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निवारक निरोध पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

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  • 04 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

निवारक निरोध, सर्वोच्च न्यायालय 

मेन्स के लिये:

निवारक निरोध से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने फैसला सुनाया कि एक निवारक निरोध आदेश केवल तभी पारित किया जा सकता है जब बंदी के कारण सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना हो।

  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों और अन्य अदालतों को निवारक नज़रबंदी के तहत नज़रबंदी से निपटने के लिये भी निर्देश दिया।

प्रमुख बिंदु:

  • सार्वजनिक व्यवस्था के लिये निवारक निरोध: अदालत ने माना कि यह विवादित नहीं हो सकता है कि डिटेनू एक 'सफेदपोश अपराधी' हो सकता है और यदि उसे मुक्त कर दिया जाता है, तो भोले-भाले व्यक्तियों को धोखा देना जारी रखेगा।
    • हालाँकि निवारक निरोध आदेश केवल तभी पारित किया जा सकता है जब उसकी गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं या प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने की संभावना है।
  • 'सार्वजनिक आदेश' शब्द पर स्पष्टता: निवारक निरोध केवल सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिये एक आवश्यक बुराई है, लेकिन निवारक निरोध कानून के संदर्भ में सार्वजनिक व्यवस्था की स्थिति में इसे अभिव्यक्ति से जोड़कर उदार अर्थ में नहीं लिया जा सकता है।
    • कानून का उल्लंघन, जैसे- धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात में शामिल होना, निश्चित रूप से 'कानून और व्यवस्था' को प्रभावित करता है।
    • हालाँकि जब यह समुदाय या जनता को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है तभी इसे 'सार्वजनिक व्यवस्था' को प्रभावित करना कहा जा सकता है।
  • सरकार को निर्देश: राज्य को उन सभी एवं विविध "कानून और व्यवस्था" संबंधी समस्याओं से निपटने के लिये मनमाने ढंग से "निवारक निरोध" का सहारा नहीं लेना चाहिये, जिनसे देश के सामान्य कानूनों द्वारा निपटा जा सकता है।
  • न्यायालयों को निर्देश: निवारक निरोध के तहत वैधता तय करने हेतु अदालतों से प्रश्न पूछा जाना चाहिये:
    • क्या देश का सामान्य कानून स्थिति से निपटने के लिये पर्याप्त था? यदि उत्तर सकारात्मक है, तो निरोध आदेश अवैध होगा।
    • उदाहरण के लिये सड़क पर लड़ रहे दो शराबियों के मामले में अदालत कहती है कि यह कानून और व्यवस्था की समस्या थी, न कि 'सार्वजनिक अव्यवस्था' का तो  यहाँ समाधान निवारक निरोध नहीं है।
  • निवारक निरोध स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है: एक नागरिक की स्वतंत्रता उसका  सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है जिसे हमारे पूर्वजों ने लंबे समय से ऐतिहासिक और कठिन संघर्षों के बाद जीता है।
    • यदि निवारक निरोध की शक्ति को एक सीमा तक सीमित नहीं किया जाता है, तो स्वतंत्रता का अधिकार निरर्थक हो जाएगा यानी उसका कोई मूल्य या महत्त्व नहीं रह जाएगा।
    • इसलिये निवारक निरोध अनुच्छेद 21 (कानून की उचित प्रक्रिया) के दायरे में आना चाहिये और इसे अनुच्छेद 22 (मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और निरोध के खिलाफ सुरक्षा) तथा विचाराधीन कानून के साथ पढ़ा जाना चाहिये।

