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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत और अमेरिका ने साइबर सुरक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किये

  • 12 Jan 2017
  • 6 min read

संदर्भ

साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के नए दौर की शुरुआत करते हुए भारत और अमेरिका ने साइबर सुरक्षा को मज़बूत करने के उद्देश्य से समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं। गौरतलब है कि इस समझौता-ज्ञापन पर भारत के ‘इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम’ और अमेरिका के ‘होमलैंड सुरक्षा विभाग’ द्वारा हस्ताक्षर किये गए हैं।

महत्त्वपूर्ण  बिंदु

  • इस समझौते का उद्देश्य परस्पर सहयोग को बढ़ावा देन और महत्त्वपूर्ण  सूचनाओं का आदान-प्रदान करना है। दोनों देश अब सेवाएँ  लेने और देने की एक मानकीकृत प्रणाली और सुरक्षित तथा विश्वसनीय इंटरनेट सेवा सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य करेंगे।
  • साइबर सुरक्षा पर सहयोग भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों का एक महत्त्वपूर्ण अवयव है। वस्तुतः दोनों ही देशों के बीच रणनीतिक साइबर संबंध हैं जो उनके साझा मूल्यों, समान दृष्टिकोण और साइबर स्पेस के लिये साझा सिद्धांतों को परिलक्षित करते हैं।

साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की वर्तमान चिंताएँ

  • हाल ही में जारी एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि भारत में अभी भी साइबर सुरक्षा को संवेदनशील मुद्दा मानने की बजाय बंद कमरे से संचालित होने वाली एक व्यवस्था ही माना जाता है। दरअसल, देश में साइबर सुरक्षा को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के कार्य का ही एक हिस्सा मानते हुए इसकी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
  • इस रिपोर्ट के मुताबिक, 75 फीसदी भारतीय उपक्रमों ने स्वीकार किया है कि उनके साइबर कामकाज उनकी आवश्यकता के अनुरूप नहीं हैं, जबकि 38 प्रतिशत ने कहा है कि उनका निदेशक-मंडल साइबर हमले के जोखिमों के बारे में पूरी तरह से जानकारी नहीं रखता।
  • गौरतलब है कि एक व्यावसायिक फर्म ‘ईवाई’ ने ‘ए पाथ टू सिविलियन रेजिलिएंस’ नामक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि अप्रचलित और परंपरागत डाटाबेस साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में मुख्य चिंता है। रिपोर्ट के अनुसार, दूसरी प्रमुख समस्या लापरवाह और गैर-प्रशिक्षित कर्मी हैं।
  • रिपोर्ट में इस बात पर भी बल दिया गया है कि हमें अपनी प्रणाली को और अधिक क्षमतावान बनाने की आवश्यकता है क्योंकि कुछ भी 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है। अतः हमें साइबर सुरक्षा के अपने आधारभूत ढाँचे को और विकसित करना होगा

निष्कर्ष

  • जहाँ तक उपक्रमों के साइबर सुरक्षा का सवाल है, अमेरिकी संसद ने वर्ष 2015 में एक विधेयक पास किया था जो बैंकों को कानूनी झंझटों से मुक्त करते हुए उन्हें जाँचकर्ताओं के साथ साइबर खतरों से जुड़ी जानकारियाँ साझा करने की अनुमति देता है। वस्तुतः भारत को भी ऐसा ही करना चाहिये, साथ ही, बैंकों को ही नहीं बल्कि सभी कंपनियों के लिये साइबर हमलों की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये।
  •  प्रायः बैंक और कंपनियाँ अपने साइबर खतरों के बारे में इस डर से यह जानकारी नहीं देतीं कि कहीं उनके शेयरों के दाम न गिर जाएँ, अतः जब तक कानून नहीं बन जाएगा, उन्हें ऐसा ही करना पड़ेगा।
  • विदित हो कि अभी विभिन्न कंपनियाँ  ऐसे हमलों की जानकारी ‘इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम’ को देती हैं, लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि साइबर हमलों पर नज़र रखने, उनकी जाँच-पड़ताल करने और उनसे बचाव के उपाय खोजने के लिये फौरन एक विशेषज्ञ संस्था बनाई जाए।
  • ध्यातव्य है कि 2015 में गृह मंत्रालय ने ‘इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन’ के गठन को सैद्धांतिक मंज़ूरी दी थी। इसके तहत साइबर अपराध की ऑनलाइन रिपोर्टिंग, निगरानी, फॉरेंसिक इकाईयों  की स्थापना, इस दिशा में पुलिस और बाकी न्यायिक ढाँचे की क्षमताएँ बढ़ाने जैसे कई काम होने हैं, लेकिन ये सभी काम वांछित गति से नहीं हो रहे हैं।
  • जैसे-जैसे बैंकिंग, कारोबार और बाकी दूसरी चीज़ें ऑनलाइन हो रही हैं, वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा भी शीर्ष प्राथमिकता का सवाल बनती जा रही है| इसके लिये न सिर्फ कानून में सुधार करना होगा, बल्कि उसका पालन सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था का भी निर्माण करना होगा।
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