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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन

  • 28 Jan 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन, चीन-मध्य एशिया सम्मेलन, दिल्ली घोषणा, अश्गाबात समझौता, शंघाई सहयोग संगठन, भारत-मध्य एशिया संवाद।

मेन्स के लिये:

वैश्विक समूह, भारत और उसका पड़ोस, भारत के लिये मध्य एशिया का महत्त्व, क्षेत्र की भू-राजनीतिक गतिशीलता।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने आभासी प्रारूप में पहले भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन की मेजबानी की।

  • इसमें कज़ाखस्तान गणराज्य, किर्गिज़ गणराज्य, ताजिकिस्तान गणराज्य, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान गणराज्य के राष्ट्रपतियों ने भाग लिया।
  • यह पहल भारत-मध्य एशिया सम्मेलन भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 30वीं वर्षगाँठ के साथ मेल खाता है।
  • यह शिखर सम्मेलन चीन-मध्य एशिया सम्मेलन के दो दिन बाद हुआ था, जिसमें चीन ने सहायता के तौर पर 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की पेशकश की थी और प्रतिवर्ष लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर के वर्तमान स्तर से व्यापार को 70 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने का वादा किया था।

प्रमुख बिंदु:

  • शिखर सम्मेलन का संस्थानीकरण:
    • इस सम्मेलन में भारत-मध्य एशिया संबंधों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के अगले कदमों पर चर्चा की गई एवं, नेताओं ने हर 2 साल में इसे आयोजित करने का एतिहासिक निर्णय लेकर शिखर सम्मेलन तंत्र को संस्थागत बनाने पर सहमति व्यक्त की।
    • शिखर सम्मेलन की बैठकों के लिये आधार तैयार करने हेतु विदेश मंत्रियों, व्यापार मंत्रियों, संस्कृति मंत्रियों और सुरक्षा परिषद के सचिवों की नियमित बैठकों पर भी सहमति व्यक्त की गई।
    • नए तंत्र का समर्थन करने के लिये नई दिल्ली में एक भारत-मध्य एशिया सचिवालय स्थापित किया जाएगा।
  • भारत-मध्य एशिया सहयोग:
    • नेताओं ने व्यापार और संपर्क, विकास सहयोग, रक्षा व सुरक्षा के क्षेत्रों में और विशेष रूप से सांस्कृतिक एवं  लोगों से लोगों के बीच संपर्क के क्षेत्रों में सहयोग के लिये दूरगामी प्रस्तावों पर चर्चा की। इनमें शामिल हैं:
      • ऊर्जा और संपर्क पर गोलमेज बैठक। 
      • अफगानिस्तान और चाबहार बंदरगाह के इस्तेमाल पर वरिष्ठ आधिकारिक स्तर पर संयुक्त कार्य समूह।
      • मध्य एशियाई देशों में बौद्ध प्रदर्शनी और सामान्य शब्दों का भारत-मध्य एशिया शब्दकोश। 
      • संयुक्त आतंकवाद विरोधी अभ्यास। 
      • मध्य एशियाई देशों से भारत में हर साल 100 सदस्यीय युवा प्रतिनिधिमंडल की यात्रा और मध्य एशियाई राजनयिकों के लिये विशेष पाठ्यक्रम।
    • नेताओं द्वारा एक व्यापक संयुक्त घोषणा को अपनाया गया जो एक स्थायी और व्यापक भारत-मध्य एशिया साझेदारी के लिये उनके सामान्य दृष्टिकोण की गणना करता है।
  • अफगानिस्तान:
    • नेताओं ने एक वास्तविक प्रतिनिधि और समावेशी सरकार के साथ शांतिपूर्ण, सुरक्षित एवं  स्थिर अफगानिस्तान के लिये अपने मज़बूत समर्थन को दोहराया।
    • भारत ने अफगान लोगों को मानवीय सहायता प्रदान करने की अपनी निरंतर प्रतिबद्धता से अवगत कराया।
  • भारत का रुख:
    • कज़ाखस्तान: यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिये एक महत्त्वपूर्ण भागीदार बन गया है। भारत ने हाल ही में कज़ाखस्तान में हुए जन-धन के नुकसान पर भी संवेदना व्यक्त की।
    • उज़्बेकिस्तान: भारत की राज्य सरकारें भी उज़्बेकिस्तान के साथ इसके बढ़ते सहयोग में सक्रिय भागीदार हैं।
    • ताजिकिस्तान: सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों का पुराना सहयोग रहा है।
    • तुर्कमेनिस्तान: यह क्षेत्रीय संपर्क के क्षेत्र में भारतीय दृष्टिकोण का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जो अश्गाबात समझौते में भागीदारी से स्पष्ट है।
      • मध्य एशिया में क्षेत्रीय संपर्क अश्गाबात समझौता 2018 का एक प्रमुख अंग है।

