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भारत का अंतरिक्ष स्टेशन

  • 28 Jun 2019
  • 14 min read

इस Editorial में The Hindu, Indian Express, Business Line में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है, जो भारत के अंतरिक्ष स्टेशन निर्माण से संबंधित है इस आलेख में अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण तथा उससे संबंधित विभिन्न पक्षों का उल्लेख किया गया है तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में इसरो (Indian Space Research Organisation) के चेयरमैन के. सिवान द्वारा की गई एक घोषणा के अनुसार, भारत इस दशक के अंत तक यानी वर्ष 2030 तक अंतरिक्ष में अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन निर्माण पर विचार कर रहा है। पहले से ही इसरो वर्ष 2022 में गगनयान मिशन की योजना पर कार्य कर रहा है, इस मिशन में भारत स्वयं के बल पर 3 भारतीयों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर बना रहा है। इस योजना की सफलता के पश्चात् इसरो इस मिशन को जारी रखना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत को स्वयं के अंतरिक्ष स्टेशन की आवश्यकता है। भारत ने वर्ष 2017 में ही स्पेस डॉकिंग जैसी तकनीक पर शोध करने के लिये बजट का प्रावधान किया था। यह तकनीक स्पेस स्टेशन में उपयोग होने वाले मोडयूल को आपस में जोड़ने के लिये आवश्यक होती है। इसके बाद से ही ऐसा माना जा रहा था कि भारत अंतरिक्ष में स्टेशन के निर्माण की योजना पर विचार कर रहा है।

क्या होता है अंतरिक्ष स्टेशन

सामान्य शब्दों में यह ऐसे स्थान अथवा सुविधा (Facility) के रूप में समझा जाता है, जो अंतरिक्ष में स्थायी रूप से उपस्थित होता है एवं जिसका उपयोग अंतरिक्ष यात्री निवास स्थान के रूप में करते हैं। अंतरिक्ष स्टेशन को उसके आकार और वज़न के अनुसार कई हिस्सों में अंतरिक्ष में भेजा जाता है। इन हिस्सों को मोडयूल (Module) कहा जाता है। इन हिस्सों को अंतरिक्ष में ही डॉकिंग तकनीक से आपस में जोड़ दिया जाता है। अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना पृथ्वी की निम्न कक्षा (Low Earth Orbit-LEO) में की जाती है। इस कक्षा की रेंज पृथ्वी से 2000 किमी तक होती है अंतरिक्ष यात्री स्टेशन में रहकर सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण (Microgravity) में विभिन्न विषयों यथा- जीव विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, मौसम विज्ञान आदि से संबंधित प्रयोगों को अंजाम देते है। सामान्यतः ऐसे प्रयोग पृथ्वी पर संभव नहीं होते, इनके लिये विशेष पर्यावरण की आवश्यकता होती है। साथ ही अंतरिक्ष के गहन अध्ययन के लिये भी ऐसे स्टेशन उपयोगी होते हैं।

अंतरिक्ष स्टेशन का इतिहास

अंतरिक्ष से संबंधित तकनीक अधिक जटिल और खर्चीली होती है, इसको ध्यान में रखकर वर्ष 1960 के दशक में इस क्षेत्र में शोध कार्यों की शुरुआत हुई। सोवियत संघ और अमेरिका ने सर्वप्रथम इस क्षेत्र में प्रयासों को अंजाम दिया (शीत युद्ध की प्रतिस्पर्द्धा के कारण)। सोवियत रूस (USSR) ने सर्वप्रथम वर्ष 1971 में सल्युत (Salyut) नाम के अंतरिक्ष स्टेशन को अंतरिक्ष में स्थापित किया। इसके 2 वर्ष बाद ही अमेरिका ने स्कायलैब (Skylab) नाम से अंतरिक्ष में स्टेशन स्थापित किया। अब तक कुल 11 अंतरिक्ष स्टेशनों का निर्माण किया जा चुका है। लेकिन वर्तमान में सिर्फ 2 स्टेशन ही अंतरिक्ष में कार्यरत है इनमें एक अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station- ISS) तथा दूसरा चीन का तियोंगयांग-2 (Tiangong-2) स्टेशन है ISS की स्थापना का आरंभ वर्ष 1998 में किया गया था और वर्ष 2011 से यह अपनी पूर्ण क्षमता के साथ परिचालित हो रहा है। इस अंतरिक्ष स्टेशन पर वर्ष 2000 में सर्वप्रथम अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा गया था। ISS का परिचालन अमेरिका की नासा (NASA) अंतरिक्ष एजेंसी की अगुवाई में 16 देशों द्वारा किया जा रहा है। इन देशों में अमेरिका के साथ-साथ रूस, जापान, ब्राज़ील, कनाडा तथा यूरोप के 11 देश शामिल हैं। उपर्युक्त सभी स्टेशनों की स्थापना पृथ्वी से लगभग 400 किमी. की ऊँचाई पर की गई है ऐसे अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी से भी देखे जा सकते हैं।

