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भारतीय अर्थव्यवस्था

सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम

  • 18 Dec 2021
  • 15 min read

प्रिलिम्स के लिये:

उत्पादन सह प्रोत्साहन, आत्मनिर्भरता, इलेक्ट्रॉनिक घटक और अर्द्धचालक/सेमीकंडक्टर्स, अर्द्धचालक तथा इनके उपयोग के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना।

मेन्स के लिये:

भारतीय अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टिंग डिवाइस का महत्त्व, इलेक्ट्रॉनिक और सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने की आवश्यकता, भारत को आत्मनिर्भर बनाने में इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की भूमिका।

चर्चा में क्यों?

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology- MeitY) ने देश में सेमीकंडक्टर्स/अर्द्धचालकों (Semiconductors) और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम (Display Manufacturing Ecosystems) के विकास के लिये एक व्यापक कार्यक्रम को मंज़ूरी दे दी है।

  • सरकार द्वारा अगले छह वर्षों में सेमीकंडक्टर्स और विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के विकास हेतु 76,000 करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि को मंज़ूरी प्रदान की गई है।

अर्द्धचालक/सेमीकंडक्टर

  • एक कंडक्टर (Conductor) और इन्सुलेटर (Insulator) के बीच विद्युत चालकता में मध्यवर्ती क्रिस्टलीय ठोस का कोई भी वर्ग।
  • अर्द्धचालकों का उपयोग डायोड, ट्रांजिस्टर और एकीकृत सर्किट सहित विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। इस तरह के उपकरणों को उनकी कॉम्पैक्टनेस, विश्वसनीयता, बिजली दक्षता और कम लागत के कारण व्यापकरूप से प्रयोग में लाया जाता है। 
  • अलग-अलग घटकों के रूप में, इनका उपयोग सॉलिड-स्टेट-लेज़र  सहित बिजली उपकरणों, ऑप्टिकल सेंसर और प्रकाश उत्सर्जक में किया जाता है। 

