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जैव विविधता और पर्यावरण

बोल्गार्ड-2 का पेटेंट ख़ारिज

  • 04 May 2018
  • 8 min read

चर्चा में क्यों ?
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा मोन्सेंटो के बोल्गार्ड-2 पेटेंट को रद्द करने का फैसला दिया गया जो समस्याजनक बताया जा रहा है।

क्या है बोल्गार्ड-2 ?

  • यह बी.टी. कपास (Bt Cotton) से संबंधित तकनीक है, जो किसानों को कीटनाशकों के कम प्रयोग के साथ वृहद् स्तर पर कीट नियंत्रण की सुविधा भी प्रदान कराती है।
  • बोल्गार्ड -2 एक कीटनाशक तकनीक है, जो मिट्टी के बैक्टीरिया बेसिलस थुरिनजेनेसिस (बीटी) से Cry2Ab नामक जीन का उपयोग करती है। 
  • इसके द्वारा जहाँ कृषक हानिकारक कीटों, जैसे- एफिड्स तथा माइट्स की संख्या पर प्रभावी नियंत्रण कर पाने में सक्षम होते हैं।
  • वहीं दूसरी ओर वे कृषि के लिये लाभप्रद कीटों की संख्या में अप्रत्यक्ष रूप से मात्रात्मक वृद्धि भी करवा सकते हैं।
  • इसका मतलब है कि कीट नियंत्रण लागत में कमी के साथ और बजटीय आवंटन में भी कमी होती है।
  • इस तकनीक का विकास ‘मोंसेंटों’ (Monsento) नाम की एक अमेरिकी मल्टीनेशनल एग्रोकेमिकल कंपनी ने किया है, जो ‘जेनेटिकली इंजीनियर्ड बीज’ (GE Seed) एवं ‘राउण्ड अप’ (‘ग्लायफोसेट’ आधारित शाकनाशक) के अग्रणी निर्माता के रूप में विख्यात है।

बीटी (BT) क्या है?

  • बेसिलस थुरिनजेनेसिस (Bacillus Thuringiensis-BT) एक जीवाणु है,जो प्राकृतिक रूप से क्रिस्टल प्रोटीन उत्पन्न करता है।
  • यह प्रोटीन कीटों के लिये हानिकारक होता है। इसके नाम पर ही बीटी फसलों का नाम रखा गया है।
  • बीटी फसलें ऐसी फसलें होती हैं, जो बेसिलस थुरिनजेनेसिस नामक जीवाणु के समान ही विषाक्त पदार्थ को उत्पन्न करती हैं ताकि फसल का कीटों से बचाव किया जा सके।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पेटेंट रद्द करने के कारण 

  • न्यायाधीश द्वारा तर्क दिया गया कि मोन्सेंटो के बीटी जीन कपास किसानों के लिये बेकार है क्योंकि कपास में जब तक हाइब्रिड जीनों का प्रयोग नहीं किया जाएगा तब तक डाले जाने से यह कीटों को दूर करने में सक्षम नहीं है।
  • साथ ही कपास पौधों का यह जीनी हेर-फेर एक पौधे की प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया को भी नष्ट करता है।
  • इस प्रकार इस विधि द्वारा पौधों के जैविक प्रक्रिया में अनपेक्षित दखलंदाजी की ज़रूरत होती है।
  • इस तर्क ने मोन्सेंटो के पेटेंट को कमज़ोर कर दिया, क्योंकि भारत के पेटेंट अधिनियम की धारा 3 (जे) के तहत, बीज या पौधे बनाने के लिये जैविक प्रक्रिया पेटेंट नहीं की जा सकती है।
  • हालाँकि यह तर्क सही है, किंतु इससे कुछ पौधों के लिये जैव प्रौद्योगिकी नवाचार भारत में पेटेंट योग्य होंगे।
  • इस आधार पर यह एक खतरनाक निष्कर्ष है, क्योंकि पेटेंट संरक्षण की कमी कृषि-बायोटेक उद्योग द्वारा महत्त्वपूर्ण शोध को हतोत्साहित करेगी।

जीएम तकनीक क्या है?

