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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अफगानिस्तान पर दिल्ली घोषणा

  • 11 Nov 2021
  • 6 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय सुरक्षा सलाहकार, संयुक्त राष्ट्र, मौलिक अधिकार 

मेन्स के लिये:

दिल्ली घोषणा की मुख्य विशेषताएंँ

चर्चा में क्यों?   

हाल ही में अफगानिस्तान पर दिल्ली क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता (Delhi Regional Security Dialogue) का आयोजन किया गया। इस बैठक में क्षेत्रीय देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (National Security Advisors- NSA) ने हिस्सा लिया तथा इसकी अध्यक्षता भारतीय सुरक्षा सलाहकार ( Indian NSA) द्वारा की गई।

  • बैठक में अफगान लोगों को ‘तत्काल मानवीय सहायता’ (Urgent Humanitarian Assistance) का आह्वान किया गया और अफगान परिदृश्य पर क्षेत्रीय देशों के मध्य घनिष्ठ सहयोग एवं परामर्श का आग्रह किया गया।
  • यह क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता की तीसरी बैठक है (इससे पहले की दो बैठकें वर्ष 2018 और 2019 में ईरान में  संपन्न हुईं)।

Helping-Hand

प्रमुख बिंदु 

  • आमंत्रित प्रतिभागी: अफगानिस्तान के पड़ोसी देश जैसे- पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और रूस तथा चीन सहित अन्य प्रमुख प्रतिभागी देश।
  • आवश्यकता: अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और तालिबान द्वारा कब्ज़ा करने के बाद भारत इस क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंतित है।
  • अफगानिस्तान के क्षेत्र से आतंकवाद फैलने की आशंका बनी हुई है।
  • दिल्ली घोषणा की विशेषताएंँ:
    • सुरक्षित और स्थिर अफगानिस्तान: संप्रभुता, एकता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान और आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप पर ज़ोर देते हुए अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा व स्थिरता हेतु समर्थन को दोहराया गया।
    • आतंकवाद की निंदा करना: आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों से निपटने के लिये प्रतिबद्धता की बात की गई।
      • क्षेत्रीय सदस्यों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है कि अफगानिस्तान कभी भी वैश्विक आतंकवाद के लिये सुरक्षित स्थान नहीं बनेगा।
    • मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करना: इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यक समुदायों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।
      • अफगान समाज के सभी वर्गों को भेदभाव रहित सहायता प्रदान की जानी चाहिये।
    • सामूहिक सहयोग: क्षेत्र में कट्टरपंथ, उग्रवाद, अलगाववाद और मादक पदार्थों की तस्करी के खतरे के खिलाफ सामूहिक सहयोग का आह्वान किया गया।
    • संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका: अफगानिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र (United Nations- UN) के प्रासंगिक प्रस्तावों को दोहराते हुए कहा गया कि देश में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की निरंतर उपस्थिति को संरक्षित किया जाना चाहिये।
      • हाल ही में संयुक्त राष्ट्र का संकल्प 2593 अफगानिस्तान में आतंकवाद का मुकाबला करने के महत्त्व को दोहराता है, जिसमें वे व्यक्ति और संस्थाएंँ शामिल हैं जिन्हें संकल्प 1267 के अनुसार नामित किया गया है।
  • क्षेत्रीय देशों द्वारा प्रतिक्रिया:
    • रूस ने माना कि तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान में संवाद तंत्रों को जटिल नहीं होना चाहिये।
    • पाकिस्तान और चीन को भी परामर्श में भाग लेने के लिये आमंत्रित किया गया था लेकिन दोनों इससे दूर रहे।
    • इसके अलावा तत्कालीन अफगान सरकार या तालिबान का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था।
    • उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के NSA ने अपने शुरुआती बयानों में आतंकवाद शब्द का बिल्कुल भी उल्लेख नहीं किया।
  • अन्य अफगान शांति प्रक्रिया :
    • अफगानिस्तान पर ‘ट्रोइका प्लस’ बैठक: अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया पर यू.एस, रूस, चीन, पाकिस्तान समूह।
    • अफगानिस्तान पर ‘मास्को फोरमैट’: यह अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिये वर्ष 2017 में रूस द्वारा स्थापित किया गया था।
      • यह छह-पक्षीय तंत्र है। इसमें रूस, भारत, अफगानिस्तान, ईरान, चीन और पाकिस्तान शामिल थे।

आगे की राह:

  • समावेशी सरकार: सभी जातीय समूहों की भागीदारी के साथ एक समावेशी सरकार के गठन के माध्यम से ही समाधान प्राप्त किया जा सकता है।
  • रूसी समर्थन: रूस ने हाल के वर्षों में तालिबान के साथ संबंध विकसित किये हैं। तालिबान के साथ किसी भी तरह के सीधे जुड़ाव हेतु भारत को रूस के समर्थन की आवश्यकता होगी।
  • चीन के साथ संबंध: भारत को अफगानिस्तान में राजनीतिक समाधान और स्थायी स्थिरता प्राप्त करने के उद्देश्य से चीन के साथ बातचीत करनी चाहिये।
  • तालिबान से जुड़ना: तालिबान से बात करने से भारत उन्हें निरंतर विकास सहायता एवं पाकिस्तान से तालिबान की स्वायत्तता की संभावना का पता लगाने में समर्थ होगा।

स्रोत- द हिंदू

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