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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सऊदी अरामको पर हवाई हमले के निहितार्थ

  • 18 Sep 2019
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको (Arabian American Oil Company-ARAMCO) पर ड्रोन से हवाई हमले हुए हैं, जिसके कारण अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ार काफी हद तक प्रभावित हुआ है।

प्रमुख बिंदु

  • हवाई हमलों से बुरी तरह प्रभावित सऊदी अरब के तेल उत्पादन में तकरीबन 5.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, जो कि सऊदी अरब के तेल उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा है।
  • सऊदी अरामको, सऊदी अरब में तेल उत्पादन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी है। आँकड़ों के अनुसार, बीते वर्ष सऊदी अरामको की कुल कमाई 111 बिलियन डॉलर थी।
    • ध्यातव्य है कि 1970 के दशक में सऊदी अरब की सरकार ने अरामको का राष्ट्रीकरण कर दिया था।

किसने किया है हमला?

  • अरामको पर हुए हवाई हमले की ज़िम्मेदारी यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) ने ली है, जो कि यमन की सरकार और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य बलों के विरुद्ध लड़ रहे हैं।
  • हूती विद्रोहियों के संबंध में सदैव ही ईरान पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने राजनीतिक हित को साधने के लिये हूती विद्रोहियों को सैन्य व मौद्रिक समर्थन प्रदान करता है, हालाँकि ईरान सदैव ही इन आरोपों से इनकार करता रहा है।
  • सऊदी अरब द्वारा की गई शुरुआती जाँच के अनुसार भी हमले के लिये जिन हथियारों का प्रयोग किया गया वे ईरान के थे।
  • वहीं अमेरिका भी इन हमलों के लिये ईरान को ही ज़िम्मेदार मानता है। शुरुआती जाँच के आधार पर अमेरिका का कहना है कि सऊदी अरामको पर जो हमले हुए हैं वे यमन की ओर से नहीं बल्कि इराक या ईरान की ओर से हुए हैं।

सऊदी अरामको पर हमले के वैश्विक मायने

  • इस हमले के प्रभाव से सऊदी अरब के तेल उत्पादन में 5.7 मिलियन बैरल की कमी आई है, जिसके कारण विश्व की तेल आपूर्ति पर काफी बुरा असर पड़ा है।
  • इस हमले के कारण विश्व भर के तेल भंडारों को लेकर भी चिंताएँ काफी बढ़ गई हैं।
  • यह हमला न केवल संपूर्ण क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करेगा, बल्कि अमेरिका और ईरान के मध्य तनाव में और अधिक वृद्धि करेगा।
  • वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में वृद्धि होगी जिससे उपभोक्ता लागत बढ़ जाएगी और विश्व की सभी बड़ी एवं तेल निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान होगा।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में तेल भंडार की खोज ने मध्य पूर्व से तेल पर निर्भरता को कम किया है, जिसके कारण “तेल संकट" की स्थिति को रोकने में मदद मिलेगी, यदि ऐसा नहीं होता तो परिस्थितियाँ काफी गंभीर रूप धारण कर सकती थीं।

भारत पर भी होगा प्रभाव

  • सऊदी अरामको पर हमला ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय अर्थव्यवस्था वित्तीय संकट का सामना कर रही है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में GDP वृद्धि दर 5 प्रतिशत पर आ गई है, जबकि बीते वित्तीय वर्ष की इसी तिमाही में यह दर 5.8 प्रतिशत थी।
  • भारत अपनी तेल संबंधी आवश्यकताओं का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अन्य देशों से आयात करता है एवं सऊदी अरब भारत के लिये दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि सऊदी अरब इतनी बड़ी मात्रा में तेल उत्पादन को कम कर देगा तो भारत पर इसका काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आँकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2017 से धीरे-धीरे भारत की तेल पर निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018-19 में भारत की तेल खपत बढ़कर 211.6 मिलियन टन हो गई थी।
  • वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत का राजकोषीय संतुलन भी बिगड़ सकता है।
  • केयर रेटिंग (Care Ratings) नामक रेटिंग एजेंसी ने अनुमान लगाया है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारत लगभग 1.6 बिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करने वाला है, अतः यदि कच्चे तेल के मूल्य में 1 डॉलर की भी वृद्धि होती है तो भारत को 1.6 बिलियन डॉलर अधिक चुकाने होंगे, जिसके कारण भारत के आयात बिल में काफी वृद्धि होगी।
  • कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि से न केवल भारत के आयात बिल में वृद्धि होगी, बल्कि भारतीय रुपए का अवमूल्यन भी होगा, क्योंकि जब तेल की कीमत में वृद्धि होगी तो भारत को तेल खरीदने के लिये और अधिक डॉलर की आवश्यकता होगी और भारत डॉलर की खरीद करेगा, जिससे डॉलर की अपेक्षा भारतीय रुपया कमज़ोर हो जाएगा।
  • भारत में घरेलू मांग पहले से ही काफी कम है और यदि कच्चे तेल की कीमतों में भी वृद्धि हो जाएगी तो मांग और अधिक उदासीन हो जाएगी, साथ ही इसका नकारात्मक प्रभाव भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी पड़ेगा, जो कि आर्थिक सुस्ती से काफी अधिक प्रभावित हुआ है।
  • यदि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होगी तो ज़ाहिर है कि ईंधन की कीमतों में भी वृद्धि होगी, और यदि ऐसा होता है तो इसका प्रतिकूल प्रभाव विनिर्माण एवं एविएशन सेक्टर पर भी देखने को मिलेगा।

क्या कर सकता है भारत

  • विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे स्थिति में भारत सरकार कुछ खास नहीं कर सकती है। यदि भविष्य में तेल का संकट गहराता है तो वह अपने तेल भंडार से आपूर्ति कर स्थिति को काबू में करने की कोशिश कर सकती है, परंतु भारत का तेल भंडार इतना नहीं है कि भारत सरकार लंबे समय तक इससे संतुलन बनाए रख पाएगी। स्थिति अगर और गंभीर होती है तो सरकार तेल पर कर की दर में कटौती भी कर सकती है, लेकिन इसका प्रत्यक्ष असर राजकोषीय घाटे पर दिखाई देगा।

निष्कर्ष

सऊदी अरामको पर हुआ ड्रोन हमला वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन गया है एवं यह भारत जैसे बड़े आयातकों के लिये भी गंभीर चिंता का विषय है। हालाँकि सऊदी अरब ने आश्वासन दिया है कि आपूर्ति में कोई कमी नहीं होगी, परंतु यदि बहाली की प्रक्रिया अनुमान से अधिक समय लेती है, तो भारत को अन्य विकल्पों की तलाश करनी होगी, ताकि देश में तेल संकट की स्थिति न पैदा हो और स्थिरता बरकरार रहे।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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