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डेली अपडेट्स

भारतीय अर्थव्यवस्था

आर्थिक समीक्षा 2019-20

  • 01 Feb 2020
  • 24 min read

प्रीलिम्स के लिये:

आर्थिक समीक्षा के महत्त्वपूर्ण बिंदु, शब्दावलियाँ

मेन्स के लिये:

आर्थिक समीक्षा

चर्चा में क्यों?

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा 31 जनवरी, 2020 को संसद में आर्थिक समीक्षा 2019-20 पेश की गई।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:

उद्यमिता, धन सृजन एवं बाज़ार अनुकूलन

  • उदारीकरण के बाद भारत की GDP और प्रति व्‍यक्ति GDP में उल्‍लेखनीय वृद्धि के साथ-साथ धन सृजन भी हो रहा है।
  • अदृश्‍य सहयोग को प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है, जो वर्ष 2011 से वर्ष 2013 तक की अवधि के दौरान वित्तीय सेक्‍टर के प्रदर्शन से परिलक्षित होता है। आर्थिक समीक्षा में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनाने हेतु बाज़ार के अदृश्‍य सहयोग की मज़बूती और आश्वासन का उल्लेख किया गया है। व्यापार अनुकूल नीतियों को बढ़ावा देकर अदृश्‍य सहयोग को मज़बूत करना एवं नीतियाँ ऐसी होनी चाहिये जो डेटा एवं प्रौद्यो‍गिकी के उपयोग के ज़रिये पारदर्शिता को सुनिश्चित करे।
  • 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनने संबंधी भारत की आकांक्षा प्रतिस्पर्द्धी बाज़ारों की क्षमता और स्वस्थ बाज़ार प्रतिस्पर्द्धा जैसे बिंदुओं पर निर्भर करती है।
  • विश्व‍ बैंक के अनुसार, नई गठित कंपनियों की संख्‍या के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत तीसरे पायदान पर है तथा वर्ष 2014 के बाद से ही भारत में नई कंपनियों के गठन में उल्‍लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
    • वर्ष 2014 से लेकर वर्ष 2018 तक की अवधि के दौरान औपचारिक क्षेत्र में नई कंपनियों की संचयी वार्षिक वृद्धि दर 12.2% रही।
    • सेवा क्षेत्र में गठित नई कंपनियों की संख्‍या विनिर्माण, अवसंरचना या कृषि क्षेत्र में गठित नई कंपनियों की तुलना में काफी अधिक है।
    • किसी भी ज़िले में भौतिक अवसंरचना की गुणवत्ता, कारोबार में सुगमता और लचीले श्रम कानून का नई कंपनियों के गठन पर काफी असर होता है। किसी भी ज़िले में साक्षरता और शिक्षा की उचित व्यवस्था से स्‍थानीय स्‍तर पर उद्यमिता को काफी बढ़ावा मिलता है।
    • आर्थिक समीक्षा में यह सुझाव दिया गया है कि कारोबार में सुगमता बढ़ाने और लचीले श्रम कानूनों को लागू करने से ज़िलों और राज्‍यों में अधिकतम रोज़गारों का सृजन हो सकता है।

खाद्यान्‍न बाज़ार में हस्‍तक्षेप

  • खाद्यान्‍न बाज़ार में सरकारी हस्‍तक्षेप के कारण सरकार गेहूँ और चावल की सबसे बड़ी खरीदार होने के साथ ही सबसे बड़ी जमाखोर भी हो गई है।
  • खाद्यान्न नीति को अधिक गतिशील बनाना तथा अनाजों के वितरण के लिये पारंपरिक पद्धति के स्‍थान पर नकद अंतरण, फूड कूपन तथा स्‍मार्ट कार्ड का इस्‍तेमाल करना।

कर्ज़ माफी

  • पूरी तरह से कर्ज़ माफी की सुविधा वाले लाभार्थी कम खपत, कम बचत, कम निवेश करते हैं जिससे आंशिक रूप से कर्ज़ माफी वाले लाभार्थियों की तुलना में उनका उत्‍पादन भी कम होता है। इसके अतिरिक्त कर्ज़ माफी का लाभ प्राप्‍त करने वाले किसान औपचारिक ऋण प्रवाह को कम करते हैं और इस तरह कर्ज़ माफी के औचित्‍य को खत्‍म कर देते हैं।
  • ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक समीक्षा में यह सुझाव दिया गया कि सरकार को अपने अनावश्‍यक हस्‍तक्षेप वाले बाज़ार क्षेत्रों की व्‍यवस्थित तरीके से जाँच करनी चाहिये।

