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सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के लिये अपर्याप्त फंड

  • 01 Jan 2019
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?


हाल ही में 6 राज्यों में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य सरकारों द्वारा विद्यालयी शिक्षा हेतु बजट में वृद्धि किये जाने के बावजूद फंडों का आवंटन ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों की तरफ स्थायी शिक्षित अध्यापकों को आकर्षित किया जा सके।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • इस अध्ययन रिपोर्ट को Child Rights and You (CRY) एवं The Centre for Budget and Governance Accountability (CBGA) ने मिलकर तैयार किया है।
  • अप्रैल 2015 में शुरू हुए 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा अवधि के दौरान इसने छ: राज्यों, यथा- पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं महाराष्ट्र में स्कूली शिक्षा हेतु बजट का परीक्षण किया।

रिपोर्ट की मुख्य बातें

  • अध्ययन में पाया गया है कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद राज्यों के राजस्व में समग्र वृद्धि हुई है।
  • यह केंद्रीय करों के विभाज्य पूल (Divisible Pool) में राज्यों की हिस्सेदारी में 32 से 42 प्रतिशत की वृद्धि का परिणाम थी।
  • इसी समय सामाजिक क्षेत्र में केंद्रीय योजनाओं के लिये राज्यों हेतु केंद्र सरकार के योगदान में कमी ने राज्यों को अपने कर राजस्व संग्रह में सुधार करने के लिये मजबूर किया।
  • यह अध्ययन विश्लेषित करता है कि इन छ: राज्यों में अतिरिक्त फंड की उपलब्धता को स्कूली शिक्षा को प्राथमिकता देने में उपयोग किया गया या नहीं।
  • अनुदान और राज्य के बजट दस्तावेज़ों की विस्तृत मांग के अनुसार 2015-17 और 2017-18 के बीच इन 6 राज्यों में से 3 राज्यों के कुल राज्य बजट में स्कूली शिक्षा के हिस्से में शुद्ध गिरावट देखी गई।
  • बिहार में यह गिरावट 3.1 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 1 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल में 0.9 प्रतिशत देखने को मिली है।
  • दूसरी तरफ छत्तीसगढ़, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा के बजट के आकार में क्रमश: 0.4 प्रतिशत, 2.6 प्रतिशत और 3.2 प्रतिशत वृद्धि देखी गई।
  • उत्तर प्रदेश में स्कूली बजट में 98.8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जबकि कुल बजट में वृद्धि 63.3 प्रतिशत थी।
  • पश्चिम बंगाल के स्कूली बजट में 49.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि उसके कुल बजट में 48.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। ये तथ्य दर्शाते हैं कि इन राज्यों में स्कूली शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
  • साथ ही हम पाते हैं कि सभी छ: राज्यों ने 2014-15 और 2016-17 के बीच शिक्षा के लिये प्रति बच्चे और प्रति छात्र खर्च की मात्रा में वृद्धि दर्ज कराई है।
  • ये छ: राज्य स्कूली शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद शिक्षकों की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं।
  • मार्च 2017 तक पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में प्राथमिक स्तर पर कुल शिक्षकों की 19 प्रतिशत से 34 प्रतिशत सीटें रिक्त थीं। महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु क्रमश: 5.9 प्रतिशत एवं 2.6 प्रतिशत रिक्त सीटों के साथ थोड़ी बेहतर स्थिति में थे।
  • District Information System for Education से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, उच्च प्राथमिक स्तर पर विषय-विशेष के शिक्षकों की गंभीर कमी पाई गई है जो शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत ज़रूरी बताए गए हैं।
  • उच्च प्राथमिक स्तर पर देखने पर हम पाते हैं कि महाराष्ट्र में 77 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 46 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 40 प्रतिशत और बिहार में 37 प्रतिशत विषय-विशेष शिक्षकों की कमी है।
  • भारत में 1 लाख से ज़्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं एवं इन 6 राज्यों के सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि ऐसे स्कूलों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
  • शिक्षकों की कमी द्वितीयक स्तर पर और गंभीर है- बिहार में 20,494, छत्तीसगढ़ में 8,278 और उत्तर प्रदेश में 12,008 शिक्षकों के पद खाली हैं।
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