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भारतीय अर्थव्यवस्था

RBI की मौद्रिक नीति की समीक्षा

  • 06 Aug 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

मौद्रिक नीति, मौद्रिक नीति के साधन, LAF, SLR, CRR, RRR, RR, MSF, MSS, OMO

मेन्स के लिये:

मौद्रिक नीति

चर्चा में क्यों?

हाल ही में हुई ‘मौद्रिक नीति समिति’ (Monetary Policy Committee) की बैठक में ‘भारतीय रिज़र्व बैंक’ (Reserve Bank of India- RBI) ने मौद्रिक नीतिगत दरों को यथावत बनाए रखने का निर्णय लिया है। 

प्रमुख बिंदु:

  • MPC ने रेपो दर (Repo Rate) को 4% पर, सीमांत स्थायी सुविधा दर (Marginal Standing Facility Rate) और बैंक दर (Bank Rate) को  भी 4.25% पर यथावत बनाए रखने का निर्णय लिया है। 

आयात में कमी:

  • कमज़ोर घरेलू मांग और कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण जून में आयात में तेज़ी से कमी देखी गई है। 

विदेशी मुद्रा भंडार:

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (31 जुलाई, 2020 तक) 56.8 बिलियन डॉलर की वृद्धि के साथ वर्तमान में 536.6 बिलियन डॉलर है।

वास्तविक जीडीपी:

  • वर्ष 2020-21 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि के नकारात्मक रहने का अनुमान है तथा पहली छमाही में इसके संकुचित (Contraction) रहने का अनुमान है।

मांग पर प्रभाव:

  • जुलाई माह का उपभोक्ता सर्वेक्षण बताता है कि उपभोक्ताओं का अर्थव्यवस्था में विश्वास काफी निराशावादी है, इसलिये मांग के बुरी तरह प्रभावित रहने का अनुमान है।

उच्च-आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक:

  • अप्रैल और मई की कुछ आर्थिक गतिविधियों को लॉकडाउन के बाद पुन: प्रारंभ किया गया है जिससे ‘उच्च-आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतकों’ में कुछ सुधार देखने को मिला। 
  • लेकिन महामारी के संक्रमण के फिर से बढ़ने से अनेक क्षेत्रों में पुन: लॉकडाउन लगाया गया जिससे आर्थिक संकेतकों में देखा गया सुधार समाप्त हो गया। 

उच्च-आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक (High-frequency Economic Indicators):

  • यह विभिन्न आर्थिक गतिविधियों का एक सूचकांक होता है । ये संकेतक नीति निर्माताओं को आर्थिक गतिविधियों से संबंधित आवश्यक जानकारी प्रदान करते हैं जिनके आधार पर वार्षिक और तिमाही जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगाया जाता है। 

मौद्रिक नीति का लक्ष्य:

  • मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक वृद्धि को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना होता है। मूल्य स्थिरता स्थायी विकास के लिये एक आवश्यक है।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम-1934 के अनुसार, भारत सरकार RBI से परामर्श करके प्रत्येक पाँच वर्षों में एक बार मुद्रास्फीति लक्ष्य को निर्धारित करेगी।
  •  केंद्र सरकार ने इसे 'उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (CPI) के अनुसार, 5 अगस्त, 2016 से 31 मार्च, 2021 की अवधि के लिये 4 प्रतिशत निर्धारित किया है।  जिसकी ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत और निम्न सीमा 2 प्रतिशत है।

मौद्रिक नीति के साधन:

  • ऐसे कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उपकरण हैं जिनका उपयोग मौद्रिक नीति को लागू करने के लिये किया जाता है।

रेपो दर (Repo Rate-RR):

  • वह स्थिर ब्याज दर जिस पर RBI, बैंकों को 'तरलता समायोजन सुविधा' (LAF) के तहत सरकार और अन्य स्वीकृत प्रतिभूतियों की संपार्श्विक (Collateral) के अधीन ओवरनाइट (अल्पकालिक तरलता) तरलता प्रदान करता है।

रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate-RRR):

  • वह स्थिर ब्याज दर जिस पर रिज़र्व बैंक LAF के तहत पात्र सरकारी प्रतिभूतियों के संपार्श्विक (Collateral) के खिलाफ बैंकों से ओवरनाइट तरलता को अवशोषित करता है।

तरलता समायोजन सुविधा (Liquidity Adjustment Facility-LAF):

  • LAF में ओवरनाइट तरलता के साथ-साथ टर्म रेपो की नीलामी भी शामिल है। 

सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility- MSF):

  • वह सुविधा जिसके तहत अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक अपने ‘वैधानिक तरलता अनुपात’ (SLR) पोर्टफोलियो में तक निश्चित सीमा तक कमी (Dipping) करके  ओवरनाइट सुविधा के तहत अतिरिक्त राशि उधार ले सकते हैं।

बैंक दर (Bank Rate):

  • जिस सामान्य ब्याज दर पर रिज़र्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को पैसा उधार दिया जाता है उसे बैंक दर कहते हैं। इसके द्वारा रिज़र्व बैंक साख नियंत्रण (Credit Control) का काम करता है।
  • इस दर को MSF दर से संरेखित किया गया है, अत: जब-जब नीति रेपो दर में बदलाव किया जाता है तब MSF दर में भी परिवर्तन होता है।

नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio- CRR):

  • प्रत्येक बैंक को अपने कुल नकद रिज़र्व का एक निश्चित हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है, जिसे नकद आरक्षित अनुपात कहा जाता है।

वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio- SLR):

  • शुद्ध माँग और समय देयताओं (NDTL) का हिस्सा जिसे एक बैंक को सुरक्षित और तरल संपत्ति में बनाए रखने की आवश्यकता होती है।  जैसे कि सरकारी प्रतिभूतियाँ, नकदी और सोना।

खुले बाज़ार के परिचालन (Open Market Operations- OMO):

  • इनमें स्थायी तरलता को बढ़ाने और अवशोषण के लिये क्रमशः सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री दोनों शामिल हैं।

बाज़ार स्थिरीकरण योजना (Market Stabilisation Scheme- MSS):

  • अधिक स्थायी अधिशेष तरलता को लघु-दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों और ट्रेजरी बिलों की बिक्री के माध्यम से अवशोषित किया जाता है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC):

  • MPC का गठन नीतिगत ब्याज दर निर्धारण को अधिक उपयोगी एवं पारदर्शी बनाने के लिये जून, 2016 को किया गया था। 
  • वित्त अधिनियम 2016 द्वारा रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम-1934  में संशोधन किया गया, ताकि मौद्रिक नीति समिति को वैधानिक और संस्थागत रूप प्रदान किया जा सके।
  • मौद्रिक नीति समिति के छह सदस्यों में से तीन सदस्य RBI से होते हैं। 
  • RBI गवर्नर, समिति का पदेन अध्यक्ष होता है। 

स्रोत: द हिंदू

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