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जैव विविधता और पर्यावरण

प्रभावी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिये हरित पहल

  • 06 Apr 2022
  • 14 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्रकृति, सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उन्मूलन पर राष्ट्रीय डैशबोर्ड, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व पोर्टल, ग्राफीन, प्लास्टिक अपशिष्ट और संबंधित पहल।

मेन्स के लिये:

संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट, सरकारी नीतियांँ और हस्तक्षेप, प्लास्टिक अपशिष्ट एवं संबंधित पहल।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री (MoEFCC) द्वारा प्रभावी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन पर जागरूकता हेतु शुभंकर 'प्रकृति' (Prakriti) और हरित पहल (Green Initiatives) का शुभारंभ किया गया।

  • शुभंकर जनता के बीच छोटे बदलावों के बारे में अधिक जागरूकता बढ़ाएगा जिन्हें बेहतर पर्यावरण के लिये हमारी जीवनशैली में स्थायी रूप से अपनाया जा सकता है।
  • इससे पहले फरवरी में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2022 की घोषणा की थी।

प्रमुख बिंदु 

शुरू की गई हरित पहल:

  • MoEFCC द्वारा सिंगल यूज़ प्लास्टिक (Single Use Plastic- SUP) और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के उन्मूलन पर राष्ट्रीय डैशबोर्ड केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों, राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों की सरकारों सहित सभी हितधारकों को एक स्थान पर लाने और सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उन्मूलन तथा प्लास्टिक कचरे के प्रभावी प्रबंधन के लिये हुई प्रगति को ट्रैक कराना।
  • प्लास्टिक पैकेजिंग के लिये जवाबदेही सुनिश्चित करने, ट्रैक करने की क्षमता, पारदर्शिता और उत्पादकों, आयातकों व ब्रांड-मालिकों के माध्यम से EPR दायित्वों के अनुपालन को सुविधाजनक बनाने हेतु, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility- EPR) पोर्टल को लॉन्च किया गया
  • नागरिकों को अपने क्षेत्र में एसयूपी की बिक्री/उपयोग/विनिर्माण की जांँच करने और प्लास्टिक के खतरे से निपटने में सक्षम बनाने के लिये CPCB द्वारा एकल उपयोग प्लास्टिक शिकायत निवारण हेतु मोबाइल एप।
  • ज़िला स्तर पर वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में एसयूपी उत्पादन/बिक्री और उपयोग के विवरण की सूची बनाने व एसयूपी पर प्रतिबंध को लागू करने को लेकर स्थानीय निकायों, एसपीसीबी/पीसीसी तथा सीपीसीबी हेतु एसयूपी (सीपीसीबी) के लिये निगरानी मॉड्यूल।
  • प्लास्टिक कचरे के पुनर्चक्रण हेतु आगे आने और अधिक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संस्थान तथा राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम द्वारा अपशिष्ट प्लास्टिक से ग्राफीन का औद्योगिक उत्पादन।

प्लास्टिक अपशिष्ट:

  • कागज़, खाद्यान्नों के छिलके, पत्ते आदि जैसे कचरे के अन्य रूप जो प्रकृति में बायोडिग्रेडेबल (बैक्टीरिया या अन्य जीवित जीवों द्वारा विघटित होने में सक्षम) होते हैं, के विपरीत प्लास्टिक कचरा अपनी गैर-बायोडिग्रेडेबल प्रकृति के कारण सैकड़ों (या हज़ारों) वर्षों तक पर्यावरण में बना रहता है
  • प्लास्टिक प्रदूषण, पर्यावरण में प्लास्टिक कचरे/अपशिष्ट के जमा होने के कारण होता है। इसे प्राथमिक प्लास्टिक जैसे- सिगरेट बट्स और बोतलों के ढक्कन अथवा द्वितीयक प्लास्टिक, जो प्राथमिक प्लास्टिक के क्षरण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है, के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  • वर्तमान समय में प्लास्टिक हमारे समक्ष उत्पन्न सबसे अधिक दबाव वाले पर्यावरणीय मुद्दों में से एक बन गया है।
    • भारत सालाना लगभग 3.5 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा कर रहा है और प्रति व्यक्ति प्लास्टिक कचरा उत्पादन पिछले पांँच वर्षों में लगभग दोगुना हो गया है।
  • प्लास्टिक प्रदूषण हमारे इको-सिस्टम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और वायु प्रदूषण से भी जुड़ा हुआ है।