व्हाइट कॉलर क्राइम बनाम ब्लू कॉलर क्राइम

  • व्हाइट कॉलर क्राइम: यह व्यक्तियों, व्यवसायों और सरकारी पेशेवरों द्वारा आर्थिक रूप से प्रेरित अहिंसक अपराध को दर्शाता है।
    • इन अपराधों में छल और विश्वास का उल्लंघन प्रमुख है।
    • व्हाइट कॉलर क्राइम के उदाहरणों में प्रतिभूति धोखाधड़ी, कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग, पिरामिड योजनाएँ आदि शामिल हैं।
    • इस प्रकार के अपराधों को शिक्षित और संपन्न लोगों से जोड़कर देखा जाता है।
    • यह शब्द पहली बार वर्ष 1949 में समाजशास्त्री एडविन सदरलैंड द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • ब्लू कॉलर क्राइम: ये अपराध मुख्य रूप से छोटे पैमाने पर होते हैं, जिसमें शामिल व्यक्ति या समूह को तत्काल लाभ होता है।
    • इसमें व्यक्तिगत अपराध भी शामिल हो सकते हैं जो तत्काल प्रतिक्रिया से प्रेरित हो सकते हैं, जैसे कि झगड़े या टकराव आदि।
    • इन अपराधों में नारकोटिक उत्पादन या वितरण, यौन हमला, चोरी, सेंधमारी, हत्या आदि को शामिल किया जा सकता है।

निवारक निरोध

संवैधानिक प्रावधान:

  • अनुच्छेद 22 गिरफ्तार या हिरासत (निरोध) में लिये गए व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करता है। निरोध दो प्रकार का होता है- दंडात्मक और निवारक।
    • दंडात्मक निरोध का आशय किसी व्यक्ति को उसके द्वारा किये गए अपराध के लिये अदालत में मुकदमे और दोषसिद्धि के बाद दंडित करने से है।
    • वहीं दूसरी ओर, निवारक निरोध का अर्थ किसी व्यक्ति को बिना किसी मुकदमे और अदालत द्वारा दोषसिद्धि के हिरासत में लेने से है।
  • अनुच्छेद 22 के दो भाग हैं- पहला भाग साधारण कानून के मामलों से संबंधित है और दूसरा भाग निवारक निरोध कानून के मामलों से संबंधित है। 

दंडात्मक निरोध के तहत दिये गए अधिकार

निवारक निरोध के तहत दिये गए अधिकार


  • गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित करने का अधिकार। 
  • किसी व्यक्ति की नज़रबंदी तीन महीने से अधिक नहीं हो सकती जब तक कि एक सलाहकार बोर्ड विस्तारित नज़रबंदी हेतु पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं करता है।
  • बोर्ड में एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • एक कानूनी व्यवसायी से परामर्श करने और बचाव करने का अधिकार।
  • नज़रबंदी के आधारों के बारे में नज़रबंद व्यक्ति को सूचित किया जाना चाहिये। 
  • तथापि जनहित के विरुद्ध माने जाने वाले तथ्यों को प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है।
  • यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का अधिकार।
  • बंदी को निरोध आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का अवसर दिया जाना चाहिये।
  • 24 घंटे के बाद रिहा होने का अधिकार जब तक कि मजिस्ट्रेट आगे की हिरासत के लिये  अधिकृत नहीं करता।
  • ये सुरक्षा उपाय किसी विदेशी शत्रु के लिये उपलब्ध नहीं हैं।
  • यह सुरक्षा नागरिकों के साथ-साथ बाह्य व्यक्ति दोनों के लिये उपलब्ध है।

नोट: वर्ष 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने एक सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किये बिना नज़रबंदी की अवधि को तीन से घटाकर दो महीने कर दिया है। हालाँकि यह प्रावधान अभी तक लागू नहीं किया गया है, इसलिये तीन महीने की मूल अवधि अभी भी जारी है।

संसद द्वारा बनाए गए निवारक निरोध कानून हैं:

भारत में निवारक निरोध कानूनों से संबंधित मुद्दे:

  • दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश ने निवारक निरोध को संविधान के अभिन्न अंग के रूप में नहीं अपनाया है जैसा कि भारत में किया गया है।
  • सरकारें कभी-कभी ऐसे कानूनों का उपयोग एक अतिरिक्त न्यायिक शक्ति के रूप में करती हैं। साथ ही इससे मनमानी गिरफ्तारी का भी भय बना रहता है।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस

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