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नासा का मंगल 2020 मिशन

  • 20 Feb 2021
  • 13 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (National Aeronautics and Space Administration- NASA) का ‘पर्सिवरेंस रोवर (Perseverance Rover) मंगल पर उतरा है।

  • यह ‘मार्स 2020’ मिशन के सबसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से एक था

प्रमुख बिंदु:

  • ‘मार्स 2020’ मिशन:
    • इस मिशन को मंगल ग्रह के भू-विज्ञान को बेहतर ढंग से समझने तथा जीवन के प्राचीनतम संकेतों की तलाश करने हेतु डिज़ाइन किया गया है
  • उद्देश्य:
    • प्राचीनतम जीवन के साक्ष्यों का पता लगाना। 
    • भविष्य में रोबोट और मानव अन्वेषण हेतु प्रौद्योगिकी का उपयोग करना।
  • अवधि: कम-से-कम एक मंगल वर्ष (मंगल ग्रह पर एक वर्ष की अवधि पृथ्वी के 687 दिनों के बराबर होती है)
  • मिशन के विभिन्न चरण:
    • नमूने एकत्रित करना: सिगार के आकार की एक नली में कठोर चट्टानों एवं मिट्टी के नमूनों को एकत्र किया जाएगा। इन नमूनों को एकत्र कर कनस्तरों (टीन का एक छोटा डब्बा) में बंद करके ज़मीन पर लाया जाएगा।
    • नमूने वापस लाना: एक ‘मार्स फैच रोवर’ (जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी द्वारा निर्मित है) मंगल की सतह पर उतरकर तथा घूमकर विभिन्न स्थानों के नमूनों को एकत्र कर उन्हें वापस पृथ्वी पर लाएगा।   
    • स्थानांतरण: इन नमूनों को ‘मार्स एसेंट व्हीकल’ में स्थानांतरित किया जाएगा जो ऑर्बिटर के साथ जुड़ा होगा।
    • वापसी: ऑर्बिटर एकत्रित नमूनों को वापस पृथ्वी पर लाएगा।

