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साक्ष्य के तौर पर पेश हो सकती है संसदीय समिति की रिपोर्ट

  • 12 May 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों ?

  • प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने हाल ही में एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा है कि अदालतें संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट का संज्ञान ले सकती हैं| ये साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वीकार्य हैं|
  • न्यायालय ने साथ ही यह भी साफ कर दिया कि संसदीय समिति की रिपोर्ट के निष्कर्षों को न तो किसी अदालत में चुनौती दी जा सकती है और न ही उन पर सवाल उठाये जा सकते हैं|

महत्वपूर्ण बिंदु 

  • पीठ ने कहा, ‘किसी कानूनी प्रावधान की व्याख्या के लिये जरूरत पड़ने पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट की सहायता ली जा सकती है और ऐतिहासिक तथ्य के अस्तित्व के रूप में इसका संज्ञान लिया जा सकता है|
  • साक्ष्य अधिनियम की धारा 57(4) के तहत संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट का न्यायिक संज्ञान लिया जा सकता है और यह अधिनियम की धारा 74 के तहत स्वीकार्य है|
  • पीठ ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 136  के तहत दायर मुकदमे में यह अदालत संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट को रिकॉर्ड में ले सकती है| हालांकि, रिपोर्ट को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है|
  • संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं|

क्या था मामला?

  • सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला उन जनहित याचिकाओं पर सुनाया जिनमें आंध्र प्रदेश और गुजरात में 2008 में कुछ आदिवासी महिलाओं को कथित तौर पर सरवाइकल कैंसर के टीके(gardasil और cervarix) दिये जाने से उनकी असामयिक मृत्यु का मुद्दा उठाया गया था और उनके परिवारों को मुआवजा देने की मांग की गई थी|
  • याचिकाकर्ताओं ने पीड़ित परिवारों के लिये मुआवजे की मांग करते हुए संसद की स्थायी समिति की 22  दिसंबर, 2014  की 81 वीं रिपोर्ट पर भरोसा किया था|
  • रिपोर्ट में विवादास्पद ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) के टीके का परीक्षण करने के लिये कुछ दवा कंपनियों को कथित तौर पर दोषारोपित किया गया था|
  • इस रिपोर्ट में कहा गया था कि एचपीवी टीकों का प्रयोग “मेडिकल एथिक्स का गंभीर उल्लंघन है साथ ही मानवाधिकारों का भी स्पष्ट उल्लंघन है।
  • इसके बाद मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास इस बात का निर्धारण करने के लिये भेजा गया था कि क्या न्यायिक कार्यवाही के दौरान संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट पर भरोसा किया जा सकता है और क्या इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठाए जा सकते हैं|
  • मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए संविधान पीठ ने कहा कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार करना संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन नहीं है|
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