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अफ्रीका के दुर्लभ ग्लेशियरों पर विलुप्ति का खतरा

  • 20 Oct 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

विश्व मौसम विज्ञान संगठन, संयुक्त राष्ट्र, स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, डिग्लेसिएशन, अपक्षरण (Ablation), माउंट किलिमंजारो , माउंट केन्या और रुवेंज़ोरी पर्वत की भौगोलिक स्थिति

मेन्स के लिये:

जलवायु परिवर्तन और डिग्लेसिएशन  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organisation-WMO) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अगले दो दशकों में अफ्रीका के दुर्लभ ग्लेशियर गायब हो जाएंगे।

  • वर्तमान में इन ग्लेशियरों के पिघलने की दर वैश्विक औसत से अधिक है और अगर यह दर ऐसे ही बनी रही तो वर्ष 2040 तक ये ग्लेशियर पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगे।
  • WMO, संयुक्त राष्ट्र (UN) की विशेष एजेंसियों में से एक है। यह संगठन वार्षिक रूप से स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट तैयार करता है।

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प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट की हाइलाइट्स: 
    • अफ्रीका एक ऐसा महाद्वीप है जिसका ग्लोबल वार्मिंग में योगदान सबसे कम है लेकिन इसे सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
      • यद्यपि अफ्रीकी राष्ट्र वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 4% से कम योगदान करते हैं लेकिन इस रिपोर्ट में महाद्वीप के 1.3 बिलियन लोगों पर जलवायु परिवर्तन के बाह्य प्रभावों को रेखांकित किया गया है।
    • अफ्रीका के अंतिम तीन पर्वतीय ग्लेशियर- माउंट किलिमंजारो (तंज़ानिया), माउंट केन्या (केन्या) और रुवेंज़ोरी पर्वत (युगांडा) इतनी तीव्र गति से घट रहे हैं कि वे दो दशकों के भीतर गायब हो सकते हैं।
    • उप-सहारा अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन वर्ष 2050 तक सकल घरेलू उत्पाद को 3% तक कम कर सकता है।
      • अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन की लागत वर्ष 2050 तक बढ़कर 50 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष हो जाएगी।
    • हिंद महासागर में स्थित द्वीपीय देश मेडागास्कर, एक ऐसा राष्ट्र जहाँ ‘अकाल जैसी स्थितियाँ’ जलवायु परिवर्तन से प्रेरित हैं।
    • दक्षिण सूडान के कुछ हिस्से ऐसे हैं जहाँ लगभग 60 वर्षों में सबसे भीषण बाढ़ की स्थितियाँ सामने आई हैं।
    • इसके अलावा बड़े पैमाने पर विस्थापन, भूख और जलवायु प्रेरित घटनाओं जैसे- सूखा तथा बाढ़ आदि के भविष्य में बढ़ने की संभावना है।
  • डिग्लेसिएशन या ग्लेशियर का विलुप्त होना:
    • परिचय:
      • हिमनद/ग्लेशियर, हिम आवरण और महाद्वीपीय बर्फ की चादरें वर्तमान समय में पृथ्वी की सतह के लगभग 10% हिस्से को कवर करती हैं, जबकि हिमयुग के दौरान ये वर्तमान की तुलना में लगभग तीन गुना हिस्से को कवर करती थीं।
        • वर्तमान में विश्व भर में उपलब्ध कुल ताज़े जल का तीन-चौथाई हिस्सा हिम प्रदेशों में बर्फ के रूप में विद्यमान है।
      • भू-भाग की सतह से ग्लेशियर के धीरे-धीरे पिघलने की प्रक्रिया को डिग्लेसिएशन के रूप में जाना जाता है।
        • ग्लेशियर या हिम आवरण से बर्फ, हिम और हिमोढ़ को हटाने वाली प्रक्रियाओं को अपक्षरण (Ablation) कहा जाता है। इसमें पिघलना, वाष्पीकरण, क्षरण और कैल्विंग (बर्फ का टूटना और बिखरना आदि) शामिल है।
      • 20वीं शताब्दी में तेज़ हुई डिग्लेसिएशन/अवक्षयण की प्रक्रिया, पृथ्वी को बर्फ रहित बना रही है।
    • डिग्लेसिएशन का कारण:
      • ग्लोबल वार्मिंग: उद्योग, परिवहन, वनों की कटाई और अन्य मानव गतिविधियों के बीच जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन एवं अन्य ग्रीनहाउस गैसों (GHG) की वायुमंडलीय सांद्रता, पृथ्वी के वायुमंडल को गर्म करती है और ग्लेशियरों को पिघला देती है।
      • महासागरीय तापन: महासागर पृथ्वी की 90% ऊष्मा को अवशोषित करते हैं तथा यह समुद्री ग्लेशियरों के पिघलने की दर को प्रभावित करता है, जो अधिकांश ध्रुवों के पास स्थित होते हैं।
      • तीव्र औद्योगीकरण: 1900 के दशक की शुरुआत से दुनिया भर के कई ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, विशेष रूप से औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने ध्रुवों के तापमान को अधिक बढ़ा दिया है जिसके परिणामस्वरूप ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना, समुद्र में समाहित होना और स्थल खंड से पीछे की ओर खिसकना जारी है।

आगे की राह

  • अफ्रीकी प्रतिनिधित्व में वृद्धि: अफ्रीकी महाद्वीप के समक्ष उत्पन्न संकटों के बावजूद वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलनों में अमीर/विकसित क्षेत्रों की तुलना में अफ्रीकियों का प्रतिनिधित्व कम (IPCC की रिपोर्ट की तरह)  है।
    • इस प्रकार सभी बहुपक्षीय जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में अफ्रीकी भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • जलवायु वित्त का संग्रहण: अफ्रीका को अपनी राष्ट्रीय जलवायु योजना को समग्र रूप से लागू करने के लिये वर्ष 2030 तक शमन और अनुकूलन में 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश की आवश्यकता होगी।
    • इसके लिये अफ्रीका में हरित वित्तपोषण के महत्त्वपूर्ण, सुलभ और पूर्वानुमेय अंतर्वाह की आवश्यकता होगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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