पर्सिवरेंस रोवर

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  •  पर्सिवरेंस रोवर के बारे में: 
    • पर्सिवरेंस अत्यधिक उन्नत, महँगी और परिष्कृत चलायमान प्रयोगशाला है जिसे मंगल ग्रह पर भेजा गया है।
    • यह मिशन पिछले मिशनों से भिन्न है क्योंकि यह महत्त्वपूर्ण चट्टानों और मिट्टी के नमूनों की खुदाई करने एवं उन्हें एकत्रित करने में सक्षम है और इन्हें मंगल की सतह पर एक गुप्त स्थान पर सुरक्षित कर सकता है।
  • प्रक्षेपण: 30 जुलाई, 2020
  • लैंडिग: 18 फरवरी, 2021
  • लैंडिग का स्थान: 
    • जेज़ेरो क्रेटर (एक प्राचीन नदी डेल्टा जिसमें चट्टानें और खनिज विद्यमान हैं तथा जिनका निर्माण केवल पानी में होता हैं)।
  • शक्ति का स्रोत:
    • रोवर में विद्युत आपूर्ति हेतु एक ‘मल्टी-मिशन रेडियोआईसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर’ (Multi-Mission Radioisotope Thermoelectric Generator- MMRTG) का प्रयोग किया गया है जो प्लूटोनियम (प्लूटोनियम डाइऑक्साइड) के प्राकृतिक रेडियोधर्मी क्षय के कारण उत्पन्न गर्मी को बिजली में परिवर्तित करता है।
    • मार्स ऑक्सीजन इन-सीटू रिसोर्स यूटिलाइज़ेशन एक्सपेरिमेंट (MOXIE):
      • इसके द्वारा वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड का प्रयोग करके ऑक्सीजन उत्पादन करने हेतु विद्युत का उपयोग किया जाएगा।
      • यदि यह उपकरण सही प्रकार से कार्य करने में सफल रहता है तो इसके द्वारा मनुष्यों की दो और महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाएगी जिनमें शामिल हैं: सांँस लेने हेतु ऑक्सीजन और पृथ्वी पर वापस आने हेतु रॉकेट ईंधन।
    • रडार इमेज़र फॉर मार्स’ सबसर्फेस एक्सपेरिमेंट  (RIMFAX):
      • RIMFAX उच्च रिज़ॉल्यूशन मैपिंग (High Resolution Mapping) प्रदान करते हुए मंगल की ऊपरी सतह पर पानी की खोज करेगा।
    • मार्स हेलीकाप्टर: उपकरण: यह रोवर मंगल ग्रह पर विज्ञान तथा नई तकनीक के अभूतपूर्व परीक्षण करने के उद्देश्य से भेजा गया है। इसमें कुल सात उपकरण, दो माइक्रोफोन और 23 कैमरे प्रयुक्त हुए हैं। इस रोवर में प्रयुक्त कुछ महत्त्वपूर्ण उपकरण इस प्रकार हैं:
      • यह परीक्षण हेतु एक छोटा ड्रोन है जो इस बात का पता लगाएगा कि क्या एक हेलीकॉप्टर मंगल के विरल वातावरण में उड़ान भरने में सक्षम है। मंगल ग्रह के वायुमंडल का घनत्व एक हेलीकॉप्टर या विमान के उड़ान भरने के लिये आवश्यक घनत्व से बहुत ही कम है।
      • मास्टकैम-Z:
        • यह पैनोरमिक (Panoramic) और त्रिविमीय चित्रण (Stereoscopic Imaging) क्षमता वाली एक उन्नत कैमरा प्रणाली है जो खनिजों का निर्धारण करने में मदद करेगी।
      • सुपरकैम:
        • यह चित्र लेने, रासायनिक संरचनाओं के विश्लेषण और दूर से ही खनिजों का पता लगाने में सक्षम है।
      • प्लेनेटरी इंस्ट्रूमेंट फॉर एक्स-रे लिथोकैमिस्ट्री (PIXL): 
        • एक ‘एक्स-रे प्रतिदीप्ति स्पेक्ट्रोमीटर’ और ‘उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजर’ पहले से कहीं अधिक विस्तृत रूप से रासायनिक तत्त्वों का पता लगाने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम होगा।
      • स्कैनिंग हैबिटेबल एन्वायरनमेंट्स विद रमन ल्युमिनेसेंस फॉर आर्गेनिकस एंड केमिकल्स (SHERLOC): 
          • स्पेक्ट्रोमीटर द्वारा ‘फाइन-स्केल इमेजिंग’ प्राप्त करने तथा खनिज और कार्बनिक यौगिकों की माप करने हेतु एक पराबैंगनी (UV) लेज़र का उपयोग किया जाएगा।
          • SHERLOC मंगल की सतह पर उड़ान भरने वाला पहला UV रमन स्पेक्ट्रोमीटर होगा जो पेलोड में अन्य उपकरणों के साथ मापन कार्य करेगा।
      • मार्स  एन्वायरनमेंट डायनिमिक एनालाइज़र (MEDA): 
        • इस सेंसर द्वारा तापमान, हवा की गति, दिशा, दबाव, सापेक्षिक आर्द्रता और धूल के आकार का मापन किया जाएगा।

    मंगल ग्रह:

    आकार और दूरी:

    • यह सूर्य से चौथे स्थान पर स्थित ग्रह है तथा सौरमंडल का दूसरा सबसे छोटा ग्रह है।
    • मंगल ग्रह आकार में पृथ्वी का लगभग आधा है।

    पृथ्वी से समानता (कक्षा और घूर्णन):

    • मंगल ग्रह सूर्य की परिक्रमा करता है तथा अपने अक्ष पर 24.6 घंटे में घूर्णन करता है जो पृथ्वी के एक दिन (23.9 घंटे) के समय के अधिक नज़दीक है।
    • सूर्य की परिक्रमा करते समय मंगल अपने अक्ष पर 25 डिग्री तक झुका रहता है। मंगल का यह अक्षीय झुकाव पृथ्वी के समान होता है, जो कि 23.4 डिग्री पर झुकी होती है।
    • पृथ्वी की तरह मंगल ग्रह पर भी अलग-अलग मौसम विद्यमान होते हैं, परंतु मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तुलना में मौसम की अवधि लंबी होती है, क्योंकि मंगल की सूर्य से अधिक दूरी होने के कारण इसका परिक्रमण काल अधिक होता है।
    • मंगल ग्रह पर दिनों को ‘सोल्स’ (सोलर डे- Solar Day) कहते हैं।
    • सतह: मंगल ग्रह की सतह भूरे, सोने और पीले जैसे रंगों की दिखती है। मंगल के लाल दिखने का कारण इसकी चट्टानों में लोहे का ऑक्सीकरण, जंग लगना और धूल कणों की उपस्थिति है, इसलिये इसे लाल ग्रह भी कहा जाता है।
    • मंगल पर सौरमंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी ‘ओलंपस मॉन्स’ स्थित है। यह पृथ्वी के माउंट एवरेस्ट पर्वत से तीन गुना ऊँचा तथा आकार में न्यू मैक्सिको राज्य के समान है।

