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मृत्युदंड प्रणाली में सुधार

  • 06 Apr 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

मृत्युदंड से संबंधित महत्त्वपूर्ण मामले, मृत्युदंड के प्रावधान, अनुच्छेद-21

मेन्स के लिये:

न्यायपालिका, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप, नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे, मृत्युदंड तथा इससे संबंधित तर्क।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) की एक बेंच मृत्युदंड से संबंधित प्रक्रियाओं की व्यापक जाँच करने हेतु सहमत हुई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जिन न्यायाधीशों को आजीवन कारावास और मृत्युदंड की सज़ा के बीच चयन करना है, उनके पास मामले से संबंधित व्यापक सूचना उपलब्ध हो।

  • इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड की सज़ा के मामलों में उपलब्ध सूचनाओं के न्यून आकलन की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई थी।
  • न्यायालय उन प्रक्रियाओं में सुधार करने की कवायद कर रही है, जिसके द्वारा मौत की सज़ा के मामले में आवश्यक जानकारी अदालतों के सामने लाई जाती है। ऐसा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय मृत्युदंड की प्रक्रिया में मौजूद चिंताओं को स्वीकार कर रहा है।
    • जबकि मृत्युदंड की सज़ा को संवैधानिक माना गया है, किंतु कई बार इसकी प्रकिया को अनुचित और मनमाने ढंग से लागू करने के आरोप लगाए जाते हैं।

मृत्युदंड का अर्थ:

  • मौत की सज़ा, जिसे मृत्युदंड भी कहा जाता है, किसी अपराधी को उसके आपराधिक कृत्य के लिये अदालत द्वारा मिलने वाला सर्वोच्च दंड है।
  • आमतौर पर यह सज़ा हत्या, बलात्कार, देशद्रोह आदि अत्यंत गंभीर मामलों में दी जाती है।
  • मृत्युदंड को सबसे खराब अपराधों के लिये सबसे उपयुक्त सज़ा एवं प्रभावी निवारक के रूप में देखा जाता है। 
  • हालाँकि इसका विरोध करने वाले इसे अमानवीय मानते हैं। इस प्रकार मौत की सज़ा की नैतिकता बहस का विषय है और दुनिया भर में कई मानवाधिकारवादी व समाजवादी लंबे समय से मौत की सज़ा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।

आजीवन कारावास और मृत्युदंड की सज़ा के बीच चयन:

  • मई 1980 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने बचन सिंह वाद में मौत की सज़ा की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, तो भविष्य के मामलों के लिये इस संबंध में एक फ्रेमवर्क विकसित किया गया था।
  • इस फ्रेमवर्क के केंद्र में यह धारणा थी कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता में विधायिका ने यह स्पष्ट कर दिया था कि आजीवन कारावास डिफ़ॉल्ट सज़ा होगी और न्यायाधीश एक विशेष उपकरण के तौर पर मृत्युदंड के प्रावधान का उपयोग करेंगे।
  • वर्ष 1980 में स्थापित इस फ्रेमवर्क- जिसे लोकप्रिय रूप से ‘दुर्लभ से दुर्लभ’ फ्रेमवर्क के रूप में जाना जाता है, के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को मृत्युदंड की सज़ा का निर्धारण करते समय गंभीर एवं शमन दोनों कारकों पर विचार करना चाहिये।
  • निर्णय ने यह भी स्पष्ट कि मृत्युदंड देने से पहले न्यायाधीशों को चाहिये की वे व्यक्ति की आजीवन कारावास की सज़ा को ‘निर्विवाद रूप से’ समाप्त करें।
    • यह उन कारकों की एक सांकेतिक सूची थी, जिनकी उपस्थिति निर्णय के प्रासंगिक होने हेतु आवश्यक थी, किंतु यह स्पष्ट था यह सूची पूर्णतः विस्तृत नहीं थी।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने बचन सिंह वाद में प्रस्तुत फ्रेमवर्क में मौजूद विसंगति पर बार-बार चिंता ज़ाहिर की है। भारतीय विधि आयोग (262वीं रिपोर्ट) ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की है।

मृत्युदंड के मामलों में लघुकरण:

