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मिल्क फोर्टिफिकेशन प्रोजेक्ट

  • 10 Jun 2019
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

“मिल्क फोर्टिफिकेशन प्रोजेक्ट”(Milk Fortification Project) नामक पहल की शुरुआत विश्व बैंक (World Bank), टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (National Dairy Development Board-NDDB) ने उपभोक्ताओं में विटामिन की कमी को दूर करने के उद्देश्य से की थी। उल्लेखनीय है कि पिछले दो वर्षों के दौरान इसमें महत्त्वपूर्ण प्रगति देखी गई है।

प्रमुख बिंदु

  • राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड एवं भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा निर्मित मानकों के आधार पर फोर्टिफिकेशन किया जाता है।
  • वर्तमान में देश के 20 राज्यों में लगभग 25 दुग्ध फेडरेशन, निर्माता कंपनियाँ या दुग्ध संघ प्रतिदिन लगभग 55 लाख लीटर दूध का उत्पादन कर रहे हैं।
  • अब तक लगभग 1 मिलियन टन दूध को फोर्टिफाई किया जा चुका है।

मिल्क फोर्टिफिकेशन प्रोजेक्ट (Milk Fortification Project)

  • इस परियोजना की शुरुआत 5 सितंबर 2017 को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (National Dairy Development Board-NDDB) ने विश्व बैंक और टाटा ट्रस्ट के साथ मिलकर की थी।
  • इस परियोजना का लक्ष्य 30 मिलियन ग्राहकों की दुग्ध तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिये लगभग 2 मिलियन टन दूध की प्रोसेसिंग करना है।
  • इस परियोजना की के लिये निर्धारित अवधी 23 माह है तथा इसका वित्तपोषण दक्षिण एशिया खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पहल (South Asia Food and Nutrition Security Initiative-SAFANSI) द्वारा किया गया है और यह विश्व बैंक द्वारा प्रशासित है।
  • SAFANSI का उद्देश्य दक्षिण एशियाई देशों में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के मानकों में सुधार करना तथा खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में वृद्धि करते हुए दीर्घकालिक कुपोषण की समस्या को हल करना है।
  • इस परियोजना को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने हेतु राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, विश्व-बैंक के लिये परामर्शदाता की भूमिका का भी निर्वहन करता है। यह परियोजना के कार्यान्वयन (जैसे- दूध के फोर्टिफिकेशन और परीक्षण के लिये SOPs का विकास;  गुणवत्ता आश्वासन और गुणवत्ता नियंत्रण; परीक्षण, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और प्रचार सामग्री विकसित करना) हेतु दुग्ध संघों, दुग्ध-निर्माता कंपनियों एवं इस परियोजना से जुड़े अन्य निकायों को तकनीकी और वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराता है।

Micronutrient malnutrition

  • माइक्रोन्यूट्रीएंट मैलन्यूट्रीशन (Micronutrient malnutrition) का तात्पर्य आहार में विटामिन और खनिज़ पदार्थों की कमी के कारण होने वाले रोगों से है।
  • माइक्रोन्यूट्रीएंट मैलन्यूट्रीशन में सामान्यतः  विटामिन-A, आयरन और आयोडीन की कमी से होने वाले रोग शामिल होते हैं।
  • गरीबी, विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों की अनुपलब्धता, बेहतर आहार प्रणालियों के बारे में जानकारी का अभाव और संक्रामक रोगों की अधिकतम घटनाएँ आदि कुछ ऐसे कारक हैं जो माइक्रोन्यूट्रीएंट कुपोषण का कारण बनते हैं।
  • सामजिक स्तर पर कुपोषण के इस स्वरुप का विस्तार बहुत तीव्रता से हो रहा है। जिससे लोगों की कार्यक्षमता क्षीर्ण हो रही है इसके साथ ही लोगों में बीमारी और विकलांगता की दर तेज़ी से बढ़ रही है जो मानव समाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
  • खाद्य संवर्द्धन ही इस समस्या से निपटने का एक मात्र उपाय है।  फोर्टिफिकेशन के अंतर्गत दूध, चावल, नमक इत्यादि की गुणवत्ता सुधारने हेतु कृत्रिम विधियों से  इनमें आयरन, जिंक, आयोडीन, और विटामिन A और D को बढ़ाना है।
  • भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है। जिसकी प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता वर्ष 2017-18 में बढ़कर 375 ग्राम प्रति दिन हो गई है। दूध का अत्यधिक मात्रा में  उत्पादन एवं व्यापक वितरण की व्यवस्था, संतुलित आहार का अभिन्न अंग होने के कारण संवर्द्धन का सबसे बेहतर विकल्प साबित हुआ है।

माइक्रोन्यूट्रीएंट मैलन्यूट्रीशन और भारत

  • भारत में विटामिन A की कमी से ग्रसित शिशुओं की संख्या वैश्विक स्तर पर इस रोग से ग्रसित शिशुओं की संख्या का एक-चौथाई है जबकि आयोडीन की कमी से लगभग 13 मिलियन शिशु इससे ग्रसित हैं।
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (National Family Health Survey-4) के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में 38.4% बच्चों का वज़न कम है, 21% बच्चे वेस्टिंग से पीड़ित हैं और 35.7% बच्चों का वज़न सामान्य से कम हैं।

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB)

  • राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना वर्ष 1965 में शोषण के स्थान पर सशक्तीकरण, परंपरा के स्थान पर आधुनिकता और स्थिरता के स्थान पर विकास लाने के लिये की गई थी। इसका उद्देश्य डेयरी उद्योग को भारत के ग्रामीण लोगों के विकास के साधन के रूप में परिवर्तित करना है।
  • प्रारंभ में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, सोसायटी अधिनियम 1860 के तहत एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत था। बाद में NDDB अधिनियम, 1987 के अंतर्गत भारतीय डेयरी निगम (कंपनी अधिनियम 1956 के तहत पंजीकृत एवं स्थापित) के साथ इसका विलय हो गया जो 12 अक्तूबर, 1987 से प्रभावी हुआ। इस नव-निर्मित कॉर्पोरेट संस्था को राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित किया गया।
  • इसके बाद से, डेयरी बोर्ड ने भारत में डेयरी उद्योग के विकास हेतु डेयरी कार्यक्रमों की योजना बनाई। जिसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में इस उद्योग के विकास दायित्व उन दुग्ध उत्पादकों को सौंप दिया जो समितियों के प्रबंधन के लिये पेशेवरों की नियुक्ति करते हैं।

स्रोत- द हिंदू (बिज़नेसलाइन)

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