    वातावरण:

    • मंगल ग्रह पर वातावरण अत्यधिक क्षीण/दुर्बल है, जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन और आर्गन गैसों की अधिकता है।

    मैग्नेटोस्फेयर:

    • अभी तक मंगल पर कोई चुंबकीय क्षेत्र विद्यमान नहीं है, लेकिन इसके दक्षिणी गोलार्द्ध में मार्टियन क्रस्ट का क्षेत्र अत्यधिक चुंबकीय है।

    उपग्रह:  

    • फोबोस और डीमोस मंगल के दो छोटे उपग्रह है।

    पूर्ववर्ती मंगल मिशन: 

    • वर्ष 1971 में सोवियत संघ विश्व का पहला देश बना, जिसने मंगल पर ‘मार्स 3’ (Mars 3) को उतारा।
    • मंगल की सतह तक पहुँचने वाला दूसरा देश अमेरिका है। वर्ष 1976 के बाद से इसने 8 बार सफलतापूर्वक मंगल ग्रह पर लैंडिंग की है, जिनमें वर्ष 2019 में 'इनसाइट' (InSight) की लेंडिंग नवीनतम है।
    • यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने ‘मार्स एक्सप्रेस मिशन’ (Mars Express Mission) के माध्यम से मंगल की कक्षा में अपने अंतरिक्षयान को उतारा है।

    भारत का मंगल ऑर्बिटर मिशन  (MOM) या मंगलयान:

    • इसे नवंबर 2013 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था।
    • इसे पीएसएलवी सी -25 रॉकेट द्वारा मंगल ग्रह की सतह और खनिज संरचना के अध्ययन के साथ-साथ मंगल ग्रह के वातावरण में मीथेन (मंगल पर जीवन का एक संकेतक) की उपस्थिति का पता लगाने के उद्देश्य से लॉन्च किया गया था।

    मंगल ग्रह से संबंधित लगातार मिशनों के कारण: इसके दो प्राथमिक कारण हैं

    पृथ्वी से समानता:

    • मंगल एक ऐसा ग्रह है जहाँ अतीत में जीवन के विकसित होने के संकेत प्राप्त होते हैं, लगभग 4 बिलियन साल पहले मंगल ग्रह की शुरुआती परिस्थितियाँ पृथ्वी से बहुत मिलती-जुलती थीं।
    • मंगल का वातावरण अत्यधिक सघन है जहाँ पानी की उपस्थिति के साक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं।
    • यदि वास्तव में मंगल ग्रह पर स्थितियाँ पृथ्वी के समान थीं तो इस बात की संभावना बन सकती है कि मंगल ग्रह पर सूक्ष्म स्तर पर ही सही परंतु जीवन विद्यमान रहा होगा।

    अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक उपयुक्त:

    • मंगल एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहाँ मानव दीर्घ अवधि हेतु जा सकता है या निवास कर सकता है। शुक्र और बुध ग्रह का औसत तापमान 400 डिग्री सेल्सियस से अधिक है बाहरी सौरमंडल के सभी ग्रह जो कि बृहस्पति से शुरू होते हैं- सिलिकेट या चट्टान से निर्मित न होकर गैसों से निर्मित हैं जो कि बहुत ठंडे हैं।
    • ध्रुवों पर -125 डिग्री सेल्सियस से लेकर भूमध्य रेखा पर 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की अनुमानित सीमा के साथ मंगल ग्रह तापमान के मामले में तुलनात्मक रूप से अनुकूल है।

    स्रोत: द हिंदू

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