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भारत में ई-वाहनों की स्वीकार्यता

  • 04 Sep 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

वर्तमान में भारत में पारंपरिक ईधन वाहनों से ई-वाहनों की ओर जाने संबंधी परिवर्तन की मांग की जा रही है। माना जा रहा है कि देश में इस दिशा में परिवर्तन की अत्यधिक आवश्यकता है लेकिन मुद्दा यह है कि इलेक्ट्रिक वाहनों (Electric Vehicle-EV) का बड़े पैमाने पर उपयोग आर्थिक रूप में किस हद तक संभव हो सकेगा?

पृष्ठभूमि

  • मई 2019 में नीति आयोग द्वारा मार्च 2023 के बाद सभी आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाले थ्री-व्हीलर्स की बिव्री पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया गया था। साथ ही मार्च 2025 के बाद 150cc से नीचे वाले उन्हीं नए दोपहिया वाहनों की बिव्री संभव हो सकेगी, जो कि इलेक्ट्रिक वाहन होंगे।
  • इन प्रस्तावों के अनुरूप 5 जुलाई, 2019 को पेश किये गए केंद्रीय बजट में इन वाहनों की उपलब्धता की शुरुआत में ही इन्हें अपनाने वाले लोगों के लिये कर-प्रोत्साहन की घोषणा भी की गई थी।
  • परंतु ऑटोमोबाइल उद्योग द्वारा थिंक टैंक के इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई गई और इलेक्ट्रिक वाहन संबंधी नीतियों को तैयार करने में व्यावहारिक दृष्टिकोण को अपनाने की मांग की गई थी क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण और उपयोग से जुड़ी विभिन्न लागतों के कारण EVs अभी भी वित्तीय रूप से व्यवहार्य नहीं है।

पारंपरिक एवं इलेक्ट्रिक वाहन की लागत संरचना में अंतर

  • ICE वाहनों से तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि EVs के ड्राइवट्रेन (मोटर वाहन का सिस्टम) की लागत पूरे वाहन की लागत की तुलना में 4% कम है। इसका मुख्य कारण इलेक्ट्रिक ड्राइवट्रेन के पार्टस की संख्या का कम होना है। हालाँकि बैटरी पैक में इलेक्ट्रिक वाहन की लागत लगभग आधी होती है।
  • EV के भौतिक मूल्य में किसी भी अर्थपूर्ण कमी के लिये बैटरी पैक की लागत में कमी करने की आवश्यकता है।

बैटरी पैक के घटक एवं लागत

  • EVs में लिथियम आयन बैटरी (Li-ion) का प्रयोग किया जाता है परंतु इससे संबंधित कोई भी नई तकनीक तात्कालिक रूप से व्यावसायिक उपयोग के करीब नहीं है।
  • बैटरी में प्रयुक्त सामग्री या मुख्य घटकों अर्थात् कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट एवं सेपरेटर (Separater) की लागत, कुल लागत की तुलना में सबसे अधिक यानी 60% है।
  • शेष लागत हेतु श्रम शुल्क, ओवरहेड्स एवं लाभ मार्जिन उत्तरदायी होते हैं। समग्र लागत की अपेक्षा श्रम एक छोटा घटक माना जाता है। बैटरी पैक की कीमत में किसी भी तरह की कमी लाने हेतु सामग्री की लागत या विनिर्माण खर्च में कमी लानी होगी।
  • हालाँकि इन बैटरी पैक की कीमत पिछले कुछ वर्षों में लगातार कम हो रही है। कीमतों में कमी तकनीकी सुधार एवं लिथियम आयन बैटरी की बढ़ती मांग के कारण संभव हो सका है।
  • प्रमुख निर्माताओं के मध्य अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक माहौल का भी कीमतों की गिरावट में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की स्वीकार्यता

  • भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की सामूहिक स्वीकृति बढ़ाने हेतु उच्च संख्या में कारों के बजाय दोपहिया वाहनों को प्रोत्साहन दिया जाएगा क्योंकि भारत का मोबिलिटी बाज़ार दोपहिया वाहनों द्वारा ज़्यादा संचालित है।
  • नीति आयोग के अनुसार, भारतीय सड़कों पर 79% दोपहिया वाहन हैं। कुल वहन योग्य लागत को देखते हुए कारों की तुलना में दोपहिया वाहनों हेतु छोटी बैटरी की आवश्यकता होगी। इसलिये भारत में ली-आयन सेल (Li-ion Cells) के निर्माण किये जाने की आवश्यकता है। वर्तमान में इन सेल्स का आयात कर उन्हें बैटरी में संकलित किया जाता है।
  • ली-आयन के निर्माण से संबंधित इकाई की स्थापना हेतु उच्च पूंजी व्यय करने की आवश्यकता होती है लेकिन सवाल यह भी है कि EV वाहन किस हद तक पर्यावरण के अनुकूल होंगे?
  • पारंपरिक ICE में पेट्रोल या डीज़ल इंधन द्वारा इंजन को ऊर्जा प्राप्त होती है। हालाँकि EVs में बैटरी इंजन का कार्य नहीं करती बल्कि बैटरी द्वारा आपूर्ति किये गए इलेक्ट्रॉन से वाहनों को ऊर्जा प्राप्त होती है। विद्युत द्वारा प्राप्त इलेक्ट्रॉनों/ऊर्जा को बैटरी द्वारा संग्रहीत किया जाता है।

आगे की राह

वर्तमान में भारत में अधिकांश विद्युत का उत्पादन पारंपरिक स्रोतों के उपयोग द्वारा होता है। वर्ष 2018-19 में भारत में 90% से अधिक विद्युत का उत्पादन पारंपरिक स्रोतों यथा- कोयला आदि द्वारा किया गया था। करीब 10% का उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों यथा- सौर, पवन एवं बायोमास के द्वारा किया गया। हालाँकि नवीरकणीय स्रोतों द्वारा विद्युत उत्पादन की दर में समय के साथ वृद्धि हुई है लेकिन इसे अपनाने की दिशा में और अधिक ज़ोर देने की आवश्यकता है। EV चार्ज़िग संबंधी बुनियादी ढाँचे को नवीकरणीय स्रोतों के माध्यम से संचालित करने की आवश्यकता है ताकि यह सही मायने में टिकाऊ हो।

स्रोत: The Hindu

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