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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च

  • 22 Jun 2021
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च, SARS-CoV-2

मेन्स के लिये:

गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

कहा जा रहा है कि ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ ने कोरोनवायरस पर ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च किया जो संभवतः SARS-CoV-2 (कोविड -19 महामारी) के लैब-रिसाव की उत्पत्ति का कारण हो सकता है।

प्रमुख बिंदु:

‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च

  • वायरोलॉजी के अंतर्गत ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च में प्रयोगशाला में एक जीव को जान-बूझकर बदलना, एक जीन को बदलना या एक रोगज़नक में उत्परिवर्तन की शुरुआत करना शामिल है ताकि इसकी संप्रेषणीयता, विषाणु और प्रतिरक्षात्मकता का अध्ययन किया जा सके। 
  • यह कार्य वायरस को आनुवंशिक रूप से विभिन्न विकास माध्यमों में बढ़ने की अनुमति देकर किया जाता है, इस तकनीक को ‘सीरियल पैसेज’ कहा जाता है।
    • ‘सीरियल पैसेज’ से तात्पर्य बैक्टीरिया या वायरस के पुनरावृत्तियों में बढ़ने की प्रक्रिया से है। उदाहरण के लिये वायरस को एक वातावरण में उत्पन्न करना और फिर उस वायरस की आबादी के एक हिस्से को हटाकर एक नए वातावरण में रखा जाना।

महत्त्व:

  • यह शोधकर्त्ताओं को संभावित उपचारों और भविष्य में रोग को बेहतर ढंग से नियंत्रित करने के तरीकों का अध्ययन करने की अनुमति देगा।
  • टीके के विकास के लिये ‘गेन-ऑफ-फंक्शन अध्ययन’ जो ‘वायरल यील्ड’ और इम्यूनोजेनेसिटी (प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से संबंधित) को बढ़ाता है, आवश्यक है।

मुद्दे:

  • ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ अनुसंधान में परिचालन भी शामिल हैं जो कुछ रोगजनक रोगाणुओं को अधिक घातक या पारगम्य बनाते हैं।
  • एक शोध का नाम 'लॉस-ऑफ-फंक्शन' भी है, जिसमें निष्क्रिय उत्परिवर्तन शामिल हैं, जिसके परिणामस्वरूप मूल में महत्त्वपूर्ण हानि होती है या रोगजनक को कोई कार्य नहीं होता है।
    • जब उत्परिवर्तन होते हैं, तो वे वायरस की उस संरचना को बदल देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उत्परिवर्तन होता है, यह  वायरस को कमज़ोर कर सकता है या इसके कार्य करने की दर को बढ़ा सकता है।
  • गेन-ऑफ-फंक्शन अनुसंधान में कथित तौर पर निहित जैव सुरक्षा और जैव सुरक्षा जोखिम होते हैं और इस प्रकार इसे 'चिंता के दोहरे उपयोग अनुसंधान' (DURC) के रूप में संदर्भित किया जाता है।
    • यह इंगित करता है कि जहाँ अनुसंधान से मानवता के लिये लाभ हो सकता है, वहीं नुकसान की भी संभावना है - प्रयोगशालाओं से इन परिवर्तित रोगजनकों के आकस्मिक या उन्हें जान-बूझकर दूर करने से भी महामारी हो सकती है (जैसा कि कोविड -19 के मामले में कहा जाता है) 

भारत में स्थिति:

  • आनुवंशिक जीवों या कोशिकाओं और खतरनाक सूक्ष्मजीवों तथा उत्पादों से संबंधित सभी गतिविधियों को "खतरनाक सूक्ष्मजीवों/आनुवंशिक जीवों या कोशिकाओं के निर्माण, उपयोग, आयात, निर्यात एवं भंडारण नियम, 1989" के अनुसार विनियमित किया जाता है।
  • 2020 में जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने 'जैव सुरक्षा प्रयोगशाला' नामक नियंत्रण सुविधाओं की स्थापना के लिये दिशा-निर्देश जारी किये।
    • अधिसूचना जैव खतरों की रोकथाम और जैव सुरक्षा के स्तर पर परिचालन मार्गदर्शन प्रदान करती है जिसका इन सूक्ष्मजीवों के अनुसंधान, विकास और प्रबंधन में शामिल सभी संस्थानों को पालन करना चाहिये।

गेन-ऑफ-फंक्शन पर बहस:

  • समर्थन में तर्क:
    • यह विज्ञान और सरकारों को भविष्य की महामारियों हेतु युद्ध के लिये तैयार करता है।
    • गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च के समर्थकों का मानना ​​है कि "प्रकृति सबसे बढ़ी जैव आतंकवादी है और हमें इससे एक कदम आगे रहने के लिये हर संभव प्रयास करने की आवश्यकता है"।
  • आलोचना:
    • कोविड -19 महामारी के बाद इस तरह के अनुसंधान को लेकर और अधिक चिंता जताई जा रही है।
    • यह जीवित चीज़ों के विलुप्त होने का कारण बन सकता है या उनके आनुवंशिक गुणों को हमेशा के लिये बदल सकता है।

आगे की राह:

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को DURC पर गतिविधियों का नेतृत्व करना चाहिये।
  • जैव-जोखिमों और संबद्ध नैतिक मुद्दों के शमन एवं रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीव विज्ञान से संबंधित अनुसंधान का ज़िम्मेदारी के साथ उपयोग होना चाहिये।
  • देशों द्वारा अनुसरण हेतु एक वैश्विक मार्गदर्शन ढाँचा विकसित करना।
  • इस तरह के शोध के बारे में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

स्रोत- द हिंदू

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