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नि:शुल्क कानूनी सहायता की गुणवत्ता

  • 01 Jul 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली (The National Law University, Delhi (NLUD) ने 'कानूनी प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता: भारत में मुफ्त कानूनी सहायता सेवाओं का एक अनुभवजन्य विश्लेषण' (Quality of Legal Representation: An Empirical Analysis of Free Legal Aid Services in India) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है जिसके अनुसार, लोगों को मुफ्त विधिक सेवाओं पर विश्वास नहीं है।

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम

(Legal Service Authorities-LSA, Act)

  • वर्ष 1987 मे गरीबों को नि:शुल्क और सक्षम कानूनी सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (Legal Service Authorities Act-LSA Act) को लागू किया गया था।
  • इस अधिनियम ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (National Legal Service Authority-NALSA) तथा राज्य, ज़िला एवं तालुका स्तर पर अन्य कानूनी सेवा संस्थानों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
  • LSA अधिनियम के तहत दी जाने वाली नि:शुल्क कानूनी सेवाएँ अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति, बच्चों, महिलाओं, मानव तस्करी के शिकार लगों, औद्योगिक कामगारों, हिरासत में लिये गए व्यक्तियों और गरीबों के लिये उपलब्ध हैं।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल (Commonwealth Human Rights Initiative-CHRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति अधिवक्ता का अनुपात अन्य देशों के मुकाबले बेहतर है।
  • भारत में लगभग 1.8 मिलियन अधिवक्ता हैं यानी प्रत्येक 736 लोगों पर एक अधिवक्ता उपलब्ध हैं।
  • इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि देश में लगभग 61,593 अधिवक्ता पैनल हैं जिसका तात्पर्य यह है कि प्रति 18,609 की आबादी पर एक केवल एक विधिक सलाहकार या प्रति 1,00,000 की आबादी पर पाँच विधिक सलाहकार उपलब्ध हैं।
  • NALSA द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2017 से जून 2018 तक पूरे भारत में लगभग 8.22 लाख लोग विधिक सहायता सेवाओं के से लाभान्वित हुए।

मुख्य निष्कर्ष

  • अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, लगभग 75% लाभार्थियों ने मुफ्त कानूनी सहायता का विकल्प इसलिये चुना क्योंकि उनके पास निज़ी अधिवक्ता को नियुक्त करने हेतु पर्याप्त संसाधन नहीं थे, यदि उनके पास पर्याप्त संसाधन (पूंजी) उपलब्ध होते तो वे LSA की सहायता नहीं लेते एवं निज़ी अधिवक्ता ही नियुक्त करते।
  • 22.6% लाभार्थियों ने यह माना है कि वे दोबारा मुफ्त कानूनी सहायता सेवाओं का विकल्प नहीं चुनेंगे।
  • नि:शुल्क कानूनी सहायता सेवाओं से अवगत 60% महिलाओं ने निज़ी अधिवक्ता का चयन किया क्योंकि कानूनी सहायता प्रणाली के तहत दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर उनकी विश्वसनीयता कम थी एवं अपने निजी अधिवक्ता पर वे बेहतर नियंत्रण रख सकती थी।
  • 56% विधिक सेवा अधिवक्ता (Legal Aid Counsel- LAC) कानूनी सहायता के मामलों पर प्रति सप्ताह औसतन 1 से 10 घंटे का समय देते हैं। इसके विपरीत, लगभग 58% LAC निजी मामलों पर प्रति सप्ताह औसतन 20 घंटे या उससे अधिक समय व्यतीत करते हैं।
  • लगभग 33% न्यायिक अधिकारियों ने दावा किया है कि LAC के खिलाफ लाभार्थियों से पैसे मांगने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
  • अधिकांश न्यायिक अधिकारियों (52%) का मानना है कि LAC की तुलना में निज़ी अधिवक्ता ज़्यादा योग्य होते हैं।

संवैधानिक प्रावधान

  • संविधान के अनुच्छेद 39A में प्रावधान है कि- ‘राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि न्यायतंत्र इस प्रकार से काम करें कि सभी को न्याय का समान अवसर मिले एवं आर्थिक या किसी अन्य कारण से कोई नागरिक न्याय प्राप्ति से वंचित न रह जाए। इसके लिये राज्य निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।’
  • अनुच्छेद 14 और 22 (1) भी राज्य के लिये विधि के समक्ष समता सुनिश्चित करने का प्रावधान करते हैं जो सभी को न्याय के समान अवसर उपलब्ध कराने के आधार को बढ़ावा देता है।

NALSA द्वारा किये गए के प्रयास

  • कानूनी सहायता की इच्छा रखने वाले लोगों के लिये वन-स्टॉप सेंटर के रूप में ज़िला स्तर पर न्यायिक सहायता कार्यालयों को आधुनिक बनाना।
  • कानूनी सहायता प्राप्त मामलों के रिकॉर्ड को अद्यतन करना ताकि कानूनी सहायता प्राप्त करने वालों को उनके मामलों की प्रगति के बारे में बताया जा सके और मामलों की बेहतर निगरानी संभव हो सके।
  • NALSA के जागरूकता कार्यक्रमों (जैसे डोर-टू-डोर कैंपेन) ने लोगों को कानूनी सलाह और अन्य प्रकार की कानूनी सेवाओं जैसे अनुप्रयोगों के प्रारूपण आदि के बारे में जागरूक बनाया है।

आगे की राह

  • पूर्णकालिक मनोनयन: वर्तमान में LAC का अनुबंध आमतौर पर तदर्थ (Ad-Hoc) आधार पर होता है। ऐसे में लगभग 45% नियामकों का मानना है कि LAC को पूर्णकालिक बनाने से निश्चित रूप से उनकी प्रतिबद्धता के स्तर में सुधार होगा।
  • मानदेय: अध्ययन में यह भी कहा गया है कि निजी मामलों की तरह ही कानूनी सहायता प्राप्ति के मामले में मानदेय निर्धारित किया जाना चाहिये, इससे LAC सहायता प्राप्त मामलों से पीछे नहीं हटेंगे या ऐसे मामलों पर सहायता प्रदान करने से इनकार नहीं करेंगे।
  • पारिश्रमिक: मनोनीत अधिवक्ताओं का पारिश्रमिक प्रतिवर्ष बढ़ाया जाना चाहिये। यह उन अधिवक्ताओं के लिये महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा जो किशोर अपराध न्यायालयों (Juvenile Courts) में सेवारत हैं क्योंकि उन्हें अपनी निजी प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं है।

स्रोत: द हिंदू

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