प्रमुख बिंदु 

  • कार्यक्रम के तहत प्रोत्साहन 
    • सेमीकंडक्टर फैब्स और डिस्प्ले फैब्स:
      • यह सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब्रिकेशन इकाइयों की स्थापना के लिये परियोजना लागत के 50% तक की वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
      • केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर ज़मीन और सेमीकंडक्टर-ग्रेड वाटर (Semiconductor-Grade Water) जैसे आवश्यक बुनियादी ढाँचे वाले हाई-टेक क्लस्टर स्थापित करने के लिये राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करेगी।
    • सेमी-कंडक्टर लेबोरेटरी (SCL) 
      • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) सेमी-कंडक्टर लेबोरेटरी(SCL) के आधुनिकीकरण तथा व्यवसायीकरण हेतु आवश्यक कदम उठाएगा।
      • यह मंत्रालय ब्राउनफील्ड फैब संयंत्र के आधुनिकीकरण हेतु एक वाणिज्यिक फैब पार्टनर के साथ SCL के संयुक्त उद्यम की संभावनाओं की तलाश करेगा।
    • कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स: 
      • सरकार योजना के तहत स्वीकृत इकाइयों को पूंजीगत व्यय की 30 प्रतिशत वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।
      • सरकार के सहयोग से कंपाउंड सेमीकंडक्टरों और सेमीकंडक्टर पैकेजिंग की कम-से-कम 15 ऐसी इकाइयांँ स्थापित किये जाने की संभावना है।
    • सेमीकंडक्टर डिज़ाइन कंपनियांँ:
      • डिज़ाइन सह प्रोत्साहन (DLI) योजना के तहत पाँच वर्षों के लिये शुद्ध बिक्री पर 6 प्रतिशत– 4 प्रतिशत के पात्र व्यय एवं प्रोडक्ट डिप्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव के 50 प्रतिशत तक उत्पाद डिज़ाइन से जुड़े प्रोत्साहन दिये जाएंगे। 
      • इंटीग्रेटेड सर्किट (IC), चिपसेट, सिस्टम ऑन चिप्स (SOC), सिस्टम एवं आईपी कोर तथा सेमीकंडक्टर लिंक्ड डिज़ाइन हेतु 100 घरेलू कंपनियों को सहायता प्रदान की जाएगी।  
    • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन: 
      • सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले के उत्पादन की एक सतत् प्रणाली विकसित करने हेतु दीर्घकालिक रणनीतियों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से एक विशेष और स्वतंत्र "इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM)" स्थापित किया जाएगा। 
      • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का नेतृत्व सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले उद्योग के क्षेत्र से जुड़े वैश्विक विशेषज्ञ करेंगे। यह सेमीकंडक्टरों एवं डिस्प्ले प्रणाली पर आधारित योजनाओं के कुशल तथा सुचारू कार्यान्वयन हेतु नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगा।
    • उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन राशि:
      • PLI के तहत बड़े पैमाने पर  इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, PLI के लिये आईटी हार्डवेयर, SPECS योजना और संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (ईएमसी 2.0) योजना के लिये 55,392 करोड़ रुपए (7.5 बिलियन अमरीकी डालर) की प्रोत्साहन सहायता को मंज़ूरी दी गई है। 
      • इसके अलावा, एसीसी बैटरी, ऑटो घटकों, दूरसंचार तथा नेटवर्किंग उत्पादों, सौर पीवी मॉड्यूल एवं व्हाइट गुड्स सहित संबद्ध क्षेत्रों के लिये 98,000 करोड़ रुपए (13 बिलियन अमेरिकी डॉलर) की PLI प्रोत्साहन राशि स्वीकृत की गई हैं।
  • महत्त्व:
    • सामरिक महत्त्व: वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में, अर्द्धचालक और डिस्प्ले के विश्वसनीय स्रोत सामरिक महत्त्व रखते हैं जो महत्त्वपूर्ण सूचना बुनियादी ढांँचे की सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण भी हैं।
    • रोज़गार: यह देश के जनसांख्यिकीय लाभांश का दोहन करने के लिये अत्यधिक कुशल रोज़गार के अवसर भी पैदा करेगा।
    • गुणक प्रभाव: सेमीकंडक्टर एवं डिस्प्ले प्रणाली के विकास का वैश्विक मूल्य शृंखला के साथ गहन एकीकरण के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक प्रभाव पड़ेगा। 
    • इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र को बढ़ावा: यह कार्यक्रम सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ डिज़ाइन में कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी प्रोत्साहन पैकेज प्रदान करके इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में एक नए युग की शुरुआत करेगा।
    • आत्मनिर्भरता: यह रणनीतिक महत्त्व और आर्थिक आत्मनिर्भरता के इन क्षेत्रों में भारत के तकनीकी नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त करेगा।