  • इसके लिये टिश्यू कल्चर, म्युटेशन यानी उत्परिवर्तन और नए सूक्ष्मजीवों की मदद से पौधों में नए जीनों का प्रवेश कराया जाता है।
  • इस तरह की एक बहुत ही सामान्य प्रक्रिया में पौधे को एग्रोबैक्टेरियम ट्यूमेफेशियंस
  • (Agrobacterium Tumefaciens) नामक सूक्ष्मजीव से सक्रंमित  कराया जाता है।
  • इस सूक्ष्मजीव को टी-डीएनए (Transfer-DNA) नामक एक विशिष्ट जीन  से सक्रंमित करके पौधे में डीएनए का प्रवेश कराया जाता है।
  • इस एग्रोबैक्टेरियम ट्यूमेफेशियंस के टी-डीएनए को वांछित जीन से सावधानीपूर्वक प्रतिस्थापित किया जाता है, जो कीट प्रतिरोधक होता है।
  • इस प्रकार पौधे के जीनोम में बदलाव लाकर मनचाहे गुणों की जीनांतरित फसल प्राप्त की जाती है।

जीएम (GM) फसल

  • जेनेटिक इजीनियरिंग के ज़रिये किसी भी जीव या पौधे के जीन को अन्य पौधों में डालकर एक नई फसल प्रजाति विकसित की जाती है।
  • जीएम फसल उन फसलों को कहा जाता है जिनके जीन को वैज्ञानिक तरीके से रूपांतरित किया जाता है।
  • 1982 में तंबाकू के पौधे में इसका पहला प्रयोग किया गया था, जबकि फ्राँस और अमेरिका में 1986 में पहली बार इसका फील्ड परीक्षण किया गया था।
  • जीएम फसलों के जीन में बायो-टेक्नोलॉजी और बायो-इंजीनियरिंग के द्वारा परिवर्तन किया जाता है।
  • इस प्रक्रिया में पौधे में नए जीन यानी डीएनए को डालकर उसमें ऐसे मनचाहे गुणों का समावेश किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से उस पौधे में नहीं होते।
  • इस तकनीक के ज़रिये तैयार किये गए पौधे कीटों, सूखे जैसी पर्यावरण परिस्थिति और बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी होते हैं।
  • जीनांतरित फसलों से उत्पादन क्षमता और पोषक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। 

जीएम बीजों के लाभ

  • जीएम बीज यानी कृत्रिम तरीके से बनाया गया फसल बीज। जीएम फसलों के समर्थक मानते हैं कि यह बीज साधारण बीज से कहीं अधिक उत्पादकता प्रदान करता है।
  • इससे कृषि क्षेत्र की कई समस्याएँ दूर हो जाएंगी और फसल उत्पादन का स्तर सुधरेगा।  जीएम फसलें सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी होने के साथ कीट प्रतिरोधी भी होती हैं।
  • जीएम फसलों की यह विशेषता होती है कि अधिक उर्वर होने के साथ ही इनमें अधिक कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती।

जीएम बीजों के नुकसान

  • भारत में इन फसलों का विरोध करने के कई कारण हैं।जीएम फसलों की लागत अधिक पड़ती है, क्योंकि इसके लिये हर बार नया बीज खरीदना पड़ता है।
  • बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण किसानों को महँगे बीज और कीटनाशक उनसे खरीदने पड़ते हैं।
  • इस समय हाइब्रिड बीजों पर ज़ोर दिया जा रहा है और अधिकांश हाइब्रिड बीज, चाहे जीएम हों अथवा नहीं, या तो दोबारा इस्तेमाल लायक नहीं होते; और अगर होते भी हैं तो पहली बार के बाद उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं होता।
  • इसे स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा जैव विविधता के लिये हानिकारक माना जाता है।  भारत में इस प्रौद्योगिकी का विरोध करने वालों का कहना है कि हमारे देश में कृषि में इतनी जैव-विविधता है, जो जीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने से खत्म हो जाएगी।
  • इसके अलावा इसका विरोध करने वाले कहते हैं कि जीएम खाद्य का मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है। एक तो उसे खाने से, दूसरा उन पशुओं के दूध और माँस के ज़रिये जो जीएम चारे पर पले हों।
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