भारत के लिये शिखर सम्मेलन का महत्त्व

  • भू-राजनीतिक गतिशीलता:
    • यह शिखर सम्मेलन भारत तथा मध्य एशियाई देशों के नेताओं द्वारा एक व्यापक और स्थायी भारत-मध्य एशिया साझेदारी के महत्त्व का प्रतीक है।
    • यह एक ऐसे महत्त्वपूर्ण समय पर आयोजित किया जा रहा है जब पश्चिम और रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) व चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है। भारत को भी भू-राजनीतिक परिणामों का सामना करना पड़ा है जैसे चीन के साथ सीमा तनाव तथा अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा।
    • यह राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा का अनुसरण करता है जो भारत को यूरेशिया में चीन को संतुलित करने और अफगानिस्तान से खतरों को रोकने के लिये महत्त्वपूर्ण हो सकता है
    • कज़ाखस्तान में हालिया अशांति ने यह भी प्रदर्शित किया है कि "नए अभिनेता" इस क्षेत्र में प्रभाव के लिये होड़ में हैं, हालाँकि उनके इरादे अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।
  • व्यापार:
    • भारत ने हमेशा सभी पाँच मध्य एशियाई राज्यों के साथ उत्कृष्ट राजनयिक संबंध बनाए रखा है, वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका दौरा किया है। फिर भी उनके साथ भारत का व्यापार वर्ष 2019 में केवल 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर ही रहा है।
    • वर्ष 2017 में भारत इस क्षेत्र के साथ जुड़ने के लिये शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में शामिल हो गया। लेकिन SCO में शामिल होना रूस एवं चीन जैसे प्रतिद्वंद्विता को नियंत्रित करने के लिये केवल एक रास्ता है ताकि किसी भी शक्ति को इस क्षेत्र पर हावी होने से रोका जा सके।
      • रूस, भारत-चीन तनाव को नियंत्रित करने के लिये SCO का उपयोग करता है।
  • सुरक्षा:
    • शिखर सम्मेलन भारत की कूटनीति के लिये एक बड़ा कदम है। चूँकि यह क्षेत्र भारत की सुरक्षा नीति हेतु अधिक महत्त्वपूर्ण है, इसलिये इस क्षेत्र के प्रति भारत के बहुआयामी दृष्टिकोण को सुविधाजनक बनाने हेतु शिखर सम्मेलन का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होगा।

भारत-मध्य एशिया वार्ता:

Central-Asia

  • यह भारत और मध्य एशियाई देशों जैसे- कज़ाखस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान व उज़्बेकिस्तान के बीच एक मंत्री स्तरीय संवाद है।
  • शीत युद्ध के पश्चात् वर्ष 1991 में USSR के पतन के बाद सभी पाँच राष्ट्र स्वतंत्र राज्य बन गए।
  • तुर्कमेनिस्तान को छोड़कर वार्ता में भाग लेने वाले सभी देश शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य हैं।
  • बातचीत कई मुद्दों पर केंद्रित है जिसमें कनेक्टिविटी में सुधार और युद्ध से तबाह अफगानिस्तान में स्थिरता संबंधी उपाय शामिल है।

आगे की राह

  • भारत को सबसे पहले इस क्षेत्र की अपनी ‘बिग पिक्चर इमेजिनेशन’ को सही करने की आवश्यकता है। मध्य एशिया निस्संदेह भारत के सभ्यतागत प्रभाव का क्षेत्र है।
    • फरगना घाटी ‘ग्रेट सिल्क रोड’ में भारत का क्रॉसिंग-पॉइंट था। यहीं से बौद्ध धर्म शेष एशिया में फैल गया।
    • घाटी अभी भी भारत को तीन देशों से जोड़ती है: उज्बेकिस्तान, किर्गिजस्तान और ताजिकिस्तान।
  • जब अन्य देश अपने दृष्टिकोण से इस क्षेत्र के साथ जुड़ते हैं, जैसे- आर्थिक (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से चीन), सामरिक (सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन से रूस), जातीय (तुर्क परिषद से तुर्की )और धार्मिक से इस्लामी विश्व, तब शिखर स्तरीय वार्षिक बैठक के माध्यम से इस क्षेत्र को सांस्कृतिक व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देना भारत के लिये उपयुक्त होगा।
  • रूस के अपवाद के साथ मध्य एशिया का किसी भी देश के प्रति कोई विशेष रुख नहीं है जबकि जिन देशों के रणनीतिक दृष्टिकोण अक्सर अपारदर्शी होते हैं, वे चीन से सावधान रहते हैं।
  • हालाँकि भारत पर बहुत कम या बिल्कुल भी आर्थिक निर्भरता की तुलना में उनके चीन के साथ मज़बूत आर्थिक संबंध हैं।
  • पाकिस्तान के प्रति या तो जनसंख्या के क्रमिक इस्लामीकरण के कारण या शायद पाकिस्तान के प्रति रूस के बदले हुए रवैये के कारण इस क्षेत्र का नकारात्मक रवैया कम हो रहा है,।
  • पीढ़ीगत बदलाव के साथ भारत की सॉफ्ट पावर फीकी पड़ रही है। इसको रोकने की ज़रूरत है। वाणिज्य के अलावा केवल एक मूल्य-संचालित सांस्कृतिक नीति ही भारत-मध्य एशिया बंधनों के पुनर्निर्माण के वर्तमान अपरिभाषित लक्ष्यों को प्रतिस्थापित कर सकती है।

स्रोत- पी.आई.बी

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