  • किसी भी आपराधिक मुकदमे में दो चरण होते हैं- अपराध चरण और सज़ा देने का चरण।
    • अभियुक्त को अपराध का दोषी पाए जाने के बाद सज़ा सुनाई जाती है; यह वह चरण है जहाँ सज़ा निर्धारित की जाती है। इसलिये सज़ा सुनाए जाने के दौरान प्रस्तुत या कही गई किसी भी बात का उपयोग अपराध के निष्कर्ष को उलटने या बदलने के लिये नहीं किया जा सकता है।
  • यह आपराधिक कानून का एक मौलिक सिद्धांत है कि सज़ा देने का कार्य वैयक्तिक रूप से किया जाना चाहिये, यानी सज़ा निर्धारित करने की प्रक्रिया में न्यायाधीश को अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिये
  • लघुकरण, जिसे "लघुकरण कारक" या "लघुकरण साक्ष्य" के रूप में भी जाना जाता है, वह साक्ष्य (सूचना) है जिसे बचाव पक्ष द्वारा सज़ा दिये जाने के चरण में (उन मामलों में जहाँ मृत्युदंड दिया जा सकता है) प्रस्तुत किया जा सकता है, इस संदर्भ में कारण प्रस्तुत किये जाते हैं कि अभियुक्त को मृत्युदंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिये।
  • इन्हें एकत्र करने का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसके लिये वकीलों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, यही कारण है कि मृत्युदंड की सज़ा के बचाव हेतु नियुक्त वकील और उसके कार्यों  के लिये अमेरिकन बार एसोसिएशन के 2003 दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से परिभाषित भूमिका के साथ एक शमन विशेषज्ञ को मान्यता प्रदान करते हैं जो वकीलों द्वारा किये गये बचाव कार्यों से अलग है।
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सांता सिंह (1976) और मोहम्मद मन्नान (2019) के निर्णयों में इस तरह के अभ्यास की अंतःविषयक प्रकृति को मान्यता दी गई है तथा इस प्रकार की जानकारी एकत्र करने हेतु वकीलों के अलावा अन्य पेशेवरों की आवश्यकता होती है।

भारतीय संदर्भ में मृत्युदंड की स्थिति:

  • 1955 के आपराधिक प्रक्रिया (संशोधन) अधिनियम (Cr PC) से पहले भारत में मृत्युदंड नियम और आजीवन कारावास एक अपवाद था।
    • इसके अलावा न्यायालय मृत्युदंड के स्थान पर हल्का दंड देने हेतु स्पष्टीकरण देने को बाध्य था।
  • वर्ष 1955 के संशोधन के बाद न्यायालय मृत्युदंड या आजीवन कारावास देने के लिये स्वतंत्र था।
    • सीआरपीसी, 1973 की धारा 354 (3) के अनुसार, न्यायालयों को अधिकतम दंड देने हेतु लिखित में कारण बताना आवश्यक है।
    • वर्तमान में स्थिति इसके विपरीत है जिसमें गंभीर अपराध के लिये आजीवन कारावास की सज़ा एक नियम है और मृत्युदंड की सज़ा एक अपवाद।
    • इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र द्वारा मृत्युदंड के खिलाफ वैश्विक रोक के बावजूद भारत में मृत्युदंड की सज़ा बरकरार है।
    • भारत का दृष्टिकोण है कि निर्दयी, जान-बूझकर और नृशंस हत्या के दोषी अपराधियों को कम सज़ा देने से इस कानून की प्रभावशीलता कम हो जाएगी जिसका परिणाम न्याय का उपहास होगा।
  • इस संदर्भ में वर्ष 1967 की विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट में मृत्युदंड को समाप्त करने के प्रस्ताव को खारिज़ कर दिया गया था।
  • आधिकारिक आंँकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से 720 लोगों को फांँसी  हुई है जो कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा मौत की सज़ा पाने वाले लोगों का एक छोटा सा अंश है।
    • अधिकांश मामलों में मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था और कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों द्वारा बरी कर दिया गया था।

आगे की राह

  • एक ऐसी प्रणाली, जिससे व्यक्ति मृत्युदंड के अनुभव से गुज़रता है और अंततः कानूनी प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाता है, में अत्यधिक उच्च स्तर की निष्पक्षता होनी चाहिये। निष्पक्षता को प्रारंभिक बिंदु मानते हुए आपराधिक न्याय प्रणाली को ऐसे प्रयास करने की आवश्यकता है जो प्रक्रियात्मक निष्पक्षता हेतु एक प्रणाली का निर्माण सुनिश्चित करे।
  • एक तरफ मृत्युदंड में सुधार तो दूसरी तरफ इसे समाप्त करने की बात, ये दोनों ही रास्ते काफी दूर तक साथ जाते हैं। मृत्युदंड में सुधार की बात में संलग्न होने का प्रत्येक उदाहरण मृत्युदंड के उपयोग में अंतर्निहित अनुचितता पर प्रकाश डालता है, विशेष रूप से ऐसी प्रणाली में जिसका अनुसरण हम करते हैं।
  • भारत में मृत्युदंड की वर्तमान स्थिति काफी संतुलित है लेकिन न्यायालय के व्यापक न्यायिक विवेक के परिणामस्वरूप समान प्रकृति के मामलों में असमान निर्णय की स्थितियाँ भी देखी गई हैं; इस प्रकार की स्थिति भारतीय न्यायपालिका की अच्छी छवि का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
  • बचन सिंह या माछी सिंह जैसे मामलों में निर्धारित किये गए सिद्धांतों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिये ताकि समान प्रकृति के अपराध के लिये दोषी व्यक्ति को समान श्रेणी की सज़ा दी जा सके।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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