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जैवविविधता और पर्यावरण

भारत में रासायनिक आपदा और सुरक्षा उपाय

  • 08 May 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

स्टाइरीन, सार्वजनिक दायित्त्व बीमा अधिनियम, राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम

मेन्स के लिये:

रासायनिक आपदा प्रबंधन 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम से 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित 'एलजी पॉलिमर कारखाने' में ‘स्टाइरीन गैस’ (Styrene Gas) का रिसाव होने से कम-से-कम 11 लोगों की मौत हो गई।

प्रमुख बिंदु:

  • इस कारखाने की स्थापना वर्ष 1961 में की गई, जिसमें पॉलीस्टीरेन (Polystyrene) तथा प्लास्टिक यौगिकों का निर्माण किया जाता है।
  • इस दुर्घटना से कारखाने के आसपास के पाँच गाँवों के लगभग 2,000 से अधिक निवासी प्रभावित हुए हैं।

स्टाइरीन (Styrene):

  • यह एक ज्वलनशील तरल है, जिसका उपयोग पॉलीस्टीरिन प्लास्टिक, फाइबरग्लास, रबर और लैटेक्स के निर्माण में किया जाता है। 
  • ‘यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ द्वारा चलाई गई वेबसाइट ‘टॉक्स टाउन’ के अनुसार, स्टाइरीन वाहन तथा सिगरेट के धुएँ तथा फलों एवं सब्जियों जैसे प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में भी पाया जाता है।

स्टाइरीन के संपर्क में आने पर प्रभाव:

  • स्टाइलिन के अल्पकालिक संपर्क से श्वसन संबंधी समस्या, आंखों में जलन, श्लेष्मा झिल्ली में जलन और जठरांत्र संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
  • जबकि दीर्घकालिक संपर्क होने पर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो सकता है तथा कुछ मामलों में कैंसर भी हो सकता है।

प्रमुख लक्षण:

  • स्टाइरीन से उत्पन्न होने वाले लक्षणों में सिरदर्द होना, सुनने में कमी आना, थकान महसूस करना, कमज़ोरी महसूस करना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई आदि शामिल हैं।

रासायनिक आपदा (Chemical Disaster):

  • रासायनिक आपदा से तात्पर्य उन दुर्घटनाओं से है जब मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले खतरनाक रासायनिक पदार्थ का वातावरण में मुक्त हो जाए।

 रासायनिक आपदाओं के संभावित कारण:

  • प्रक्रिया और सुरक्षा प्रणालियों की विफलता;
    • मानवीय त्रुटियाँ
    • तकनीकी त्रुटियाँ 
    • प्रबंधन संबंधी त्रुटियाँ 
  • प्राकृतिक आपदा जनित दुर्घटना;
  • खतरनाक अपशिष्टों के परिवहन वाहनों का दुर्घटनाग्रस्त होना;
  • लोगों की अशांति के दौरान कारखानों में तोड़-फोड़; 

भोपाल गैस त्रासदी तक रासायनिक आपदा संबंधी कानून:

  • भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) के समय तक 'भारतीय दंड संहिता' (Indian Penal Code- IPC) रासायनिक घटनाओं के लिये ज़िम्मेदार लोगों की आपराधिक देयता को निर्दिष्ट करने वाला एकमात्र प्रासंगिक कानून था। रासायनिक आपदा संबंधित प्रावधानों को धारा 304A में शामिल किया गया।
    • यह धारा लापरवाही के कारण लोगों की मौत से संबंधित है तथा इस धारा के तहत अपराधी को अधिकतम दो वर्ष की सजा और जुर्माना लगाया जाता है।
  • वर्ष 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के बाद भोपाल गैस त्रासदी के आरोपों को पुन: निर्धारित किया गया। निर्णय के अनुसार, इस प्रकार बात के कोई प्रमाण नहीं है जो यह दिखा सके कि आरोपी को दुर्घटना का पूर्वानुमान था कि गैस रिसाव होगी।

भोपाल गैस त्रासदी के बाद के प्रमुख कानून:

  • भोपाल गैस त्रासदी के तुरंत बाद सरकार ने पर्यावरण को विनियमित करने तथा सुरक्षा उपायों एवं दंडों को निर्दिष्ट करने संबंधी कई कानूनों को पारित किया। इनमें से कुछ निम्नलिखित थे: 
  • भोपाल गैस रिसाव (दावों का निपटान) अधिनियम (Bhopal Gas Leak (Processing of Claims) Act)- 1985:
    • यह अधिनियम केंद्र सरकार को भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े या उससे जुड़े दावों को सुरक्षित रखने की शक्तियाँ प्रदान करता है। इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत ऐसे दावों का तेज़ी तथा न्यायसंगत तरीके से निपटान करने का प्रावधान किया गया।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (Environment Protection Act)- 1986:
    • यह अधिनियम केंद्र सरकार को औद्योगिक इकाइयों के लिये पर्यावरण सुधार के उपाय अपनाने, मानकों को निर्धारित करने तथा निरीक्षण करने की शक्तियाँ प्रदान करता है।
  • सार्वजनिक दायित्त्व बीमा अधिनियम (Public Liability Insurance Act)- 1991:
    • यह अधिनियम खतरनाक पदार्थों से निपटान के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं से प्रभावित व्यक्तियों को राहत प्रदान करने के लिये है।
  • राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम (National Environment Appellate Authority Act)- 1997:
    • इस अधिनियम के तहत राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (National Environment Appellate Authority- NEAA), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अपनाए गए सुरक्षा उपायों के अधीन उन क्षेत्रों में औद्योगिक कार्यों के प्रतिबंधों के बारे में अपील सुन सकता है।
  • ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) अधिनियम- 2010:
    • पर्यावरण संरक्षण और वनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिये एक NGT की स्थापना की गई, जो औद्योगिक गतिविधियों के संबंध में भी आवश्यक निर्देश देने का कार्य करता है।

भारत में रासायनिक आपदा की स्थिति:

  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority-NDMA) के अनुसार, हाल के दिनों में देश में 130 से अधिक प्रमुख रासायनिक दुर्घटनाएँ हुई हैं, जिसमें 259 लोगों की मौतें हुई हैं तथा 560 से अधिक लोगों को बहुत अधिक शारीरिक नुकसान हुआ है।
  • देश के 301 ज़िलों में फैली 1861 से अधिक प्रमुख रासायनिक खतरों वाली इकाइयाँ हैं। इसके अलावा हजारों पंजीकृत एवं खतरनाक कारखाने तथा असंगठित क्षेत्र हैं।

निष्कर्ष:

  • NDMA द्वारा जारी दिशा-निर्देश रासायनिक आपदाओं से निपटने हेतु विभिन्न स्तरों के कार्मिकों से सक्रिय, भागीदारी, बहुविषयक एवं बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाने की माँग करते हैं। अत: इस दिशा में NDMA के साथ-साथ राज्य सरकारों तथा सभी हितधारकों को मिलकर रासायनिक आपदा प्रबंधन की दिशा में कार्य करना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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