भारतीय इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र

  • परिचय:
    • भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र वर्ष 2023-24 तक 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद के साथ मज़बूती से आगे से बढ़ रहा है।
    • घरेलू उत्पादन वर्ष 2014-15 में 29 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2019-20 में लगभग 70 बिलियन अमेरिकी डॉलर (25% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) हो गया है।
    • इस उत्पादन का अधिकांश भाग भारत में स्थित अंतिम असेंबल इकाइयों (अंतिम-मील उद्योग) में होता है और उन पर ध्यान केंद्रित करने से अति पिछड़े क्षेत्रों को विकसित करने में मदद मिलेगी, इस प्रकार औद्योगिकीकरण को प्रेरित किया जाएगा।
  • आवश्यकता:
    • राष्ट्रीय सुरक्षा का विचार:
      • अधिकांश चिपों के साथ ही भारतीय संचार और महत्त्वपूर्ण प्रणालियों में उपयोग किये जाने वाले घटकों का आयात किया जाता है।
      • यह राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को बाधित कर सकता है क्योंकि विनिर्माण के दौरान गुप्त सूचनाओं को चिपों में प्रोग्राम किया जा सकता है, जो नेटवर्क और साइबर सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
    • आयात में वृद्धि:
      • यह उम्मीद की जाती है कि इलेक्ट्रॉनिक्स आयात जल्द ही भारत की सबसे बड़ी आयात मद के रूप में कच्चे तेल से आगे निकल जाएगा।
    • कोविड के बीच बढ़ी मांग और कमी:
      • कोविड -19 महामारी और दुनिया भर में उसके बाद के लॉकडाउन ने जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका सहित देशों में महत्त्वपूर्ण चिप बनाने वाली सुविधाओं को बंद कर दिया।
      • इसकी कमी व्यापक प्रभाव का कारण बनती है, यह देखते हुए कि पहली बार मांग में कमी आई है जो अनुवर्ती अकाल का कारण बन जाती है।
    • चीन विरोधी भावनाओं से लाभ:
      • कोविड -19, भारत-चीन संघर्ष और इसके परिणामस्वरूप हाल के घटनाक्रमों के लिये चीन पर संयुक्त राज्य अमेरिका के आरोपों के कारण, कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने उत्पादन को चीन से बाहर स्थानांतरित कर रही हैं।
    • मेक इन इंडिया को बढ़ावा:
      • भारत में असेंबली इकाइयों के साथ-साथ सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
      • यह घटकों के अधिक से अधिक स्थानीय उत्पादन को प्रेरित करेगा और समग्र रूप से उद्योग के विकास को बढ़ावा देगा, जिससे मेक इन इंडिया सफल हो सकेगा।
      • वर्ष 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति 2019 को अपनी मंज़ूरी दी, जो भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम डिज़ाइन और विनिर्माण के लिये एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की कल्पना करती है।
  • चुनौतियाँ:
    • अदृश्य लाभ:
      • भारत में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन की प्रभावशाली वृद्धि के बावजूद, उत्पादन इकाइयों द्वारा जोड़ा गया शुद्ध मूल्य बहुत कम है।
      • शुद्ध मूल्यवर्द्धन 5% और 15% के बीच होता है, क्योंकि अधिकांश घटक स्थानीय रूप से प्राप्त करने के बजाय आयात किये जाते हैं।
      • इसका तात्पर्य यह है कि 2.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वैश्विक बाज़ार में से स्थानीय मूल्यवर्द्धन मात्र 7-10 बिलियन अमेरिकी डॉलर है।
    • अपस्ट्रीम उद्योगों में सीमित स्वदेशी क्षमता:
      • वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के युग में उत्पादन के अंतिम चरणों में मूल्यवर्द्धन बहुत कम है, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स में क्योंकि अधिक जटिल प्रक्रियाएँ, जिसमें अधिक मूल्यवर्द्धन शामिल है, असेंबली से पहले 'अपस्ट्रीम' उद्योगों में होती हैं।
      • इनमें प्रोसेसर, डिस्प्ले पैनल, मेमोरी चिप्स, कैमरा आदि का उत्पादन शामिल है।
    • फाउंड्री का अभाव:
      • फाउंड्री (अर्द्धचालक निर्माण संयंत्र जहाँ माइक्रोचिप्स का उत्पादन होता है) की अनुपस्थिति में, भारत को माइक्रोचिप्स का उत्पादन करने के लिये विदेशी ठेकेदारों पर निर्भर रहना पड़ता है।
      • फाउंड्रीज की स्थापना के लिये 2 बिलियन अमरीकी डालर और अधिक के बड़े पैमाने पर पूंजीगत व्यय की आवश्यकता होती है।
        • प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित करने के लिये फाउंड्री को लगभग हर 18 महीने में नई तकनीकों और प्रक्रियाओं को अपनाने की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है- उच्च पूंजी मूल्यह्रास जो अक्सर उत्पादन लागत का 50-60% हिस्सा होता है।

आगे की राह

  • सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव हैं जो उद्योग 4.0 के तहत डिजिटल परिवर्तन के अगले चरण को चला रहे हैं।
  • नए मिशन को कम-से-कम अभी के लिये, डिज़ाइन केंद्रों, परीक्षण सुविधाओं, पैकेजिंग आदि सहित चिप बनाने वाली शृंखला के अन्य भागों को वित्तीय सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
    • इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर्स (SPECS) के निर्माण को माइक्रोचिप दिग्गजों को आकर्षित करने के लिये योजना के कुल परिव्यय को मौजूदा 3300 करोड़ रुपए से बढ़ाया जाना चाहिये।
    • भारत के सार्वजनिक उपक्रम जैसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड या हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड का उपयोग एक वैश्विक प्रमुख की मदद से सेमीकंडक्टर फैब फाउंड्री स्थापित करने के लिये किया जा सकता है।
  • भारत को स्वदेशी सेमीकंडक्टर्स के लक्ष्य को छोड़ने की ज़रूरत है। इसके बजाय, इसका लक्ष्य एक विश्वसनीय, बहुपक्षीय अर्द्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र में एक प्रमुख अभिकर्त्ता बनना चाहिये।
    • बहुपक्षीय अर्द्धचालक पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिये अनुकूल व्यापार नीतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं।

स्रोत-पी.आई.बी

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