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भारतीय अर्थव्यवस्था

शून्य अभियान: नीति आयोग

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  • 16 Sep 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इलेक्ट्रिक वाहन,  नीति आयोग

मेन्स के लिये:

इलेक्ट्रिक वाहनों की आवश्यकता, महत्त्व और चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में नीति आयोग और रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट (RMI) तथा आरएमआई इंडिया द्वारा शून्य अभियान शुरू किया गया है।

  • यह उपभोक्ताओं और उद्योग के एक साथ मिलकर शून्य-प्रदूषण वितरण वाहनों (Zero-Pollution Delivery Vehicles) को बढ़ावा देने की एक पहल है।
  • वर्ष 1982 में स्थापित RMI एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी संगठन है।

प्रमुख बिंदु

  • शून्य अभियान:
    • इलेक्ट्रिक वाहनों की डिलीवरी: शहरी क्षेत्र में डिलीवरी के मामले में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने में तेज़ी लाना और शून्य-प्रदूषण वाहनों की डिलीवरी से होने वाले लाभों के बारे में उपभोक्ताओं के मध्य जागरूकता पैदा करना है।
    • शून्य ब्रांड: इस अभियान के हिस्से के रूप में फाइनल माइल की डिलीवरी के लिये इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाने की दिशा में उद्योग जगत के प्रयासों को मान्यता प्रदान करने और उन्हें बढ़ावा देने हेतु कॉर्पोरेट ब्रांडिंग एवं प्रमाणन संबंधी एक कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। 
      • यह ई-कॉमर्स कंपनियों को अपने प्रतिस्पर्द्धियों से अलग करने में मदद करेगा।
    • ऑनलाइन ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म: एक ऑनलाइन ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रिक वाहनों के संदर्भ में विद्युतीकृत किलोमीटर, कार्बन संबंधी बचत, मानक प्रदूषक संबंधी बचत और स्वच्छ डिलीवरी वाहनों से होने वाले अन्य लाभों से जुड़े आंकड़ों के माध्यम से इस अभियान के प्रभावों को साझा करेगा।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की आवश्यकता और महत्त्व: 
    • तेज़ी से बढ़ता ई-कॉमर्स बाज़ार: वर्ष 2013 और वर्ष 2017 के बीच भारत का ऑनलाइन खुदरा बाज़ार प्रतिवर्ष औसतन 53% की दर से बढ़ा एवं वर्ष 2022 तक इसके 150 बिलियन डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।
      • माल के अंतिम-परिवहन को स्थानांतरित करके इसने वितरण वाहनों के बेड़े में नाटकीय रूप से विस्तार किया है।
    • उत्सर्जन में कमी: शहरी मालवाहक-वाहन भारत में माल परिवहन से संबंधित CO2 उत्सर्जन के 10% हिस्से के लिये उत्तरदायी हैं और वर्ष 2030 तक इसके उत्सर्जन में 114% की बढ़ोतरी की आशंका है।
      • इलेक्ट्रिक वाहनों से उत्सर्जन काफी कम होता है, जो बेहतर वायु गुणवत्ता हेतु महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं।
      • यहाँ तक ​​कि अपने निर्माण के समय भी वे आंतरिक दहन इंजन समकक्षों की तुलना में 15-40% कम उत्सर्जन करते हैं और उनकी परिचालन लागत भी कम होती है।
    • ऊर्जा सुरक्षा: इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से भारत को ऊर्जा की कमी की चुनौती को हल करने और ऊर्जा के नवीकरणीय एवं स्वच्छ स्रोतों की ओर बढ़ने के साथ-साथ तेल निर्भरता को कम करने में मदद मिलेगी।
  • चुनौतियाँ:
    • तकनीकी: भारत में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन में तकनीकी रूप से कमी है जो ईवी उद्योग की रीढ़ है, जैसे- बैटरी, अर्द्धचालक, नियंत्रक आदि।
    • ढाँचागत समर्थन: एसी बनाम डीसी चार्जिंग स्टेशनों पर स्पष्टता की कमी, ग्रिड स्थिरता और रेंज संबंधी चिंता (यह डर कि बैटरी जल्द ही डिस्चार्ज जाएगी) अन्य कारक हैं जो ईवी उद्योग के विकास में बाधा डालते हैं।
    • घरेलू उत्पादन के लिये सामग्री की उपलब्धता: बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहनों का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक है। भारत में लिथियम और कोबाल्ट का कोई ज्ञात भंडार नहीं है जो बैटरी उत्पादन के लिये आवश्यक है।
      • भारत लिथियम आयन बैटरी के आयात के लिये जापान और चीन जैसे देशों पर निर्भर है।
    • कुशल कामगारों की कमी: इलेक्ट्रिक वाहनों की सर्विसिंग लागत अधिक होती है और साथ ही सर्विसिंग के लिये उच्च स्तर के कौशल की आवश्यकता होती है। भारत में ऐसे कौशल विकास के लिये समर्पित प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का अभाव है।
  • की गई पहलें: 
    • राष्ट्रीय विद्युत गतिशीलता मिशन योजना (NEMMP): NEMMP को देश में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय ईंधन सुरक्षा हासिल करने के उद्देश्य से वर्ष 2013 में शुरू किया गया था।
    • फेम योजना: भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों (Faster Adoption and Manufacturing of Hybrid and Electric Vehicles-FAME) को तेज़ी से अपनाने और योजना के तहत इनके निर्माण को गति प्रदान की है, साथ ही प्रोत्साहन प्रदान करती है ताकि वर्ष 2030 तक 30% इलेक्ट्रिक वाहनों के संचालन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।
    • परिवर्तनकारी गतिशीलता एवं बैटरी भंडारण पर राष्ट्रीय मिशन: मिशन इलेक्ट्रिक वाहनों के घटकों और बैटरी के लिये परिवर्तनकारी गतिशीलता एवं चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रमों हेतु रणनीतियों की सिफारिश और संचालन करेगा।
    • वित्तीय प्रोत्साहन: इलेक्ट्रिक वाहनों और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के उत्पादन एवं खपत को बढ़ावा देने हेतु प्रोत्साहन जैसे कि आयकर छूट, सीमा शुल्क से छूट आदि।

स्रोत: पीआईबी

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