विकास और रोज़गार सृजन

  • आर्थिक समीक्षा के अनुसार, भारत के पास श्रम आधारित निर्यात को बढ़ावा देने के लिये चीन के समान अभूतपूर्व अवसर हैं।
  • भारत में एसेम्‍बल इन इंडिया और मेक इन इंडिया योजना को एक साथ मिलाने से निर्यात बाज़ार में भारत की हिस्‍सेदारी वर्ष 2025 तक 3.5% तथा वर्ष 2030 तक 6% हो जाएगी।
  • भारत की ओर से निर्यात किये गए कुल उत्‍पादों में 10.9% जबकि विनिर्माण उत्‍पादों के निर्यात में 13.4% की वृद्धि हुई। कुल आयातित उत्‍पादों में 8.6% तथा विनिर्माण उत्‍पादों के आयात में 12.7% की बढ़ोतरी हुई।

कारोबार सुगमता

  • विश्‍व बैंक के कारोबारी सुगमता रैंकिंग में भारत वर्ष 2014 में जहाँ 142वें स्‍थान पर था, वहीं वर्ष 2019 में वह 63वें स्‍थान पर पहुँच गया। हालाँकि इसके बावजूद भारत कारोबार शुरू करने की सुगमता के मामले में अभी भी संपत्ति के रजिस्‍ट्रेशन, करों का भुगतान और अनुबंधों को लागू करने के पैमाने पर काफी पीछे है।
  • कारोबारी सुगमता को बेहतर बनाने के लिये दिये गए सुझावों में वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय, केंद्रीय अप्रत्‍यक्ष कर और सीमा शुल्‍क बोर्ड, जहाज़रानी मंत्रालय और अन्‍य बंदरगाह प्राधिकरणों के बीच करीबी सहयोग स्थापित करना शामिल है।
  • सुझाव में यह भी कहा गया है कि पर्यटन या विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में अवरोध खड़े करने वाली नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिये ज़्यादा लक्षित उपायों की ज़रूरत है।
  • वस्‍तुओं के निर्यात में लॉजिस्टिक सेवाओं का प्रदर्शन निर्यात की तुलना में आयात के क्षेत्र में ज़्यादा रहा।

बैंकों के राष्‍ट्रीयकरण की स्‍वर्ण जयंती एक समीक्षा

  • आर्थिक समीक्षा में चिंता व्यक्त की गई कि वर्ष 1969 से जिस रफ्तार से देश की अर्थव्‍यवस्‍था का विकास हुआ उस हिसाब से बैंकिंग क्षेत्र विकसित नहीं हो सका।
  • वर्तमान में भारत का केवल एक बैंक विश्‍व के 100 शीर्ष बैंकों में शामिल है। यह स्थिति भारत को उन देशों की श्रेणी में ले जाती है जिनकी अर्थव्‍यवस्‍था का आकार भारत के मुकाबले कई गुना कम है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अधिक सक्षम बनाने हेतु सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों में कर्मचारियों के लिये हिस्‍सेदारी की योजना, बैंक के बोर्ड में कर्मचारियों का प्रतिनिधित्‍व बढ़ाना तथा बैंक के शेयर-धारकों को वित्‍तीय प्रोत्‍साहन जैसे उपायों की प्रासंगिकता को चिह्नित किया गया है।
  • GSTN जैसी व्‍यवस्‍था करना ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से उपलब्‍ध आँकड़ों का संकलन किया जा सके और बैंक से कर्ज़ लेने वालों पर बेहतर निगरानी रखने के लिये आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग जैसी प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल करना।

NBFC क्षेत्रक:

  • बैंकिंग क्षेत्र में नकदी के मौजूदा संकट के साथ आस्ति देयता प्रबंधन (ALM) जोखिम, अंतर संयोगी जोखिम, गैर-वित्तीय कंपनियों के वित्तीय संचालन में लचीलापन एवं अल्पावधि में बड़े फंडिंग पर अत्यधिक निर्भरता जैसे शेडों बैंकिंग के खतरों को स्पष्ट करने जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे NBFC क्षेत्रक के लिये आवश्यक हैं।

निजीकरण और धन सृजन

  • सरकार की विनिवेश रणनीति से केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के नेटवर्थ, परिसंपत्तियों से आय, इक्विटी पर लाभ आदि में वृद्धि देखी जा रही है।
  • अधिक लाभ, दक्षता, प्रतिस्पर्द्धा, व्यवसायवाद जैसे कारकों को बढ़ावा देने हेतु समीक्षा में केंद्रीय उपक्रमों के विनिवेश का सुझाव दिया गया है।

