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सामाजिक न्याय

आंतरिक विस्थापन

  • 16 Nov 2021
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

UNHCR, शरणार्थी सम्मेलन

मेन्स के लिये:

आंतरिक रूप से विस्थापन, भारत में आंतरिक विस्थापन के कारक

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner for Refugees-UNHCR) की एक रिपोर्ट (मिड-ईयर ट्रेंड्स 2021 रिपोर्ट) के अनुसार, वर्ष 2021 के आरंभिक छमाही में  संघर्ष और हिंसा के कारण 33 देशों में लगभग 51 मिलियन लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए थे।

  • संघर्ष, कोविड -19, गरीबी, खाद्य असुरक्षा और जलवायु आपातकाल के संयोजन ने विस्थापितों की मानवीय दुर्दशा को बढ़ा दिया है, जिनमें से अधिकांश विकासशील क्षेत्रों में रहते हैं।
  • अफ्रीका वह क्षेत्र है जो विस्थापित व्यक्तियों की संख्या के मामले में सर्वाधिक संवेदनशील है।

Internal-Displacement

प्रमुख बिंदु

  • आंतरिक विस्थापन (अर्थ):
    • आंतरिक विस्थापन उन लोगों की स्थिति का वर्णन करता है जिन्हें अपने घर छोड़ने के लिये मज़बूर किया गया है लेकिन उन्होंने अपना देश नहीं छोड़ा है। 
    • विस्थापन के कारक: प्रत्येक वर्ष लाखों लोग संघर्ष, हिंसा, विकास परियोजनाओं, आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अपने घरों या निवास स्थानों को छोड़कर अपने देशों की सीमाओं के भीतर विस्थापित हो जाते हैं। 
    • घटक: आंतरिक विस्थापन दो घटकों पर आधारित है:
      • यदि लोगों का विस्थापन जबरदस्ती या अनैच्छिक है (उन्हें आर्थिक और अन्य स्वैच्छिक प्रवासियों से अलग करने हेतु); 
      • यदि व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राज्य की सीमाओं के भीतर रहता है (उन्हें शरणार्थियों से अलग करने हेतु)।
    • शरणार्थी से अंतर: वर्ष 1951 के शरणार्थी सम्मेलन के अनुसार, "शरणार्थी" एक ऐसा व्यक्ति है जिस पर अत्याचार किया गया है और अपने मूल देश को छोड़ने के लिये मज़बूर किया गया है।
      • शरणार्थी माने जाने की एक पूर्व शर्त यह है कि वह व्यक्ति एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करता हो।
      • शरणार्थियों के विपरीत, आंतरिक रूप से विस्थापित लोग किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का विषय नहीं हैं।
      • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों की सुरक्षा और सहायता पर वैश्विक नेतृत्व के रूप में किसी एक एजेंसी या संगठन को नामित नहीं किया गया है।
      • हालाँकि आंतरिक विस्थापन पर संयुक्त राष्ट्र के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
    • आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों (IDP) द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ: IDP को शारीरिक शोषण, यौन या लिंग आधारित हिंसा का खतरा बना रहता है और वे परिवार के सदस्यों से अलग होने का जोखिम उठाते हैं। 
      • वे प्राय: पर्याप्त आश्रय, भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहते हैं और अक्सर अपनी संपत्ति, भूमि या आजीविका तक अपनी स्थापित पहुँच को खो देते हैं।
  • भारत में आंतरिक विस्थापन:
    • विस्तार: भारत में IDP की संख्या का अनुमान लगाना लगभग मुश्किल है, क्योंकि इतने बड़े देश में नियमित निगरानी संभव नहीं है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों के डेटा के समन्वय के लिये ज़िम्मेदार केंद्रीय प्राधिकरण की कमी है। 
    • नीतिगत ढाँचा: भारत में शरणार्थियों या IDP की समस्या से निपटने के लिये कोई राष्ट्रीय नीति और कानूनी संस्थागत ढाँचा नहीं है।
      • भारत ने वर्ष 1951 के कन्वेंशन और वर्ष 1967 के प्रोटोकॉल की पुष्टि नहीं की है और वह अधिकांश शरणार्थी समूहों को UNHCR तक पहुँच की अनुमति नहीं देता है। 
      • शरणार्थी मुद्दों की निगरानी के लिये एक स्थायी संस्थागत ढाँचे के अभाव में, शरणार्थी का दर्जा देना राजनीतिक अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है।
    • भारत में आंतरिक विस्थापन के कारक:
      • अलगाववादी आंदोलन: आज़ादी के बाद से, उत्तर-पूर्वी भारत में दो प्रमुख सशस्त्र संघर्ष हुए हैं - नगा आंदोलन और असम आंदोलन
        • राज्य बलों और आतंकवादियों के बीच जम्मू और कश्मीर के युद्ध के कारण कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था।
      • पहचान-आधारित स्वायत्तता आंदोलन: बोडोलैंड, पंजाब, गोरखालैंड और लद्दाख जैसे, पहचान-आधारित स्वायत्तता आंदोलनों ने भी हिंसा और विस्थापन को जन्म दिया है।
      • स्थानीय हिंसा: आंतरिक विस्थापन जातिगत विवादों (जैसे-बिहार और उत्तर प्रदेश ), धार्मिक कट्टरवाद और 'भूमि-पुत्र सिद्धांत’ (गैर-स्वदेशी समूहों को निवास और रोज़गार के अधिकारों के प्रति आक्रामक रुख) से भी उत्पन्न हुआ है।
      • पर्यावरण और विकास से प्रेरित विस्थापन: तीव्र आर्थिक विकास प्राप्त करने हेतु भारत ने औद्योगिक परियोजनाओं, बाँधों, सड़कों, खानों, बिजली संयंत्रों और नए शहरों में निवेश किया है जो केवल बड़े पैमाने पर भूमि के अधिग्रहण और लोगों के विस्थापन के माध्यम से ही संभव हुआ है।

आगे की राह

  • नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता: समावेशी वृद्धि एवं विकास सुनिश्चित करने और संकट प्रेरित प्रवास को कम करने हेतु भारत को प्रवास केंद्रित नीतियों, रणनीतियों और संस्थागत तंत्र तैयार करने की आवश्यकता है।
  • न्याय प्रदान करना: केंद्र सरकार को आंतरिक रूप से विस्थापित आबादी (कम वेतन वाला, असुरक्षित या खतरनाक काम; अवैध व्यापार और महिलाओं और बच्चों की यौन शोषण आदि के प्रति अत्यधिक सुभेद्यता) जो अपर्याप्त आवास के मुद्दों से जूझ रही है, के लिये सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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