भारत के लिये अंतरिक्ष स्टेशन की आवश्यकता क्यों?

भारत ने वर्ष 2022 में गगनयान मिशन की सफलता के पश्चात् वर्ष 2030 तक एक छोटे आकार का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाई है। इस स्टेशन का भार 20 टन होगा जो कि ISS और चीनी अंतरिक्ष स्टेशन से आकार में काफी हल्का है (इनका भार क्रमशः 450 टन और 80 टन है)। इस स्टेशन में 4-5 अंतरिक्ष यात्री 15-20 दिनों के लिये रुक सकेंगे। इस स्टेशन को पृथ्वी की निम्न कक्षा (LEO) में लगभग 400 किमी. की ऊँचाई पर स्थापित किया जाएगा। भारत के लिये अंतरिक्ष स्टेशन की आवश्यकता को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है-

  • ज्ञात हो कि भारत से एकमात्र अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा वर्ष 1984 में सोवियत रूस द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए थे। इसके पश्चात् कोई अन्य भारत का नागरिक अंतरिक्ष में नहीं गया है। जो भी अन्य यात्री, जैसे- कल्पना शर्मा और सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में गए है वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में नहीं थे। ऐसे में ऐसा कोई देश जो वैश्विक शक्ति बनने की कामना रखता हो, किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रह सकता। अतः भारत के लिये भी आवश्यक है कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाए।
  • भारत की अतीत में कुछ नीतियों (परमाणु नीति) के कारण भारत ISS का भी उपयोग नहीं कर सका है। साथ ही ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि ISS वर्ष 2024-2025 के पश्चात् प्रभावी रूप से कार्यरत नहीं रह सकेगा, ऐसे में यदि भारत इसके उपयोग का प्रयास करता है तब भी कोई लाभ नहीं होगा।
  • भारत गगनयान मिशन की सफलता के पश्चात् भी इस मिशन को जारी रखने का इच्छुक है। ऐसे में भारत को सहायता के लिये अंतरिक्ष स्टेशन की आवश्यकता होगी।
  • स्पेस एक्स (SpaceX) तथा ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) जैसी कंपनियाँ अंतरिक्ष को पर्यटन से जोड़कर लाभ लेने की योजना बना रही हैं, जिसमें नासा भी शामिल हो गया है। ऐसे में भारत के लिये भी आवश्यक है कि इस क्षेत्र में प्रगति करे ताकि भविष्य में अंतरिक्ष से होने वाले लाभों में सहभागी बन सके।

गगनयान

  • इस कार्यक्रम के साथ भारत मानव अंतरिक्षयान मिशन शुरू करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। उल्लेखनीय है कि अब तक केवल अमेरिका, रूस और चीन ने मानव अंतरिक्षयान मिशन शुरू किया है।
  • इसरो ने इस कार्यक्रम के लिये आवश्यक पुन: प्रवेश मिशन क्षमता, क्रू एस्केप सिस्टम, क्रू मॉड्यूल कॉन्फ़िगरेशन, तापीय संरक्षण व्यवस्था, मंदन एवं प्रवर्तन व्यवस्था, जीवन रक्षक व्यवस्था की उप-प्रणाली इत्यादि जैसी कुछ महत्त्वपूर्ण तकनीकों का विकास कर लिया है।
  • इन प्रौद्योगिकियों में से कुछ को अंतरिक्ष कैप्सूल रिकवरी प्रयोग (SRE-2007), क्रू मॉड्यूल वायुमंडलीय पुन: प्रवेश प्रयोग (CARE-2014) और पैड एबॉर्ट टेस्ट (2018) के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है।
  • गगनयान को लॉन्च करने के लिये GSLVMK-3 लॉन्च व्हीकल का उपयोग किया जाएगा, जो इस मिशन के लिये आवश्यक पेलोड क्षमता से परिपूर्ण है।
  • इस अंतरिक्षयान को 300-400 किलोमीटर की निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में रखा जाएगा।
  • इस मिशन की कुल लागत 10,000 करोड़ रुपए से कम होगी।