भारत का आर्थिक प्रदर्शन: 2019-20

भारत की GDP 4.8% (कमज़ोर वैश्विक विनिर्माण, व्यापार और मांग)
दूसरी छमाही में 5.0% रहने का अनुमान
वास्तविक उपभोग वृद्धि बेहतर (सरकारी खपत में वृद्धि)
कृषि, लोक प्रशासन और रक्षा सेवा वृद्धि
चालू खाता घाटा कमी (वर्तमान में GDP का 1.5%)
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, पोर्टफॉलियो प्रवाह और विदेशी मुद्रा भंडार मज़बूत
महँगाई दर वर्ष के अंत तक कमी
CPI तथा WPI वृद्धि

वैदेशिक क्षेत्र

  • भुगतान संतुलन (BOP):
    • भारत की BOP की स्थिति में सुधार हुआ है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सितंबर 2019 के अंत में 433.7 बिलियन डॉलर का हो गया था।
    • चालू खाता घाटा (CAD) वर्ष 2018-19 में 2.1% था जो वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में घटकर 1.5% हो गया।
  • वैश्विक व्यापार
    • वर्ष 2019 में वैश्विक उत्पादन में 2.9% अनुमानित वृद्धि के अनुरूप वैश्विक व्यापार में 1.0% वृद्धि दर का अनुमान है, जबकि 2017 में यह 5.7% के शीर्ष स्तर तक पहुँचा था।
    • भारत के शीर्ष पाँच व्यापारिक साझेदार अमेरिका, चीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और हॉन्गकॉन्ग हैं।
  • निर्यातः
    • शीर्ष निर्यात मदें- पेट्रोलियम उत्पाद, बहुमूल्य पत्थर, औषधि, स्वर्ण और अन्य बहुमूल्य धातुएँ।
    • 2019-20 (अप्रैल-नवंबर) में सबसे बड़े निर्यात स्थलः अमेरिका, उसके बाद संयुक्त अरब अमीरात, चीन और हॉन्गकॉन्ग।
    • वर्ष 2009-14 और 2014-19 के बीच गैर पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में देखी वृद्धि में अब कमी आई है।
  • आयातः
    • शीर्ष आयात मदें- कच्चा पेट्रोलियम, सोना, पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, कोक एवं ब्रिकेट्स।
    • भारत का सर्वाधिक आयात चीन से जारी रहेगा, उसके बाद अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब का स्थान है।
  • कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि से कुल आयात में कच्चे तेल का हिस्सा बढ़ता है साथ ही आयात और GDP अनुपात में वृद्धि होती है।
  • गैर-पेट्रोलियम उत्पाद, गैर-सोना आयात सकारात्मक रूप से GDP में वृद्धि से जुड़ा है।
    • निवेश दर में निरंतर गिरावट के कारण GDP वृद्धि की गति कम हुई, खपत में कमज़ोरी आई, निवेश परिदृश्य निराशाजनक रहा, जिसके परिणामस्वरूप GDP में कमी आई।
  • विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक के अनुसार, वर्ष 2018 में भारत विश्व में 44वें रैंक पर रहा। वर्ष 2014 में भारत 54वें स्थान पर था।
  • विदेशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीयों से रकम की प्राप्ति में वृद्धि होती रही। वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में 38.4 बिलियन डॉलर की प्राप्ति हुई, जो पिछले वर्ष के स्तर से 50% से अधिक है।
  • बाह्य ऋणः
    • सितंबर 2019 के अंत में यह GDP के 20.1% के निचले स्तर पर रहा।
    • वर्ष 2014-15 से गिरावट के बाद भारत की बाहरी देनदारियाँ (ऋण तथा इक्विटी) जून 2019 के अंत में GDP की तुलना में बढ़ी। ऐसा एफडीआई पोर्टफोलियो प्रवाह तथा बाहरी वाणिज्यिक उधारियों (ECB) में वृद्धि के कारण हुआ।

