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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

व्यतिकारी राज्यक्षेत्र

  • 21 Jan 2020
  • 4 min read

प्रीलिम्स के लिये

व्यतिकारी राज्यक्षेत्र, वरीय न्यायालय

मेन्स के लिये

व्यतिकारी राज्यक्षेत्र तथा वरीय न्यायालय की अवधारणा का प्रभाव तथा महत्त्व

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विधि और न्याय मंत्रालय ने अधिसूचना ज़ारी कर संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates-UAE ) को भारत का व्यतिकारी राज्यक्षेत्र (Reciprocating Territory) घोषित कर दिया है।

प्रमुख बिंदु:

  • केंद्र सरकार ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 44 ‘क’ द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए संयुक्त अरब अमीरात को भारत का व्यतिकारी राज्यक्षेत्र घोषित करते हुए उसके कुछ प्रमुख न्यायालयों को ‘वरीय न्यायालय (Superior Courts)’ का दर्ज़ा दिया है।
  • संयुक्त अरब अमीरात के ‘वरीय न्यायालय’ का दर्ज़ा प्राप्त न्यायालय निम्नलिखित हैं-

1. फेडरल न्यायालय

  • फेडरल सुप्रीम कोर्ट,
  • अबुधाबी अमीरात, शारजाह, अजमान, उम एल कुवैन और फुज़ेरा में फर्स्ट और अपील कोर्ट,

2. स्थानीय न्यायालय

  • अबुधाबी जुडिशियल डिपार्टमेंट,
  • दुबई कोर्ट,
  • रस एल खैमाह जुडिशियल डिपार्टमेंट,
  • अबुधाबी ग्लोबल मार्केट कोर्ट,
  • दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर कोर्ट

संयुक्त अरब अमीरात के अतिरिक्त यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, बांग्लादेश, मलेशिया, त्रिनिनाद एवं टोबैगो, न्यूज़ीलैंड, कोक आइलैंड( नियु सहित), पश्चिम सामोआ के प्रादेशिक निक्षेप, हाँगकाँग, पापुआ न्यू गिनी, फिजी, अदन जैसे देशों को व्यतिकारी राज्यक्षेत्र का दर्ज़ा दिया गया है।

व्यतिकारी राज्यक्षेत्र का अर्थ

  • व्यतिकारी राज्यक्षेत्र भारत की सीमा के बाहर स्थित ऐसे देश या क्षेत्र हैं जिनके न्यायालयों के निर्णय भारत में तथा भारत के न्यायालयों के निर्णय उस देश या क्षेत्र में पारस्परिक रूप से लागू होते हैं।
  • इसका अर्थ यह हुआ कि संयुक्त अरब अमीरात के सूचीबद्ध न्यायालयों के निर्णय अब भारत में भी वैसे ही लागू होंगे जैसे भारत के स्थानीय अदालतों के निर्णय लागू होते हैं।
  • हालाँकि ये प्रावधान केवल दीवानी निर्णयों पर ही लागू होंगे।

धारा 44 ‘क’ के प्रावधान

  • धारा 44 ‘क’ का शीर्षक "व्यतिकारी क्षेत्र में न्यायालयों द्वारा दिये गए निर्णयों का निष्पादन" है।
  • विदेशी न्यायालयों के निर्णयों का साक्ष्यात्मक मूल्य भारतीय न्यायालयों में तब तक नहीं है जब तक कि उन्हें ऐसा क्षेत्र नहीं घोषित किया जाता है जो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 44 ‘क’ के तहत भारतीय न्यायालयों के निर्णयों को लागू करने की घोषणा करते हैं।

महत्त्व

  • ऐसा माना जाता है कि यह व्यवस्था दोनों देशों के बीच निर्णयों को लागू करने में लगने वाले समय को कम करने में सहायक होगी।
  • यह अधिसूचना संयुक्त अरब अमीरात और भारत के बीच नागरिक और वाणिज्यिक मामलों में सहयोग से संबंधित वर्ष 1999 के समझौते का एकमात्र शेष भाग था, जो अब प्रवर्तन में आ गया है।
  • भारत के न्यायालयों द्वारा दीवानी मामलों में दोष-सिद्ध व्यक्तियों को अब संयुक्त अरब अमीरात में सुरक्षित आश्रय स्थल प्राप्त नहीं हो पाएगा।

स्रोत: द हिंदू

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