प्लास्टिक अपशिष्ट के प्रबंधन में चुनौतियाँ:

  • प्लास्टिक अपशिष्ट का अव्यवस्थित प्रबंधन (प्लास्टिक को खुले तौर पर फेंक दिया जाता है): माइक्रोप्लास्टिक/माइक्रोबीड्स के रूप में प्लास्टिक अंतर्देशीय जलमार्गों, अपशिष्ट जल के बहिर्वाह और वायु या ज्वार द्वारा परिवहन के माध्यम से पर्यावरण में प्रवेश करते हैं तथा एक बार समुद्र में प्रवेश करने के बाद इन अपशिष्टों को फिल्टर नहीं किया जा सकता है।
    • प्लास्टिक समुद्री धाराओं के साथ प्रवाहित होने के परिणामस्वरूप ही ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच नामक एक द्वीप का निर्माण इन अपशिष्टों के कारण हुआ है।
  • अप्रमाणिक बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक: उत्पादकों द्वारा किये गए दावों को सत्यापित करने के लिये ठोस परीक्षण और प्रमाणन के अभाव में नकली बायोडिग्रेडेबल व कंपोस्टेबल प्लास्टिक बाज़ार में प्रवेश कर रहे हैं।
  • ऑनलाइन या ई-कॉमर्स कंपनियाँ: पारंपरिक रूप से हम खुदरा बाज़ार में प्लास्टिक का उपयोग करते हैं लेकिन ऑनलाइन रिटेल एवं खाद्य वितरण एप की लोकप्रियता ने प्लास्टिक अपशिष्ट की वृद्धि में योगदान दिया है भले ही यह बड़े शहरों तक सीमित है।
  • माइक्रोप्लास्टिक्स: जलीय वातावरण में प्रवेश करने के बाद माइक्रोप्लास्टिक्स समुद्री जल में तैरते हुए या तलछट से समुद्र तल तक बड़ी दूरी तक यात्रा कर सकते हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि वातावरण में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक बादलों और गिरती बर्फ में फंँस जाते हैं।
    • माइक्रोप्लास्टिक कण आमतौर पर सफेद या अपारदर्शी होते हैं, जिन्हें सतह पर रहने वाली कई मछलियों द्वारा भोजन (प्लवक) के रूप में गलती से उपभोग किया जाता है, जिसके कारण यह खाद्य शृंखला का हिस्सा बनकर मानव उपभोक्ताओं (दूषित मछली/समुद्री भोजन/शेलफिश के माध्यम से) तक पहुँचता है।
  • समुद्री कचरा: मीठे पानी और समुद्री वातावरण में प्लास्टिक प्रदूषण को एक वैश्विक समस्या के रूप में पहचाना गया है और यह अनुमान लगाया गया है कि प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री प्लास्टिक कचरे का 60-80% हिस्सा है।
  • स्थलीय प्लास्टिक: 80% प्लास्टिक प्रदूषण भूमि-आधारित स्रोतों से उत्पन्न होता है और शेष समुद्र-आधारित स्रोतों (मछली पकड़ने के जाल, मछली पकड़ने की रस्सी) से उत्पन्न होता है।

अन्य संबंधित पहल क्या हैं?