मौद्रिक प्रबंधन तथा वित्तीय मध्यस्थता

  • मौद्रिक नीतिः
    • कम वृद्धि तथा कम मुद्रास्फीति के कारण वित्तीय वर्ष में एमपीसी की चार बैठकों में रेपो दर में 110 बेसिस प्वाइंट की कटौती की गई।
    • वर्ष 2019-20 के शुरुआती दो महीनों में नकदी की स्थिति कमज़ोर रही; लेकिन कुछ समय बाद यह सामान्य हो रही है।
  • सकल गैर-निष्पादित अग्रिम अनुपात :
    • मार्च-दिसंबर 2019 के बीच अनुसूचित व्यवसायिक बैंकों के लिये बिना किसी बदलाव के यह 9.3% रहा।
    • गैर-बैंकिंग वित्तीय निगमों (NBFC) के लिये यह मार्च 2019 के 6.1% से मामूली वृद्धि के साथ सितंबर 2019 में 6.3% हो गया।
  • ऋण वृद्धि :
    • अर्थव्यवस्था के लिये वित्तीय आवक सीमित रही क्योंकि दोनों बैंकों और NBFC के लिये ऋण वृद्धि में गिरावट आई।
    • बैंक ऋण वृद्धि अप्रैल 2019 में 12.9% थी जो 20 दिसंबर, 2019 में 7.1% हो गई।

मूल्य और मुद्रास्फीति

  • मुद्रास्फीति प्रवृत्तियाँ:
    • वर्ष 2014 के बाद मुद्रास्फीति नियंत्रित रही, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति वर्ष 2018-19 (अप्रैल से दिसंबर 2018) में 3.7% थी।
    • थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति 2018-19 (अप्रैल से दिसंबर 2018) में 4.7% से गिरकर 2019-20 (अप्रैल से दिसंबर 2019) में 1.5% हो गई।
  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मिश्रित (CPI-C):
    • इसमें वर्ष 2019-20 के दौरान (अप्रैल-दिसंबर) खाद्य और पेय पदार्थों ने प्रमुख योगदान दिया।
  • कीमतों में अस्थिरता
    • वर्ष 2009-14 की अवधि की तुलना में 2014-19 की अवधि में विपणन चैनलों, भंडार सुविधाओं तथा कारगर MSP प्रणाली के कारण दालों को छोड़कर आवश्यक खाद्य वस्तुओं के मूल्यों के उतार-चढ़ाव में कमी आई।

सतत विकास और जलवायु परिवर्तन

  • भारत अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से एसडीजी क्रियान्वयन के मार्ग पर अग्रसर है।
  • एसडीजी भारत सूचकांकः
    • हिमाचल प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और चंडीगढ़ अग्रणी राज्य।
    • असम, बिहार तथा उत्तर प्रदेश आकांक्षी श्रेणी में।
  • भारत ने यूएनसीसीडी के तहत सीओपी-14 की मेज़बानी की, जिसमें “दिल्ली घोषणाः भूमि में निवेश और अवसरों के द्वार खोलना” को अपनाया गया।
  • मैड्रिड में UNFCCC के अंतर्गत COP-25
    • भारत ने पेरिस समझौते को लागू करने का अपना संकल्प दोहराया।
    • सीओपी-25 के निर्णयों में जलवायु परिवर्तन शमन, अनुकूलन और विकासशील देशों द्वारा विकसित देशों के क्रियान्वयन उपायों को अपनाना तथा लागू करना शामिल है।
  • वन और वृक्ष कवरः
    • वन और वृक्ष कवर वृद्धि के साथ यह 80.73 मिलियन हेक्टेयर हो गया है जो कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 24.56% है।
  • कृषि अवशेषों को जलाने से प्रदूषण स्तर में वृद्धि तथा वायु गुणवत्ता में गिरावट अभी भी चिंता का विषय है। यद्यपि विभिन्न प्रयासों के कारण कृषि अवशेषों को जलाने की घटना में कमी आई है।
  • कृषि तथा खाद्य प्रबंधन
    • भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अन्य क्षेत्रों की तुलना में रोज़गार अवसरों के लिये कृषि पर निर्भर है।
    • देश के कुल मूल्यवर्द्धन (जीवीए) में कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों की हिस्सेदारी गैर-कृषि क्षेत्रों की अधिक वृद्धि के कारण कम हो रही है। यह विकास प्रक्रिया का स्वभाविक परिणाम है।
    • कृषि में मशीनीकरण का स्तर कम होने से कृषि उत्पादकता में कमी देखी जाती है। भारत में कृषि का मशीनीकरण 40% है, जो चीन के 59.5% तथा ब्राज़ील के 75% से काफी कम है।
    • भारत में कृषि ऋण के क्षेत्रीय वितरण में भी असमानता विद्यमान है।
      • पर्वतीय तथा पूर्वोत्तर राज्यों में कम ऋण (कुल कृषि ऋण वितरण का 1% से भी कम)।
    • लाखों ग्रामीण परिवारों के लिये पशुधन आय का दूसरा महत्त्वपूर्ण साधन है। किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पिछले 5 वर्षों के दौरान पशुधन क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) के 7.9% की दर से बढ़ रहा है।
  • यद्यपि जनसंख्या के कमज़ोर वर्गों के हितों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता है फिर भी आर्थिक समीक्षा में निम्नलिखित उपायों से खाद्य सुरक्षा की स्थिति को स्थिर बनाने पर बल दिया गया है।
    • बढ़ती खाद्य सब्सिडी बिल की समस्या सुलझाना।
    • एनएफएसए के अंतर्गत दरों तथा कवरेज में संशोधन।
  • उद्योग तथा आधारभूत संरचना
    • औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के अनुसार 2018-19 (अप्रैल-नवंबर) के 5.0% की तुलना में 2019-20 (अप्रैल-नवंबर) के दौरान औद्योगिक क्षेत्र में 0.6% की वृद्धि दर्ज की गई।
    • 2018-19 (अप्रैल-नवंबर) के 1.3% की तुलना में 2019-20 (अप्रैल-नवंबर) के दौरान उर्वरक क्षेत्र में 4% की वृद्धि हुई।
    • इस्पात क्षेत्र में 2019-20 (अप्रैल-नवंबर) के दौरान 5.2% वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि 2018-19 (अप्रैल-नवंबर) के दौरान यह 3.6% थी।
    • 30 सितंबर , 2019 को भारत में कुल 119.43 करोड़ टेलीफोन कनेक्शन थे।
    • बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता बढ़कर 31 अक्तूबर, 2019 को 3,64,960 मेगावाट हो गई, जो 31 मार्च, 2019 को 3,56,100 मेगावाट थी।

