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सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अस्तित्व पर संकट एवं संभावित समाधान

  • 18 May 2018
  • 4 min read

संदर्भ 

जब पहली बार संकटग्रस्त सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संकीर्ण बैंकों (जो बड़े ऋण प्रदान नहीं कर सकते) में परिवर्तित करने का विचार प्रस्तुत किया गया था, तब इसका कार्यान्वयन नहीं किया गया था तथा इसे एक अनावश्यक और कठोर कदम माना गया था, जो नए क्रेडिट प्रवाह को संकुचित कर सकता था और संवृद्धि को धीमा कर सकता था।

प्रमुख बिंदु

  • नवीनतम वित्तीय परिणामों की घोषणा के साथ एक चुनौतीपूर्ण तस्वीर उभर कर सामने आ रही है। 
  • देना बैंक और इलाहबाद बैंक को आरबीआई द्वारा नए ऋण प्रदान करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
  • इन दोनों बैंकों सहित 11 बैंकों को पहले ‘तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई’ (prompt corrective action) के अंतर्गत रखा गया था, जिसने इन्हें प्रभावी रूप से संकीर्ण बैंक बना दिया था।
  • इस बात के कोई भी संकेत दिखाई नहीं देते कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक विवेकपूर्वक ऋण प्रदान करने के संदर्भ में शीघ्र ही जनता का विश्वास हासिल कर पाएंगे, अतः हमें जल्द ही देश के बैंकिंग परिदृश्य में मूलभूत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
  • अंतिम रूप से क्या बदलाव होंगे, यह अभी निश्चित नहीं है, लेकिन बड़े बदलावों की संभावनाएँ प्रबल हैं और इस हेतु कुछ उपाय भी सुझाए जा रहे हैं। 
  • एक सुझाव यह हो सकता है कि उन बुनियादी कार्यों की पहचान करें, जिन्हें बैंकों ने अब तक किया है तथा देखें कि उन्हें अलग तरीके से और व्यावहारिक रूप से और आसानी से कौन पूरा कर सकता है।
  • साथ ही बैंकों को कैश का प्राथमिक डिस्पेंसर बने रहने की आवश्यकता नहीं रह गई है और कई बैंकों ने यह कार्य बंद भी कर दिया है। 
  • वर्तमान में स्वतंत्र कंपनियों द्वारा ‘व्हाइट लेवल एटीएम’ (white label ATMs) चलाए जा रहे हैं जिनका स्वामित्त्व भी उन्हीं के पास होता है। 
  • वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को भी पॉइंट ऑफ सेल मशीनों के माध्यम से कैश प्रदान करने में सक्षम बनाना होगा।
  • यह तरीका खासकर ग्रामीण स्तर पर प्रभावशाली साबित हो सकता है, जहाँ स्थानीय किराना दुकानें कैश डिस्पेंसर का कार्य कर सकती हैं। इस कदम से एटीएम खोजने के लिए ग्रामीणों की काफी दूरी तय करने की आवश्यकता को दूर किया जा सकता है।
  • बैंकों को अब देश की भुगतान प्रणाली का मुख्य आधार होने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (The National Payments Corporation of India) ने इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली के प्रसार में काफी मदद की है। साथ ही इसने रुपे कार्ड भी पेश किया है। लगभग 250 मिलियन रुपे कार्ड जारी जा चुके हैं।
  • एनपीसीआई द्वारा संचालित ‘एकीकृत भुगतान इंटरफेस’ (unified payments interface) ने मोबाइल फोन के माध्यम से बैंकों के मध्य त्वरित भुगतान को सक्षम बना दिया है।
  • हालाँकि भुगतान बैंक, जो मूल बैंकिंग प्रणाली को जमीनी स्तर तक पहुँचाने के लिये बनाई गई थीं, वे अच्छी तरह से संचालित नहीं हो पाई हैं। 
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने धन जमा करने का काम बखूबी निभाया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपना योगदान दे सकते हैं।
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