आगे की राह

  • व्यवहार में परिवर्तन लाने हेतु शिक्षा एवं आउटरीच कार्यक्रमों के माध्यम से प्लास्टिक प्रदूषण से होने वाले नुकसान के विषय में जनता के बीच जागरूकता बढ़ाना महत्त्वपूर्ण है।
  • इससे ‘यूज़ एंड थ्रो’ प्लास्टिक के विकल्प तलाशने और उत्पादकों, कचरा बीनने वालों तथा व्यवसाय से जुड़े अन्य समूहों के लिये वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित करने से संबंधित समस्या का समाधान हो सकेगा।
  • सरकार को न केवल दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करने हेतु जुर्माना लगाना चाहिये, बल्कि कचरा फैलाने वाले उत्पादकों को अधिक टिकाऊ उत्पादों के साथ स्विच करने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिये। उचित निगरानी के साथ-साथ उत्तरदायी उपभोक्तावाद को बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है।
  • व्यापक खरीद सुनिश्चित करने के लिये खुदरा विक्रेताओं, उपभोक्ताओं, उद्योग प्रतिनिधियों, स्थानीय सरकार, निर्माताओं, नागरिक समाज, पर्यावरण समूहों और पर्यटन संघों जैसे प्रमुख हितधारक समूहों को पहचान करने और उन्हें संलग्न किये जाने की आवश्यकता है।
  • नागरिकों को भी व्यवहार में बदलाव लाना होगा और कचरा न फैलाकर तथा अपशिष्ट पृथक्करण एवं अपशिष्ट प्रबंधन में मदद करके योगदान देना होगा।

विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न. ‘बिस्फेनॉल-ए’ (BPA), जो कि एक चिंता का कारण है, निम्नलिखित में से किस प्रकार के प्लास्टिक के उत्पादन में एक संरचनात्मक/मुख्य घटक है?

(a) कम घनत्व वाली पॉलीथीन
(b) पॉली कार्बोनेट
(c) पॉलीथीन टेरेफ्थेलेट
(d) पॉलीविनाइल क्लोराइड

उत्तर: (b)

  • ‘बिस्फेनॉल-ए’ (BPA) बड़ी मात्रा में उत्पादित एक रसायन है, जो कि मुख्य रूप से पॉली कार्बोनेट प्लास्टिक और एपॉक्सी रेज़िन के उत्पादन में उपयोग किया जाता है।
  • पॉली कार्बोनेट प्लास्टिक के कुछ खाद्य एवं पेय पैकेजिंग में उपयोग सहित कई अनुप्रयोग हैं, उदाहरण- पानी की बोतलें, कॉम्पैक्ट डिस्क, प्रभाव प्रतिरोधी सुरक्षा उपकरण और चिकित्सा उपकरण।
  • एपॉक्सी रेज़िन का उपयोग खाद्य पदार्थों के डिब्बे, बोतल के टॉप और पानी की आपूर्ति पाइप जैसे धातु उत्पादों को कोट करने हेतु लाख के रूप में किया जाता है। कुछ दंत सीलेंट और कंपोज़िट भी BPA के प्रति सुभेद्यता में योगदान दे सकते हैं।

प्रश्न: पर्यावरण में छोड़े जाने वाले 'माइक्रोबीड्स' को लेकर इतनी चिंता क्यों है? (2019)

(a) उन्हें समुद्री पारिस्थितिक तंत्र हेतु हानिकारक माना जाता है।
(b) उन्हें बच्चों में त्वचा कैंसर का कारण माना जाता है।
(c) वे सिंचित क्षेत्रों में फसल पौधों द्वारा अवशोषित करने हेतु काफी छोटे हैं।
(d) वे अक्सर खाद्य अपमिश्रण के रूप में उपयोग किये जाते हैं।

उत्तर: (a)

  • माइक्रोबीड्स छोटे, ठोस प्लास्टिक के कण होते हैं जो 5 मिमी से कम आकार के होते हैं और पानी में जल्दी नहीं घुलते हैं।
  • मुख्य रूप से पॉलीइथाइलीन से बने माइक्रोबीड्स को पेट्रोकेमिकल प्लास्टिक जैसे पॉलीस्टाइनिन और पॉलीप्रोपाइलीन से भी तैयार किया जा सकता है। उन्हें उत्पादों की एक ऐसी शृंखला में जोड़ा जा सकता है, जिसमें सौंदर्य प्रसाधन, व्यक्तिगत देखभाल और साफ-सफाई उत्पाद शामिल हैं।
  • माइक्रोबीड्स, अपने छोटे आकार के कारण सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम से अनुपचारित होकर गुज़रते हैं और जल निकायों तक पहुँच जाते हैं। जल निकायों में अनुपचारित माइक्रोबीड्स समुद्री जानवरों द्वारा ग्रहण किये जाते हैं, इस प्रकार विषाक्तता पैदा करते हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाते हैं।

स्रोत: पी.आई.बी.

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