सेवा क्षेत्र

  • भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है:
    • सकल संवर्द्धन मूल्य और सकल संवर्द्धन मूल्य वृद्धि में इसका हिस्सा 55% है।
    • यह भारत के कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का दो-तिहाई है।
    • यह कुल निर्यात का लगभग 38% है।
    • सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 15 राज्यों में सेवा क्षेत्र का योगदान 50% से अधिक है।
  • वर्ष 2019-20 की शुरुआत में सेवा क्षेत्र में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बेहतरी देखी गई है।

सामाजिक अवसंरचना, रोज़गार और मानव विकास

  • केंद्र और राज्यों द्वारा सामाजिक सेवाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य) पर GDP के अनुपात में होने वाला व्यय 6.2% (वर्ष 2014-15 में) से बढ़कर वर्ष 2019-20 (बजटीय अनुमान) में 7.7% हो गया है।
  • वर्ष 2018 में मानव विकास सूचकांक में भारत की रैंकिंग 129 हो गई, जो कि वर्ष 2017 में 130 थी। वार्षिक मानव विकास सूचकांक में औसत 1.34% की वृद्धि के साथ भारत तीव्रतम सुधार वाले देशों में शामिल है।
  • माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा स्तर पर सकल नामांकन अनुपात में सुधार की ज़रूरत है।
  • नियमित मज़दूरी/ वेतनभोगी कर्मचारियों की हिस्सेदारी में 5% की वृद्धि दर्ज की गई है, जो पूर्ववर्ती 18% की वृद्धि की तुलना में 2017-18 में 23% हो गई।
    • इस श्रेणी में ग्रामीण क्षेत्रों में 1.21 करोड़ तथा शहरी क्षेत्रों में 1.39 करोड़ नए रोज़गारों सहित लगभग 2.62 करोड़ नए रोज़गारों का सृजन होना एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
    • अर्थव्यवस्था में कुल औपचारिक रोज़गार 2011-12 में 8% थे, जो कि 2017-18 में बढ़कर 9.98% हो गए।
    • महिला श्रमिक बल की प्रतिभागिता में गिरावट आने की वजह से भारत के श्रमिक बाज़ार में लिंग असमानता का अंतर और बढ़ गया है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 60% महिला जनांकिकी (15-59 वर्ष) पूर्णकालिक घरेलू कार्यों में लगी हुई है।
    • देश भर में आयुष्मान भारत और मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में सुधार हुआ है।
    • गाँवों में लगभग 76.7% और शहरों में 96% परिवारों के पास पक्के घर हैं।
    • स्वच्छता संबंधी व्यवहार में बदलाव लाने तथा ठोस एवं तरल कचरा प्रबंधन की पहुँच बढ़ाने पर ज़ोर देने के उद्देश्य से एक 10 वर्षीय ग्रामीण स्वच्छता रणनीति (2019-2029) की शुरुआत की गई।

स्रोत: पी.आई.बी.

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