करने की सुविधा स्थापित करने की भी अनुमति देता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. एक नाभिकीय रिएक्टर में भारी जल का क्या कार्य होता है? (2011)

(a) न्यूट्रॉन की गति को कम करना
(b) न्यूट्रॉन की गति को बढ़ाना
(c) रिएक्टर को ठंडा करना
(d) नाभिकीय क्रिया को रोकना

उत्तर: (a)


मेन्स:

प्रश्न. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भय की विवेचना कीजिये। (2018)

स्रोत: द हिंदू

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