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भारतीय राजनीति

राज्यसभा में ध्वनि मत और अविश्वास प्रस्ताव

  • 21 Sep 2020
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये 

उपसभापति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव, ध्वनि मत  

मेन्स के लिये 

ध्वनि मत का विरोध क्यों?

चर्चा में क्यों? 

कृषि क्षेत्र को उदार बनाने के उद्देश्य से लाये गए तीन कृषि संबंधी विधेयकों में से दो को राज्यसभा में 20 सितंबर को ध्वनि मत के साथ पारित कर दिया गया। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह द्वारा प्रस्तावों पर मतदान कराने से मना करने के पश्चात् विपक्षी दलों ने ज़ोरदार हंगामा किया। 

प्रमुख बिंदु 

  • कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्द्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 और ‘मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता विधेयक, 2020 को पिछले सप्ताह लोकसभा द्वारा स्वीकृति दे दी गई थी।
  • एक अभूतपूर्व कदम के रूप में राज्यसभा के उपसभापति को हटाने हेतु अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिये 12 विपक्षी दल एक साथ आए। कृषि विधेयकों पर अगले दिन चर्चा जारी रखने वाले विपक्ष के प्रस्ताव को खारिज़ करने और सत्र को 1 बजे से आगे बढ़ाने के उपसभापति के निर्णय को लेकर सदन में हंगामा किया गया।
  • इसकी प्रतिक्रियास्वरुप आज राज्यसभा के सभापति द्वारा 8 विपक्षी सांसदों को नियम-256 के तहत निलंबित कर दिया गया है।

उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव 

  • विपक्ष द्वारा उपसभापति के खिलाफ पेश किये गए अविश्वास प्रस्ताव में कहा गया है कि  उपसभापति ने कानून, संसदीय प्रक्रियाओं, परंपराओं और निष्पक्ष भूमिका के सभी नियमों का उल्लंघन किया है। उपसभापति ने कृषि विधेयकों का विरोध करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के राज्यसभा सदस्यों को अपने विचार अभिव्यक्त करने की अनुमति तक नहीं दी।  
  • विपक्षी दलों के सांसदों का कहना है कि उन्हें उपसभापति पर ‘कोई विश्वास नहीं है।’ इस अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों में कॉन्ग्रेस, ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (CPI-M), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), राष्ट्रीय जनता दल (RJD), आम आदमी पार्टी (AAP), तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS), समाजवादी पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग  (IUML) और केरल कॉन्ग्रेस (एम) थे।
  • नियमों के अनुसार, राज्य सभा के उपसभापति को राज्य सभा के कुल सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित कर अपने पद से हटाया जा सकता है, लेकिन चौदह दिनों के पूर्व-नोटिस के पश्चात् ही इस प्रकार के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जा सकता है।
  • प्रस्ताव में कहा गया है कि इस संबंध में कई उपयुक्त उदाहरण कई ग्रंथों, जैसे-  एम. एन. कौल और एस. एल. शकधर के ‘Practice and Procedure of Parliament’ के सातवें संस्करण और संविधान के अनुच्छेद-90 में शामिल है। अनुच्छेद-90 में उपसभापति के पद के रिक्त होने, पदत्‍याग और पद से हटाया जाने के बारे में उल्लेख किया गया है।  
  • विपक्ष द्वारा पुस्तक में उद्धृत कई पूर्व उदाहरणों को प्रस्तुत किया गया है, जैसे- वर्ष 1951 में प्रथम लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर, वर्ष 1966 में अध्यक्ष सरदार हुक्म सिंह और वर्ष 1987 में अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव आदि। इन तीनों प्रस्तावों को सदन द्वारा चर्चा के पश्चात् नकार दिया गया। 

ध्वनि मत (Voice vote)

  • राज्यसभा के कामकाज से संबंधित नियम- 252 से लेकर 254 तक में 'मत विभाजन' के चार अलग-अलग तरीकों का प्रावधान किया गया है। दो प्रक्रियाओं में सांसदों के मत दर्ज नहीं किये जाते, जबकि शेष दो तरीकों में सांसदों के मत राज्यसभा के रिकॉर्ड में स्थायी रूप से दर्ज किये जाते हैं। 
  • इन तरीकों में ध्वनि मत, काउंटिंग, ऑटोमैटिक वोट रिकॉर्डर के जरिये मत विभाजन और लॉबी में जाकर पक्ष/विपक्ष के समर्थन में खड़े होना सम्मिलित हैं।  
  • ध्वनि मत में सदन के अध्यक्ष/सभापति द्वारा सदन के समक्ष प्रश्न रखते हुए सदन के सदस्यों से ‘हाँ’ (Ayes) और ‘ना’ (Noes) के रूप में अपनी राय देने को कहा जाता है। 
  • ध्वनि के आधार पर बहुमत का निर्णय करते हुए अध्यक्ष/सभापति तय करते हैं कि प्रस्ताव पारित किया गया था या नहीं।

ध्वनि मत का विरोध क्यों?

  • आमतौर पर ध्वनि मत में कोई समस्या नहीं होती है, यदि वह सर्वसम्मति से अपनाया गया हो  और उस पर पूर्व में ही निर्णय ले लिया गया हो। उदाहरण के लिये यदि किसी विधेयक के लिये  भारी मात्रा में समर्थन है तो अध्यक्ष/सभापति केवल ध्वनि मत का उपयोग करके विधेयक को पारित करने की अनुमति दे सकते हैं।
  • इन कृषि विधेयकों के संदर्भ में यह स्थिति शायद ही लागू होती है। यह एक विवादास्पद तथा अत्यंत प्रतिक्रियात्मक मुद्दा है। यह करोड़ों भारतीयों की आजीविका से संबंधित है। वास्तव में यह इतना विवादास्पद रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के अपने सहयोगी अकाली दल ने इस पर स्वयं को सरकार से पृथक् कर लिया है।
  • भारतीय जनता पार्टी के पास राज्यसभा की केवल एक तिहाई के लगभग सीटें हैं। इसके अतिरिक्त विपक्ष के साथ-साथ भाजपा के सहयोगी दलों ने भी विधेयकों को लेकर संदेह जताया है। ऐसे में उपसभापति द्वारा इतने महत्त्वपूर्ण मामले को ध्वनि मत का उपयोग करके पारित करवाना सही कदम नहीं कहा जा सकता।
  • विपक्षी सांसदों का दावा है कि इतने हंगामे के बीच उपसभापति द्वारा यह पता लगाना असंभव है कि किसका बहुमत था। वास्तव में यह सदन की बजाये केवल उपसभापति की राय का ही प्रतिनिधित्व करता है।

आगे की राह 

  • संसदीय प्रक्रिया के अनुसार सर्वसम्मति नहीं होने पर ध्वनि मत का उपयोग नहीं किया जाना चाहिये। यदि किसी सदस्य द्वारा ध्वनि मत को चुनौती दी जाती है, तो अध्यक्ष/सभापति मत विभाजन के उपाय को अपनाना चाहिये।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू

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