अंतरिक्ष स्टेशन से लाभ

अंतरिक्ष को भविष्य की कई संभावनाओं के लिये द्वार माना जा रहा है। इन संभावनाओं का सहभागी होने से भारत आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है। कुछ ऐसे प्रयोग होते हैं जिनको पृथ्वी पर नहीं किया जा सकता है तथा कुछ प्रयोगों को सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण (Microgravity) में करने के लिये भी अंतरिक्ष स्टेशन की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त भारत को अंतरिक्ष के गहन अध्ययन तथा गगनयान मिशन की सफलता के पश्चात् उसे जारी रखने के लिये भी स्टेशन उपयोगी है।

भारत के समक्ष चुनौतियाँ

भारत अंतरिक्ष में स्टेशन स्थापित करने की योजना बना रहा है। ऐसे में इस जटिल तकनीक तथा स्टेशन की व्यावहारिकता को लेकर कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। जो निम्नलिखित हैं-

  • भारत में ऐसे कार्यक्रमों को लेकर प्रायः कोष की कमी बनी रहती है ऐसे में अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण करना बहुत कठिन हो सकता है। ज्ञात हो कि ISS निर्माण में 160 बिलियन डॉलर का खर्च आया था। हालाँकि ISS का भार प्रस्तावित भारतीय स्टेशन से 20 गुना अधिक है फिर भी भारत को एक वृहद् कोष की आवश्यकता होगी।
  • भारत स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके अंतरिक्ष स्टेशन निर्मित करना चाहता है। ऐसे में भारत के लिये यह कार्य अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। भले ही भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं लेकिन भारत के लिये ऐसी तकनीक का निर्माण करना अभी भी जटिल है। वर्तमान युग में तकनीक में तीव्रता से परिवर्तन हो रहा है, यदि परियोजना अपने निश्चित समय से आगे बढ़ जाती है तो उससे संबंधित तकनीक में भी समय के साथ बदलाव करना जटिल हो जाता है। यह तकनीकी परिवर्तन न सिर्फ निर्माण के स्तर पर आवश्यक है बल्कि स्टेशन को बनाए रखने के लिये भी आवश्यक है।
  • भारत के 20 टन भार के स्टेशन के निर्माण की योजना है। लेकिन भारत की भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इसके आकार में वृद्धि करना आवश्यक होगा। भारत को भविष्य में ऐसे बदलावों को ध्यान में रख कर व्यापक योजना बनानी होगी।

चुनौतियों का समाधान

भारत कोष की समस्या तथा तकनीक से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिये अपने साथ निजी क्षेत्र को भी शामिल कर सकता है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल (PPP) इसके लिये उपयोगी हो सकता है। नासा ने पहले ही अंतरिक्ष को पर्यटन से जोड़कर राजस्व अर्जित करने की योजना बनाई है। ऐसी ही योजना पर भारत भी निजी क्षेत्र के साथ मिलकर प्रयास कर सकता है।

निष्कर्ष

भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में अनुसंधान की शुरुआत से अब-तक के छोटे से काल और सीमित संसाधनों में कई कीर्तिमान अर्जित किये हैं। वर्तमान भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो कम लागत में जटिल कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध है। भारत की यह विरासत भविष्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का समाधान करने के लिये भारत को योग्य बनाती है। ऐसे में भारत अपने सीमित संसाधनों का कुशल उपयोग करके और सही तकनीकों का निर्माण करके अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण में आने वाली चुनौतियों से निपट सकता है।

प्रश्न- अंतरिक्ष स्टेशन से आप क्या समझते हैं? भारत के संदर्भ इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिये। (250 शब्द)

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