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बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स को अंतरिक्ष में भेजने की योजना

  • 01 Jun 2021
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

नासा (NASA) विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के संचालन के लिये बेबी स्क्विड्स और टार्डिग्रेड्स (Baby Squids and Tardigrades- जिसे वाटर बियर भी कहा जाता है) को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) में भेजने की योजना बना रहा है।

प्रमुख बिंदु

अध्ययन: ये दोनों जंतु अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों का हिस्सा हैं।

  • स्पेसफ्लाइट के वातावरण में टार्डिग्रेड्स (वाटर बियर) का व्यवहार।
    • टार्डिग्रेड पृथ्वी पर उच्च दबाव, तापमान और विकिरण जैसी चरम परिस्थितियों में अपने आप को बनाए रख सकते हैं।
  • सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण का स्क्विड और लाभकारी रोगाणुओं के बीच संबंधों पर प्रभाव।
    • स्क्विड उमामी (UMAMI- पशु-सूक्ष्मजीव के बीच परस्पर क्रिया पर सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण की समझ) इस अध्ययन का एक हिस्सा है जो लाभकारी रोगाणुओं और उनके पशु होस्ट (Host) के बीच परस्पर क्रिया पर स्पेसफ्लाइट के प्रभावों की जाँच करता है।

अध्ययन का महत्त्व:

  • होस्ट-सूक्ष्मजीव संबंध:
    • पृथ्वी पर यह जानवरों और लाभकारी रोगाणुओं के बीच जटिल संबंधों को बचाने और यहाँ तक ​​कि बेहतर मानव स्वास्थ्य तथा कल्याण सुनिश्चित करने के तरीके खोजने में मदद करेगा।
    • यह अंतरिक्ष एजेंसियों की लंबी अवधि के मिशनों पर पड़ने वाले प्रतिकूल होस्ट-सूक्ष्मजीव परिवर्तनों से अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा का बेहतर उपाय विकसित करने में मदद करेगा।
  • लंबी अंतरिक्ष उड़ानें:
    • टार्डिग्रेड्स पर किये गए अध्ययन से शोधकर्त्ताओं को उनकी कठोरता का करीब से अध्ययन करने और संभवतः उन जीनों की पहचान करने का अवसर मिलेगा जो इन्हें अत्यधिक लचीला बनाते हैं। यह अध्ययन सुरक्षित तथा लंबी अंतरिक्ष उड़ानों में मदद करेगा।
    • इसी तरह ज़ेब्राफिश (Zebrafish) पर हाल के एक शोध ने प्रदर्शित किया कि कैसे प्रेरित शीतनिद्रा अंतरिक्ष उड़ान के दौरान अंतरिक्ष के तत्त्वों, विशेषकर विकिरण से मनुष्यों की रक्षा कर सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

  • यह एक रहने योग्य कृत्रिम उपग्रह है, जिसे ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ में मानव निर्मित सबसे बड़ा ढाँचा माना जाता है। इसका पहला हिस्सा वर्ष 1998 में ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ में लॉन्च किया गया था।
  • यह लगभग 92 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है और प्रतिदिन पृथ्वी की 15.5 परिक्रमाएँ पूरी करता है।
  • ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ कार्यक्रम पाँच प्रतिभागी अंतरिक्ष एजेंसियों के बीच एक संयुक्त परियोजना है: नासा (अमेरिका), रॉसकॉसमॉस (रूस), जाक्सा (जापान), ESA (यूरोप) और CSA (कनाडा)। हालाँकि इसके स्वामित्व और उपयोग को अंतर-सरकारी संधियों और समझौतों के माध्यम से शासित किया जाता है।
  • यह एक माइक्रोग्रैविटी और अंतरिक्ष पर्यावरण अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है जिसमें चालक दल के सदस्य जीव विज्ञान, मानव जीव विज्ञान, भौतिकी, खगोल विज्ञान, मौसम विज्ञान और अन्य विषयों से संबंधित प्रयोग करते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के कारण ही ‘लो-अर्थ ऑर्बिट’ में निरंतर मानवीय उपस्थिति संभव हो पाई है।
  • इसके वर्ष 2030 तक संचालित रहने की उम्मीद है।
  • हाल ही में चीन ने अपने स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन का एक मानव रहित मॉड्यूल लॉन्च किया जिसे वर्ष 2022 के अंत तक पूरा करने की उसकी योजना है।
    • ‘तियानहे’ या ‘हॉर्मनी ऑफ द हैवन्स’ नामक इस मॉड्यूल को चीन के सबसे बड़े मालवाहक रॉकेट लॉन्ग मार्च 5 बी से लॉन्च किया गया है।
  • भारत भी आगामी 5 से 7 वर्षों में अंतरिक्ष में सूक्ष्म गुरुत्त्व संबंधी प्रयोगों का संचालन करने के लिये ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ में अपने स्वयं के अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण की दिशा में कार्य कर रहा है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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